खजुराहो/छतरपुर।मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग एवं उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय 52वाँ अंतर्राष्ट्रीय खजुराहो नृत्य समारोह का गुरुवार की संध्या भव्य समापन हुआ। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग एवं जिला प्रशासन–छतरपुर के सहयोग से आयोजित इस महोत्सव ने पौराणिक कथाओं, शास्त्रीय नृत्य शैलियों और आध्यात्मिक भावभूमि का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। ऐतिहासिक खजुराहो की पावन धरा पर आयोजित यह समारोह दर्शकों को अनंत स्मृतियाँ और भारतीय संस्कृति की समृद्ध झलक देकर संपन्न हुआ।
समारोह की अंतिम शाम मंच पर दो पद्मश्री सम्मानित एवं एक संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से विभूषित नृत्यांगनाओं ने अपनी सशक्त प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और ओडिसी—चार प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियों की प्रस्तुतियाँ हुईं। कलाकारों का स्वागत कमांडेंट 3 ईएमई सेंटर ब्रिगेडियर अनिल दास, अकादमी निदेशक प्रकाश सिंह ठाकुर एवं उपनिदेशक शेखर करहाड़कर द्वारा शॉल, श्रीफल एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर किया गया।
कथक में शिव-वंदना और लय का उत्कर्ष
अंतिम दिवस की शुरुआत पद्मश्री सुनयना हजारीलाल (मुंबई) की कथक प्रस्तुति से हुई। उन्होंने राग शंकरा और तीनताल में शिव-वंदना के माध्यम से नटराज के विराट स्वरूप का भावपूर्ण चित्रण किया। शुद्ध नृत्य में पारंपरिक आमद, ठाठ, बंदिशें, जटिल लयकारियाँ, तोड़े, चक्करदार परन और पल्ला ने दर्शकों को बांधे रखा। ठुमरी ‘आज आए री’ (राग भिन्नषडज, अद्धा ताल) में नायिका के आनंद का सजीव अभिनय हुआ। समापन राग मेघ मल्हार और एकताल में तराना से किया गया।
‘सामर्थ्य’ में रामायण की नारी शक्ति का सशक्त रूपांकन
पद्मश्री प्रतिभा प्रहलाद (बेंगलुरु) ने ‘सामर्थ्य’ शीर्षक नृत्य-नाट्य प्रस्तुत किया, जिसमें भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी, कथकली और मोहिनीअट्टम का समावेश रहा। प्रस्तुति ने रामायण की स्त्री पात्रों—सीता, कैकेयी, शूर्पणखा, उर्मिला और मंदोदरी—की शक्ति, धैर्य और निर्णायक भूमिका को केंद्र में रखा। सूत्रधार के रूप में महर्षि वाल्मीकि की उपस्थिति ने काव्य, संगीत और नाट्य के माध्यम से कथा को सशक्त प्रवाह दिया।
कुचिपुड़ी में शिव-लीला का दिव्य वैभव
संगीत नाटक अकादमी अवार्डी भावना रेड्डी (दिल्ली) की कुचिपुड़ी एकल प्रस्तुति ‘शिव लीला’ (रागमालिका, मिश्र चापु) में भगवान शिव के स्वयंभू, रक्षक और संहारक—तीनों रूपों का सौंदर्यपूर्ण निरूपण हुआ। मार्कंडेय-यम प्रसंग, समुद्र मंथन में विषपान, उमा-विवाह और अंत में कैलाश पर आनंद तांडव—हर दृश्य ने आध्यात्मिक अनुभूति कराई।
ओडिसी में ‘जय राम’—आदर्श मानव की वंदना
अंतिम प्रस्तुति ओडिसी नृत्य में प्रभुतोष पांडा द्वारा ‘जय राम’ रचना की रही। ओडिशा की देशज लोक शैलियों के समावेश के साथ भगवान राम को आदर्श मानव, सत्य और धर्म के पालक के रूप में प्रस्तुत किया गया। मंगलाचरण, प्राचीन रामलीला धुन पर शुद्ध नृत्य, सीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग का उत्सवमय दृश्य—सभी ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। ओडिसी गायन, मर्दला, सितार और बांसुरी की संगत ने प्रस्तुति को संपूर्णता प्रदान की।
समापन संध्या पर ताल, लय और अभिव्यक्ति के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय नृत्यों की दिव्यता, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक चेतना का अद्वितीय संगम साकार हुआ। 52वाँ अंतर्राष्ट्रीय खजुराहो नृत्य समारोह भारतीय कला–परंपरा की गरिमा को नई ऊँचाइयों तक ले जाते हुए सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।


