मंच, माला, माईक औ नेताजी का भाषण – मंडली

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कोराना काल में सबसे अधिक क्षति या घोर कमी  यदि किसी क्षेत्र में हुई है तो वह नेताओं के सबसे प्रिय श्रंगार मंच, माला और माईक के गठबंधन में हुई है। इस गंठबंधन से निकलने वाली वादों भरी वाणी जिसे हम भाषण कहते हैं,  की अपूरणीय क्षति हुई है। सामान्य व्यक्ति के लिए भाषण एक बकैती है लेकिन नेताओं के लिए यह अति महत्वपूर्ण अस्त्र भी है और आभूषण भी। 

 

आवश्यकता आविष्कार की जननी है’ के तहत नये रास्ते भी खोज लिए गए हैं। वर्चुअल रैलियाँ हो रही हैं। आनलाइन मंच के माध्यम से हुई रैलियों के भाषणों ने इन तीन रत्नों का स्थान लेने की वैसे बहुत कोशिश की है लेकिन इन्हें कोई खास सफलता अब तक मिली नहीं है क्योंकि वर्चुअल रैली में नेताजी को आसानी से म्यूट किया जा सकता है। यह बात अलग है कि परम्परागत रैली में भी लोग नेता जी को सुनते कम हैं, उनका लाव-लश्कर अधिक देखते हैं। सामान्य जीवन में नेताजी को म्यूट करने की कोशिश करना आम आदमी के लिए आ बैल मुझे मारको चरितार्थ करने जैसा है।

 

जब तक मंच, माला व माईक न हो और जय जयकार करते चेले-चपाटे एवं श्रोता न हों तब तक भाषण देने का मजा कुछ खास नहीं है। नेताजी के मंच पर खड़े होकर अद्भुत और अलग-अलग शारीरिक भंगिमाएँ बनाकर हुंकार भरना राजनीति का सर्व सुलभ तत्व भी है और सम्मोहन शास्त्र व शस्त्र भी।

 

पहले नेताजी ने कोरोना को भगाने का आधे अधूरे मन से प्रयास किया पर वह नहीं भागा तो इंतजार किया कि मन भरने पर वह भाग जाएगा। कोरोना ढीठ निकला और नहीं भागा तो नेताजी के सब्र का बाँध टूट गया। उन्होंने अपने पठ्ठों से आनलाइन मजमें जमवा लिए। जो नेताजी वोट देने वाली जनता के कभी फोन तक नहीं उठाते थे, वे रोज अपना फेयर एंड लवली फेस लेकर फेसबुक लाइव पर बैठ जाते हैं। नेताजी इन दिनों इतना टैकनो फ्रेंडली हो गए हैं कि आगे चलकर वे नासा के लोगों को भी अपने भाषण से तकनीकी ज्ञान बाँट सकते हैं। ट्विटर, फेसबुक व इंस्टाग्राम इन दिनों नेताजी का मंच हैं। इन पर मिले लाईक व कमेंट मालारूपी श्रंगार हो गए है। बेचारी जनता अब भी घाटा उठाते हुए अपना डाटा खर्च कर रही है। नेताजी भी इस उम्मीद में अपना डाटा खर्च कर रहे हैं कि अपलोड से अधिक डाउनलोड हो रहा है।

 

कोरोना वायरस को प्रतिदिन नेताजी की राजनीति अपने सरकारी व निजी हाथों के गंठबंधन के सहयोग से मारने का दावा कर रही है लेकिन वोट देने वाली जनता का टेस्ट पोजिटिव ही आ रहा है। वो तो सामाजिक दूरी का नियम बीच में आ गया है वरना तो नेताजी अपनी विशाल जनसभा में भाषणों से ही कोरोना वायरस को खदेड़ देते। मंच, माला व माईक की इस कोरोना दूरी के कारण अर्थव्यवस्था रसातल मे चली गई है। इस पर नेताजी का भाषण नेटवर्क की समस्याओं के कारण सुनाई नहीं दे रहा है। 

 

बड़े बड़े साहित्यकारों को यह सब दिखाई नहीं दे रहा। उनकी कलम चलना या तो बंद हो गई है या बेमतलब की बातों पर चल रही है। साहित्य के माध्यम से आने वाली एक और क्रांति या उससे होने वाला समाज का पथ-प्रदर्शन क्वारेंटाईन हो गयीं हैं। कुछ कवियों ने जरूर सार्थक प्रयास किए हैं अपनी कविताओं के माध्यम से कोरोना को मारने का, लेकिन कहाँ तो नेताजी का भाषण ओर कहाँ कविता! आखिर में कविता ने भी कोरोना के सामने घुटने टेक दिए और फिर अंतिम उम्मीद मंच से आने वाले भाषणों से ही बची है कि ये भाषण ही कोरोना वैक्सीन का काम करेगें।

 

अब तक राजनीतिक मंचों से कितनी ही घोषणाएँ होती थी और उससे सरकारें बन जाती थीं। लेकिन कोरोना काल मे इस गंठबंधन के डगमगाने के कारण व नेताजी के भाषण के अभाव में कुछ प्रदेशों की सरकारें ही गिर गईं, कुछ गिरने की अगली संभावना तलाशते हुए गिरकर सँभल गईं। चुनाव नहीं हो पाना व खुले मंच से अपने मन की बात नहीं कह पाना, नेता जी के लिए कोरोना पाजिटिव आने से बड़ा दर्द हो गया है। 

 

मैं कोरोना वाईरस जी से यही निवेदन करना चाहूँगा कि वह राजनीतिक मंच से दूर रहे, नहीं तो एक न एक दिन कांग्रेस मुक्त भारत होने से पहले नेताजी उसे पृथ्वी से पूर्ण रूप से मुक्त कर देगें। हे मतदाताओं, कोरोना काल में मंच, माला व माईक के गठबंधन की आवश्यकता को समझो और कोरोना को भी इस गठबंधन से दूर रहने की सलाह दो। राजनीति का यह अखाड़ा जमते रहना चाहिए। भाषणों से ही एक दिन इस वायरस की वैक्सीन बनेगी और हमारे महान वैज्ञानिक फिजूल की मेहनत से बच जाएँगे। नेताजी का एक और वादा पूरा हो जाएगा और वे अपने अगले चुनावी भाषण में ताल ठोक सकेंगे कि इस महामारी को उन्होंने आने दिया, फैलने दिया और अंत में उसे समाप्त कर दिया।

लेखक – भूपेन्द्र भारतीय (@AdvBhupendra88 )

 

 




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