केले की खेती में तगड़ा मुनाफा…90 हजार की सब्सिडी भी, जानें इससे जुड़ी हर एक बात

रायपुर. छत्तीसगढ़ में किसानों के बीच केले की खेती तेजी से लोकप्रिय होती जा रही है. पारंपरिक फसलों के साथ-साथ किसान अब नकदी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी में बढ़ोतरी हो रही है. ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी अनिल कुमार महिलांग ने लोकल 18 से कहा कि छत्तीसगढ़ की जलवायु और मिट्टी केले की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त है. राज्य के कई जिलों में किसान अब जी-9 (G-9) वैरायटी के केले की खेती कर रहे हैं, जो लैब से तैयार वायरस फ्री पौधा होता है. केले की रोपाई का मुख्य समय जून-जुलाई का होता है. इस दौरान पौधों की जड़ जमने और बढ़वार के लिए अनुकूल वातावरण मिलता है.

उन्होंने कहा कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ के बालोद जिला केले की खेती में अग्रणी बन रहा है, जहां उद्यानिकी विभाग किसानों को 70 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर तक अनुदान प्रदान कर रहा है. इस अनुदान में पहले वर्ष में 42 हजार रुपये पौध, खाद, दवा और अन्य सामग्री के लिए दिए जाते हैं जबकि दूसरे वर्ष में रखरखाव आदि के लिए 28 हजार रुपये का अतिरिक्त सहयोग दिया जाता है.

उत्पादन पर पड़ता था असर
उन्होंने कहा कि जी-9 किस्म का पौधा टिश्यू कल्चर तकनीक से तैयार किया जाता है, जिससे यह वायरस और बीमारियों से मुक्त रहता है. पहले पारंपरिक केले की खेती में वायरस का खतरा अधिक होता था, जिससे उत्पादन पर असर पड़ता था लेकिन अब वैज्ञानिक तकनीक से यह समस्या काफी हद तक समाप्त हो गई है. इस किस्म में रोपाई के 9 माह बाद फल का बंच तैयार हो जाता है और डेढ़ से दो महीने में यह बाजार बिक्री योग्य हो जाता है. किसान इसे कच्चे या पके दोनों रूपों में बेचकर मुनाफा कमा सकते हैं.

पौधों के बीच की दूरी महत्वपूर्ण
उन्होंने आगे कहा कि खेती के दौरान पौधों के बीच की दूरी भी महत्वपूर्ण होती है. प्रति पौध पांच फीट और लाइन से लाइन की दूरी 6 फीट रखी जाती है, जिससे प्रति हेक्टेयर 3200 से 3300 पौधे लगाए जा सकते हैं. उचित दूरी बनाए रखने से इंटर क्रॉपिंग भी की जा सकती है और खरपतवार नियंत्रण में सुविधा मिलती है. औसतन प्रति एकड़ 450 से 500 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त होता है, जो किसानों के लिए अच्छा लाभकारी साबित होता है.

20 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर अनुदान
अनिल कुमार महिलांग ने कहा कि ड्रिप इरीगेशन और मल्चिंग तकनीक अपनाने से उत्पादन क्षमता और मिट्टी की नमी संरक्षण दोनों में सुधार होता है. ड्रिप और मल्चिंग के बिना खेती करने से खरपतवार की समस्या बढ़ जाती है जबकि मल्चिंग से यह खतरा कम हो जाता है. विभाग इसके लिए अतिरिक्त 20 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर अनुदान भी प्रदान कर रहा है. इस तरह केले की खेती करने वाले किसान को कुल 90 हजार रुपये तक की सहायता राशि मिल सकती है.

सालभर में अच्छा मुनाफा
उन्होंने कहा कि केले की खेती में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की पर्याप्त मात्रा जरूरी होती है. प्रति गड्ढे में 250 ग्राम नाइट्रोजन, 200 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश डालने की सलाह दी जाती है. सही पोषण, सिंचाई और देखरेख से किसान केले की खेती से सालभर में अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और किसानों की आय में निरंतर वृद्धि हो रही है.


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