मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा जिला प्रशासन छतरपुर एवं महाराजा छत्रसाल विरासत महोत्सव समिति के सहयोग से मऊसहानियाँ (छतरपुर) में आयोजित दो दिवसीय विरासत महोत्सव का समापन गुरुवार की शाम को हो गया। कला विविधताओं में बुंदेलखण्ड केसरी का शौर्य एवं वीरता श्रोता-दर्शकों तक अमिट छाप छोड़ गया।
मध्यप्रदेश एवं देश के सुविख्यात कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से इस प्रतिष्ठित आयोजन को स्मरणीय बना दिया। विरासत महोत्सव के अंतिम दिवस तीन सांस्कृतिक प्रस्तुतियां हुईं, जिनमें बुन्देली गायन, पण्डवानी गायन एवं धन्य धन्य बुन्देल धरा की संगीत-नृत्य एवं संवाद से सजी प्रस्तुति विशेष थी। पहली प्रस्तुति सुश्री मुस्कान चौरसिया एवं साथी, दिल्ली द्वारा बुन्देली गायन की दी गई। उन्होंने बुन्देलखण्ड अंचल की परम्पराओं में रचे-बसे गीतों से समां बांध दिया। उन्होंने अपने गीतों में जहां एक ओर बुन्देलखण्ड के पारंपरिक गीतों को अनूठे अंदाज में प्रस्तुत किया, वहीं महाराजा छत्रसाल के शौर्य एवं वीरता को सुरों से सजाया। अगली प्रस्तुति छत्तीसगढ़ की लोकप्रिय गायन विधा पण्डवानी की रही। जिसे प्रस्तुत करने मंच पर नमूदार हुईं सुश्री सम्प्रिया पूजा, दुर्ग।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा हस्तिनापुर के दरबार में शांति प्रस्ताव लेकर जाना प्रसंग प्रस्तुत किया। जिसे दुर्योधन द्वारा ठुकरा दिया गया था। महाभारत काल के इस प्रसंग को उन्होंने पण्डवानी की परम्परा में पिरोकर रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया। हाथों में तंबूरा थामे सम्प्रिया जब पारंपरिक परिधान में मंच पर आईं तो दर्शक-श्रोताओं ने उनका अभिनंदन किया। इस प्रस्तुति में कहीं रौद्र, तो कभी कोमल भाव के संवादों ने मंत्रमुग्ध कर दिया। साथ ही प्रस्तुति के बीच-बीच में गाये गये भजनों ने प्रसंग को जीवंत बना दिया। इनमें भगवान को लीला है अपरम्पार, गालो हरि भजन चोला तर जाही रामा, जय जगदम्बा ला प्रणाम दुर्गा ला प्रणाम एवं सुनकर राजा रे घायल होंगे सम्मिलित थे। अंतिम प्रस्तुति श्री सुमित मिश्रा, ओरछा द्वारा संयोजित ‘धन्य धन्य बुन्देल धरा’ की रही।
संवाद, संगीत, नृत्य का एक ऐसा ताना-बाना जिसमें बुन्देलखण्ड की धरती के गुणगान के साथ महाराज छत्रसाल का पराक्रम देखते ही बन रहा था। भारत की सांस्कृतिक चेतना में यदि किसी भूभाग ने शौर्य, लोकजीवन, अध्यात्म और कला का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया है, तो वह है बुन्देलखंड। विंध्याचल की पर्वतमालाओं, बेतवा, केन, धसान जैसी नदियों से सिंचित यह धरती केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत विरासत है। यही कारण है कि इसे श्रद्धापूर्वक “धन्य-धन्य बुन्देल धरा” कहा जाता है। इस प्रस्तुति में बुन्देलखण्ड की सुविख्यात लोकगायिका सुश्री कविता शर्मा के गीतों के साथ ही 16 लोक नृत्य कलाकारों द्वारा बुन्देलखण्ड के बधाई, नौरता एवं बरेदी इत्यादि नृत्यों में संयोजित बुन्देलखण्ड की गाथा थी।


