मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग एवं उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी द्वारा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, नागपुर, मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग एवं जिला प्रशासन – छतरपुर के सहयोग से आयोजित विश्व विख्यात 52वाँ अंतर्राष्ट्रीय खजुराहो नृत्य समारोह के पांचवें दिवस मंगलवार को सायंकाल में तीन नृत्य प्रस्तुतियां हुईं। इस दौरान उत्तर भारत के कथक, पूर्वी भारत के ओडिसी एवं दक्षिण भारत के मोहिनीअट्टम नृत्य की परम्पराओं से दर्शकों का साक्षात्कार हुआ।प्राचीन मंदिरों की दिव्य आभा में जब घुंघरुओं की झंकार गूँजी तो सम्पूर्ण परिसर मानो जीवंत हो उठा।
शिल्पांकित दीवारों पर पड़ती प्रकाश की किरणें और आकाश में तैरती मधुर लय – इन सबने मिलकर ऐसा वातावरण रचा, जिसमें इतिहास और वर्तमान एकाकार हो गए। ताल, लय और अभिव्यक्ति के इस त्रिवेणी संगम ने दर्शकों को भारतीय सांस्कृतिक विविधता की गहन अनुभूति कराई। खजुराहो की ऐतिहासिक धरोहर और शास्त्रीय नृत्य की जीवंत परंपराओं का यह संगम न केवल कला का उत्सव था, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक आत्मा का उत्सर्जन बन गया।पांचवें दिवस शिंजनी कुलकर्णी, दिल्ली का कथक, पद्मश्री इलियाना चितारीस्ती, भुवनेश्वर का ओडिसी एवं पद्मश्री कलामण्डलम क्षेमावेथी, केरल की मोहिनीअट्टम की नृत्य प्रस्तुतियां हुईं। कलाकारों का स्वागत कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने शॉल, श्रीफल एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर किया।
सौंदर्यपरक अभिव्यक्ति और सूक्ष्म भाव
पांचवें दिवस की पहली प्रस्तुति सुविख्यात कथक नृत्यांगना शिंजनी कुलकर्णी की कथक नृत्य की थी। शिंजिनी कालका – बिंदादिन परिवार की नवीं पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं। उन्होंने पाँच साल की उम्र में अपने नाना एवं विश्वविख्यात नृत्य कलाकार पं. बिरजू महाराज के निर्देशन में कथक प्रशिक्षण शुरू किया। खजुराहो नृत्य समारोह के मंच पर उन्होंने ताल धमार की प्रस्तुति से प्रारंभ किया। यह एक लक्षण गीत है, जिसकी रचना और संगीतरचना पंडित बिरजू महाराज ने की है। इस रचना के माध्यम से शिंजनी ने चौदह मात्राओं वाले धमार ताल के स्वभाव, उसकी भव्यता और चंचल ऊर्जा को अभिव्यक्त किया। इसमें पारंपरिक लखनऊ घराने की कथक शैली में गुंथी हुईं परन, प्रमेलु और तिहाइयों ने आकर्षण का काम किया। इसके पश्चात “बिहारी को अपने बस कर पाओ” शीर्षक से एक दादरा प्रस्तुत किया, जिसकी रचना बिंदादिन महाराज ने की थी। इस प्रस्तुति के माध्यम से लखनऊ घराने की सौंदर्यपरक अभिव्यक्ति और सूक्ष्म भाव की परंपरा को सजीव कर दिया।
नृत्य में गंगा की दिव्यता एवं भव्यता का प्रदर्शन
अगली प्रस्तुति इटली मूल की भारतीय नृत्य कलाकार पद्मश्री इलियाना चितारीस्ती की ओडिसी नृत्य की थी। महान गुरु केलुचरण महापात्रा की वरिष्ठ शिष्या इलियाना ने रचनात्मक कोरियोग्राफी के माध्यम से पश्चिम और पूर्व के बीच पुल बनाया है, जहाँ पश्चिमी विचारों को पारंपरिक भारतीय शैली में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने अपनी प्रस्तुति का प्रारंभ गंगा प्रणाम के साथ किया। यह स्तुति आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है। इस प्रस्तुति में गंगा की दिव्यता, भव्यता के साथ उनकी महानता का वर्णन बहुत ही आकर्षक ढंग से किया गया। इसके बाद शुद्ध नृत्य अंतर्गत पल्लवी की प्रस्तुति दी गई।
