प्रवासी मजदूरों के लिए कर्नाटक ने रोकी ट्रेन, विपक्ष ने येदियुरप्पा सरकार को घेरा – Karnataka cancels train for migrant laborer opposition slams bjp govt decision

  • बेंगलुरु में प्रवासी मजदूरों ने किया बवाल
  • मजदूरों को घर जाने से रोकने पर विवाद

देश के अलग-अलग इलाकों में फंसे प्रवासी मजदूरों का अपने घर लौटना जारी है. एक आंकड़े के मुताबिक 1 मई से अब तक 140 स्पेशल ट्रेन के फेरे लग चुके हैं जिनमें 1.35 लोग यात्रा कर चुके हैं. ये वही लोग हैं जो लॉकडाउन की वजह से फंसे थे और स्पेशल ट्रेन चलते ही अपने गृह प्रदेश पहुंच गए. इस बीच कर्नाटक में एक नया विवाद तब पैदा हो गया जब वहां की सरकार ने मजदूरों की कमी रोकने के लिए ऐसी ट्रेनें चलाने से इनकार कर दिया.

यह मामला प्रकाश में आते ही विपक्ष ने कर्नाटक की भारतीय जनता पार्टी सरकार पर हमला बोल दिया. विपक्ष ने कहा कि सरकार प्रवासी मजदूरों के साथ बंधुआ मजदूर जैसे बर्ताव कर रही है. यहां तक कि मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने प्रवासी मजदूरों से अपील की है कि वे कर्नाटक में ही रुक जाएं, अपने घर न जाएं क्योंकि प्रदेश में निर्माण और औद्योगिक काम शुरू होने वाले हैं.

इसी को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने किसानों, फूल उत्पादकों, धोबी (वाशरमैन), नाई, ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों को फौरी राहत पहुंचाने के लिए बुधवार को 1,610 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की. इन सेक्टरों के लोग कोविड-19 के चलते लागू किए गए लॉकडाउन से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा ने बुधवार को कहा, राज्य सरकार 1,610 करोड़ रुपये का मुआवजा/लाभ उन लोगों को देगी, जो 25 मार्च से बंद होने की वजह से संकट में हैं. विशेष राहत पैकेज के लाभार्थियों में किसान, फूल, सब्जियां और फल उत्पादक, धोबी, नाई, ऑटो-रिक्शा और टैक्सी ड्राइवर शामिल हैं, जिन्हें लंबे समय तक बंद रहने के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा है. दरअसल कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लॉकडाउन को दो बार आगे बढ़ाया जा चुका है और फिलहाल इसे 17 मई तक बढ़ाया गया है.

हालांकि येदियुरप्पा का यह राहत पैकेज उस विवाद को शांत नहीं कर पाया जिसमें एक तरह से प्रवासी मजदूरों के घऱ जाने का रास्ता रोका गया है. राजस्व विभाग के मुख्य सचिव एन. मंजूनाथ प्रसाद (जो प्रवासियों के नोडल अधिकारी भी हैं) ने मंगलवार को 10 श्रमिक ट्रेनों की मांग को रद्द कर दिया. कहा जा रहा है कि यह कदम बिल्डर्स की मांग के बाद उठाया गया जिसमें कहा गया है कि प्रवासी अगर अपने घर चले गए तो निर्माण कार्यों में भारी दिक्कत आ सकती है. सूत्रों ने समाचार एजेंसी पीटीआई को यह जानकारी दी.

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सरकार के इस फैसले पर सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी ने जोरदार हमला बोला और कहा कि मजदूरों को बंधुआ की तरह बर्ताव करने से भी ज्यादा बुरा है. क्या भारतीय संविधान का कोई अस्तित्व है? येचुरी ने एक ट्वीट में यह बात कही. बता दें, 4 मई को बेंगलुरु में यूपी, बिहार, ओडिशा और बंगाल के हजारों मजदूरों ने बवाल किया था क्योंकि उन्हें घर जाने से रोक दिया गया था.

कई मजदूरों का कहना था कि उनका रहना दूभर हो गया है, इसलिए वे अपने घर जाना चाहते हैं. कर्नाटक सरकार के इस फैसले पर पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी निशाना साधा और कहा कि प्रवासियों के लिए ट्रेन रद्द करना न सिर्फ अनैतिक है बल्कि मूलभूत अधिकारों का हनन भी है. कर्नाटक के मुख्यमंत्री यह तर्क कि प्रवासी अगर अपने घर चले गए तो निर्माण कार्य नहीं हो सकेंगे, दरअसल बीजेपी की मानसिकता को दर्शाता है.

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सिद्धारमैया ने कहा कि घर जाना है या उसे रुकना है, यह फैसला मजदूरों को ही करना चाहिए, सरकार इसका निर्णय नहीं लेगी. मजदूर काम या अपनी सेहत में किसी एक का चयन करने के लिए स्वतंत्र हैं. उनके साथ कुछ गड़बड़ हो जाए तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा. इसी तरह का बयान पूर्व कृषि मंत्री और बैतरायणपुरा के विधायक कृष्णा गौड़ा ने दिया. उन्होंने कहा, मैंने मुख्य सचिव से इस बारे में बात की है उनके फैसले पर दोबारा विचार करने का आग्रह किया है. मजदूर गरीब भले हैं लेकिन वे भी इंसान हैं. वे बंधुआ मजदूर नहीं हैं. जिस तरह विदेश में फंसे लोग भारत आना चाहते हैं, वैसे ही ये मजदूर भी अपने घर जाना चाहते हैं.

इसी पर कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री अश्वतनारायण ने कहा कि उन्होंने मजदूरों से बात की है और समझाया है कि वे घर जाते भी हैं तो परिवार से नहीं मिल पाएंगे क्योंकि उन्हें क्वारनटीन में रहना पड़ेगा. कागजी कार्रवाई भी बहुत होगी, इन्हीं सब परेशानी को देखते हुए ट्रेन कैंसल की गई है. पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा कैबिनेट मंत्री जगदीश शेट्टार ने कहा कि सरकार के इस फैसले पर काफी विवाद हो रहा है जबकि सच्चाई कुछ और है. इसका तथ्यों से कुछ भी लेना देना नहीं है.

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