schizophrenia treatment: Schizophrenia: सड़क पर नहीं दिखते हैं मानसिक रोगी, मