स्पेसएक्स का बेकाबू सैटेलाइट बना खतरा, अंतरिक्ष में ‘केसलर सिंड्रोम’ का डर; रुक सकते हैं भविष्य के स्पेस मिशन

What is Kessler Syndrome: स्पेसएक्स का स्टारलिंक सैटेलाइट 17 दिसंबर को अपना नियंत्रण खो बैठा. इसके बाद से स्टारलिंक का ये सैटेलाइट अंतरिक्ष में घूम रहा है. स्थिति को देखते हुए अनुमान लगाया जा रहा है कि इस सैटेलाइट के साथ 2.8 दिनों में केसरल सिंड्रोम शुरू हो सकता है.

स्पेसएक्स ने जानकारी दी है कि यह कुछ ही दिनों में पृथ्वी के वायुमंडल में घुसेगा और फिर जलकर नष्ट हो जाएगा. सैटेलाइट नंबर 35956 ने 418 किलोमीटर की ऊंचाई पर अपना नियंत्रण खो दिया था. इसके बाद प्रोपल्शन टैंक फटा और गैस निकलने लगी. बाद में इसकी ऊंचाई चार किलोमीटर कम हो गई और छोटे मलबे बनने लगे. शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि ऐसे हालात में केसरल सिंड्रोम शुरू हो सकता है.

इंटरनेट सेवा हो जाएगी बाधित

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इसकी वजह से पृथ्वी पर नुकसान पहुंच सकता है. स्टारलिंक जैसे सैटेलाइट से इंटरनेट कनेक्शन मिलता है. ऐसे में अगर केसरल सिंड्रोम हो गया, तो कई जगहों पर इंटरनेट सेवा बाधित हो जाएगी. जीपीएस और नेविगेशन पर भी इसका असर दिखेगा. जीपीएस और नेविगेशन पर इसकी समस्या बढ़ने से दुर्घटनाएं भी बढ़ सकती हैं. स्टॉक मार्केट पर भी असर दिख सकता है. मौसम सैटेलाइट पर असर पड़ेगा, जिसकी वजह से मौसम संबंधी जानकारी मिलने में देरी होगी.

रुक सकते हैं नए स्पेस मिशन

युद्ध या आतंकवाद विरोधी गतिविधियों में भी परेशानी आएगी. नए स्पेस मिशन रुक सकते हैं. दशकों तक अंतरिक्ष में जाना मुश्किल हो सकता है. आइए जानते हैं कि केसरल सिंड्रोम है क्या. असल में केसलर सिंड्रोम अंतरिक्ष से जुड़ा एक गंभीर वैज्ञानिक खतरा है, जिसमें पृथ्वी की कक्षा में मौजूद स्पेस मलबा आपस में टकराकर इतनी तेजी से बढ़ने लगता है कि अंतरिक्ष का इस्तेमाल करना मुश्किल या लंबे समय के लिए असंभव हो सकता है.

किसने दिया था ये सिद्धांत?

यह सिद्धांत नासा के वैज्ञानिक डोनाल्ड जे. केसलर ने 1978 में दिया था, जिसके मुताबिक जब दो सैटेलाइट या स्पेस ऑब्जेक्ट आपस में टकराते हैं, तो उनसे हजारों छोटे-छोटे टुकड़े बन जाते हैं. ये टुकड़े आगे और सैटेलाइट्स से टकराते हैं. इससे एक चेन रिएक्शन (डोमिनो इफेक्ट) शुरू हो जाता है.

(एजेंसी आईएएनएस)


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