काव्यात्मक संगीत देह की गतियों के ताने-बाने में गुंथी इस प्रस्तुति में संगीत और नृत्य का कोमल प्रस्फुटन उत्कर्ष तक पहुंचा। यह राग बेलाबोली एवं ताल एकताली में निबद्ध थी। अगली प्रस्तुति अन्याय की थी। यह रचना अम्बा, मेडिया एवं द्रौपदी की कथा है, जिन्होंने न्याय अपने हाथों में लेने का साहस किया। इसके बाद ‘शरीर’ रचना की प्रस्तुति हुई। यह प्रस्तुति स्त्री-शरीर की अद्भुत शक्ति को नमन है – एक ओर वह उत्पीड़न का लक्ष्य रहा है, तो दूसरी ओर प्रतिरोध का सशक्त साधन भी। यह एक पारम्परिक कथा है, जिसे समकालीन संदर्भ में परिकल्पित कर प्रस्तुत किया गया। इस प्रस्तुति में उपासना मोहंती, दिव्य सुपाकर, उत्कलिनी मलिक, कल्याणी मोहापात्रा, रुसाली रुशब्दा एवं रुचिका रुपनुइता ने मंच पर नृत्य प्रस्तुति दी।
विशिष्ट लास्य शैली – कोमल, मृदुल और लहराती देह-चाल
पांचवें दिवस की अंतिम प्रस्तुति पद्मश्री कलामंडलम क्षेमावेथी की मोहिनीअट्टम नृत्य की थी। 63 वर्षों से अधिक समय से एक नृत्यांगना और शिक्षिका के रूप में सक्रिय रहते हुए, उनका नृत्य के प्रति समर्पण भारत और विश्वभर के नृत्य साधकों को निरंतर समृद्ध और प्रेरित करता रहा है। खजुराहो नृत्य समारोह के मंच पर उन्होंने प्रस्तुति का प्रारंभ चोलकेट्टू के साथ किया, जो समूह प्रस्तुति थी। यह प्रस्तुति विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को समर्पित थी। इसमें नृत्य कलाकारों ने अपनी तकनीकी दक्षता को लयबद्ध पद्धतियों के माध्यम से प्रदर्शित किया।
इसमें मोहिनीअट्टम की विशिष्ट लास्य शैली – कोमल, मृदुल और लहराती देह-चाल – विशेष रूप से धड़ की मंद गति और तरंगित प्रवाह – उभरकर सामने आया। यह प्रस्तुति रागमालिका और आदि तालम् में निबद्ध थी। इसके बाद सप्तनायिका प्रस्तुत की, जो एकल प्रस्तुति थी। यह प्रस्तुति भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित अष्टनायिका सिद्धांत से प्रेरित थी। कवि जयदेव के 12वीं शताब्दी के काव्य गीत गोविंदम के माध्यम से राधा के सात भावों को सौंदर्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिससे श्रृंगार रस के विविध आयाम उभरकर आये। अगली प्रस्तुति एकल थी, जिसमें अजिता हरे की प्रस्तुति दी गई।
इसके रचयिता मुरिंगूर शंकरन पोट्टी हैं। यह रचना सुदामा की कथा पर आधारित है, जो अपने बालसखा श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका जाते हैं। वे कृष्ण की स्तुति करते हुए कहते हैं – “अजित! हे विष्णु स्वरूप! आप सदा विजयी रहें। स्वयं ब्रह्मा भी आपके चरणों में नत हैं। आप अर्जुन के सारथी हैं।” “विजय सारधे” कहकर वे कुरुक्षेत्र के गीता उपदेश की स्मृति कराते हैं। यह पदम् श्री रागम् और आदि तालम् में निबद्ध थी एवं इसमें गहन भक्ति भावना के दर्शन हुए। अंत में उन्होंने दशावतारम् की प्रस्तुति दी। 12वीं शताब्दी के कवि जयदेव की अमर कृति गीत गोविंदम से लिया गया प्रथम अष्टपदी “प्रलय-पयोधि-जले”। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के दस अवतारों की स्तुति करता है।
मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि अवतार। यह प्रस्तुति रागमालिका और आदि तालम् में निबद्ध थी।*खजुराहो नृत्य समारोह में कल की प्रस्तुतियां*52वाँ अंतर्राष्ट्रीय खजुराहो नृत्य समारोह में मुख्य मंच पर आज 25 फरवरी, 2026 को सायं 6:30 बजे से चार नृत्य प्रस्तुतियां होंगी। इसमें पहली प्रस्तुति संगीत नाटक अकादमी अवॉर्डी शाश्वती सेन, दिल्ली की कथक, मोहंती, भुवनेश्वर की ओडिसी, संगीत नाटक अकादमी अवॉर्डी नयनसखी देवी, मणिपुर की मणिपुरी एवं खुशबू पांचाल, उज्जैन की कथक समूह नृत्य की प्रस्तुतियां होंगी।


