पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव और टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झकझोर दिया है। एक ओर जहां सैन्य गतिविधियां जारी हैं, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक प्रयासों की खबरें भी सामने आ रही हैं। इसके बावजूद अब तक किसी ठोस समाधान की दिशा में प्रगति नजर नहीं आ रही, जिससे दुनिया भर में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ रहा है। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई को लेकर अमेरिका, यूरोप, एशिया और अफ्रीका तक चिंता बढ़ गई है। हालात ऐसे बन रहे हैं कि पेट्रोल, डीजल, गैस, बिजली और उर्वरक जैसे अहम क्षेत्रों में संकट गहराने का खतरा मंडरा रहा है।
ऐसे में भारत को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं—क्या देश इस तरह के वैश्विक संकट के लिए पहले से तैयार था? क्या कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए कोई ठोस रणनीति बनाई गई है? और अगर वैश्विक सप्लाई प्रभावित होती है, तो भारत पर इसका कितना असर पड़ेगा?दरअसल, भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। देश ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) को मजबूत किया है, ताकि आपात स्थिति में तेल की उपलब्धता बनी रहे। इसके साथ ही, सरकार ने ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण पर जोर दिया है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके।
नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार के साथ बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देकर पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
इसके अलावा, घरेलू गैस उत्पादन को बढ़ाने, हर घर तक पाइप्ड गैस पहुंचाने और एलएनजी इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने जैसे कदम भी उठाए गए हैं। रेलवे के विद्युतीकरण और सार्वजनिक परिवहन को सशक्त बनाने पर भी सरकार का फोकस है, ताकि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो सके।हालांकि, वैश्विक संकट का असर पूरी तरह टाल पाना संभव नहीं है, लेकिन भारत की तैयारियां यह संकेत देती हैं कि देश ऐसे हालात से निपटने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्षम हो चुका है।
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