रिपोर्ट- आदित्य राय, छत्तीसगढ़. चार राज्यों में फैला दंडकारण्य. नक्सलियों ने इस इलाके को युद्ध के मैदान के रूप में उपयोग किया. सबसे ज्यादा हिंसाए कीं, जनताना सरकार ने 6000 से ज्यादा नागरिकों की हत्या की. हजारों सिक्योरिटी फोर्स के जवान शहीद हुए. दरअसल नक्सलियों की राजधानी अबूझमाड़ तो नक्सलियों का कोर जोन था. 1990 के बाद यहां घुसना नामुमकिन था और नक्सलियों ने इस जंगल के बाहर दंडकारण्य 40000 स्क्वेयर किमी के इलाके को युद्ध का मैदान बना दिया. दंडकारण्य में मुख्यतः छत्तीसगढ़ का पूरा बस्तर संभाग, महाराष्ट्र का कुछ हिस्सा, ओडिशा के कोरापुट, मलकानगिरी और नवरंगपुर जिले आते हैं. इस हिस्से आंध्र और तेलंगाना के भी दो-दो जिले हैं. यह वो इलाका है, जहां नक्सलियों ने सबसे ज्यादा उत्पात मचाया, खासकर सलवा जुडूम पर न्यायालय द्वारा रोक के बाद इन इलाकों में 6 वर्षों तक जमकर रक्तपात हुआ.
दंडकारण्य में ही सबसे ज्यादा नुकसान
दंडकारण्य के इस इलाके में ही नक्सलियों ने 1990 से लेकर 2025 तक 6000 से ज्यादा सिविलियंस को मौत के घाट उतारा, तो वहीं इसी इलाके में सुरक्षाबल के जवानों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में आने वाले दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर,कांकेर,कोंडागांव और बस्तर में जवानों को सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पड़ा. छत्तीसगढ़ में 2001 से 2025 तक 1292 जवान नक्सलियों से लड़ाई में शहीद हुए. वहीं 1623 नागरिकों की नक्सलियों ने जनताना सरकार लगाकर हत्या की. महाराष्ट्र में 191 नागरिकों की हत्या और 214 जवान शहीद हुए. ओडिशा में 379 नागरिकों की हत्या 150 के करीब जवान शहीद हुए. आंध्र और तेलंगाना में नक्सलियों ने 549 लोगों की हत्या की. वहीं 133 सिक्योरिटी फोर्स के जवान शहीद हुए. इसके अलावा 90 से लेकर 2000 तक की कोई सटीक जानकारी सामने नहीं है लेकिन इन 10 वर्षों में भी हजारों हत्याएं हुई हैं.
हर दिन होती थी मुठभेड़
नक्सलियों ने दंडकारण्य के 40000 स्क्वेयर किमी के क्षेत्र पर चार दशक से ज्यादा हिंसा फैला रखी थी. हर दिन इस जंगल के किसी न किसी हिस्से में माओवादियों के साथ बड़ी मुठभेड़ होती रही. 2020-22 तक यहां हर दूसरे दिन आईईडी ब्लास्ट की खबर आ जाती थी, जिसमें कई बार जवानों या सिविलियन्स को बड़ा नुकसान उठाना पड़ता था. उस वक्त अबूझमाड़ तक पहुंचना तो सिक्योरिटी फोर्सेज के लिए दूर की कौड़ी थी. यहां तक कि दंडकारण्य में मौजूद 15 जिलों में से हर एक जिले को नक्सलियों ने जंगल में एक दूसरे से काट दिया था. सड़कों पर भी बड़े संभलकर चलना पड़ता था या यूं कहे नेशनल हाईवे तक की स्थिति बेहद दयनीय थी.
जानवरों की तरह रहना पड़ा
सलवा जुडूम में दंडकारण्य ने ही आग की सारी लपटें झेलीं. सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा ये वो तीन जिले थे, जहां कई गांव या तो जुडूम ने जला दिए और उसके बाद हजारों लोगों को बेघर होकर कैंपों में जानवरों की तरह रहना पड़ा. 2023 तक दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर के ट्राएंगल पर मौजूद जगरगुंडा में सलवा जुडूम के बाद नक्सलियों से बचाने 300 आदिवासी परिवारों को लाया गया. यहां सीआरपीएफ और राज्य पुलिस ने घेराबंदी कर एक बाड़ा बनाया. गोलाकार कैंप में सशस्त्र पुलिस बल और उसके बीच लोगों के झोपड़े. यहां 24 वर्षों तक आदिवासी नक्सलियों के डर से घुट-घुटकर मरते रहे. वे जंगल में मौजूद न अपने घर जा सकते थे और न काम के लिए बाहर क्योंकि शहर पहुंचने के लिए 80 किमी का सफर तय करना पड़ता था, जो पूरी तरह जंगल से घिरा था.
एक परिवार के लिए 35 किलो चावल
सरकार इन्हें 35 किलो प्रति परिवार चावल ही दे रही थी. बाकी ये बाड़ेबंदी में जानवरों की तरह जो रहे थे सो अलग लेकिन अब बदलाव सामने है. जगरगुंडा 1980 में इस इलाके की आर्थिक राजधानी था. सबसे बड़ा मार्केट. नक्सलियों ने इसे बर्बाद कर दिया था. अब फिर रौनक लौट आई है. यहां बैंक बन गया है. नया स्कूल, चमचमाती सड़क, मोबाइल टावर और अस्पताल, अब सब कुछ है. जिस सड़क को कभी नक्सलियों ने काट दिया था और बची हुई सड़क मिट्टी के नीचे दब गई थी, अब वहां फर्राटे से बसें दौड़ रही हैं.
दंडकारण्य का कोर इलाका है दंतेवाड़ा
एसपी गौरव राय ने कहा कि दंतेवाड़ा दंडकारण्य का कोर इलाका है. उस समय सुकमा बीजापुर दंतेवाड़ा मिलाकर एक ही जिला हुआ करता था. दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा ये एक-दूसरे से लगे हुए हैं. सुरक्षाबल के जवानों को सबसे ज्यादा नुकसान इसी इलाके में उठाना पड़ा लेकिन हमने दंतेवाड़ा में दोनों जिलों की बॉर्डर तक आत्मसमर्पण और वैचारिक बदलाव की रणनीति अपनाई. अंदर घुसकर आत्मसमर्पण करवाया. तीन वर्षों में 400 से भी ज्यादा ऑपरेशन हुए, जिसमें ज्यादातर में मुठभेड़ हुई.
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