जगदलपुर। बाढ़ का पानी उतर गया, लेकिन अपने पीछे ऐसी तबाही छोड़ गया कि कई परिवारों के पास न रहने के लिए घर बचा, न दोबारा आशियाना बनाने की ताकत। किसी की गृहस्थी मलबे में दब गई, तो किसी की जिंदगीभर की कमाई पानी में बह गई। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उन महिलाओं के सामने था, जो पहले ही जिंदगी की मुश्किलों से अकेले लड़ रही थीं। तीन बच्चों के साथ बेबस केसावती कश्यप और पति को खो चुकी देवकी भारती के लिए घर उजडऩा सिर्फ दीवारों का गिरना नहीं, बल्कि सिर छिपाने की आखिरी जगह का छिन जाना था। लेकिन कुरुषपाल गांव में इंसानियत ने इस बेबसी के आगे हार नहीं मानी।
बस्तरिया बैक बेंचर्स के युवाओं ने दोनों परिवारों की परेशानी को समझा और अपने सहयोग से प्रोफाइल शीट के एक-एक कमरे के मकान बनवाकर उन्हें सौंप दिए। शनिवार को जब दोनों परिवारों ने रिबन काटकर अपने नए आशियाने में कदम रखा, तो यह केवल घर में प्रवेश नहीं था, बल्कि उजड़ी जिंदगी को फिर से शुरू करने की उम्मीद थी। तीन बच्चों को लेकर कहां जाती केसावती, बाढ़ ने छीन लिया था सबकुछकुरुषपाल की केसावती कश्यप का मकान बाढ़ के पानी में पूरी तरह ढह गया था। घर उजड़ा तो तीन छोटे बच्चों के साथ रहने का संकट सामने आ खड़ा हुआ। कुछ दिन राहत शिविर में गुजारने पड़े। वहां से लौटीं तो जिस जगह कभी उनका परिवार रहता था, वहां न छत बची थी और न सिर ढकने का कोई इंतजाम।
बच्चों को लेकर कहां जाएं, परिवार को कैसे संभालें और फिर से घर कैसे बनाएं—इन सवालों ने उनकी चिंता बढ़ा दी थी। केसावती को शासन से मकान के लिए 1 लाख 30 हजार रुपये की सहायता राशि मिली है, लेकिन घर तैयार होने में समय लगता। तत्काल रहने की जगह नहीं होने से उनकी परेशानी बढ़ रही थी। इसी बीच बस्तरिया बैक बेंचर्स के युवाओं ने उनकी स्थिति समझी और अपने स्तर पर राशि जुटाकर एक कमरे का मकान बनवा दिया। अब केसावती और उनके बच्चों के पास कम से कम सिर छिपाने के लिए सुरक्षित छत है। उन्होंने इस मदद के लिए पूरी टीम का आभार जताया।
पति नहीं रहे, मजदूरी से परिवार संभाला, बाढ़ ने बचा हुआ सहारा भी छीन लियादेवकी भारती की जिंदगी भी संघर्षों से भरी रही है। बीमारी के कारण कुछ वर्ष पहले पति का निधन हो गया। इसके बाद दो बेटों और एक बेटी के पालन-पोषण की जिम्मेदारी अकेले उनके कंधों पर आ गई। दूसरों के खेतों में मजदूरी कर वे किसी तरह परिवार का पेट पाल रही थीं। आर्थिक तंगी के बीच जिंदगी आगे बढ़ रही थी, लेकिन बाढ़ ने उनका मिट्टी का मकान भी ढहा दिया। घर में रखा सामान तक पानी में बह गया। पति को खोने के बाद बड़ी मुश्किल से परिवार संभाल रहीं देवकी के सामने अब बच्चों को लेकर रहने की जगह का संकट था।
ऐसे समय में बस्तरिया बैक बेंचर्स के युवाओं ने मदद का हाथ बढ़ाया। आपसी सहयोग से पैसे जुटाए और उसी जगह प्रोफाइल शीट का एक कमरा तैयार करवा दिया। देवकी के मुताबिक, मकान बनवाने में उन्हें अपनी ओर से कोई पैसा खर्च नहीं करना पड़ा। उनके और बच्चों के लिए यह सिर्फ एक कमरा नहीं, बल्कि सुरक्षित रहने का सहारा है।पहले भोजन पहुंचाया, फिर समझा कि परिवारों को छत भी चाहिएबस्तरिया बैक बेंचर्स की पहल केवल दो मकान बनवाने तक सीमित नहीं है। बाढ़ के शुरुआती तीन दिनों में टीम ने 3 हजार से अधिक प्रभावित परिवारों तक दो वक्त का भोजन पहुंचाने का प्रयास किया। राहत कार्य के दौरान जब युवा कुरुषपाल पहुंचे, तो उन्होंने बाढ़ की तबाही को करीब से देखा। कई मकान ढह चुके थे और परिवार मुश्किल हालात में दिन गुजार रहे थे।
इसी दौरान टीम की नजर केसावती और देवकी के परिवारों पर पड़ी। युवाओं को लगा कि भोजन और जरूरी सामान से तत्काल राहत तो मिल सकती है, लेकिन जिनके घर ही नहीं बचे, उनकी समस्या का स्थायी समाधान जरूरी है। इसके बाद सदस्यों ने आपस में राशि जुटाई। कुछ अन्य लोगों ने भी सहयोग किया और दोनों परिवारों के लिए मकान तैयार करने का काम शुरू हुआ। लगातार प्रयासों के बाद दोनों कमरे बनकर तैयार हो गए।


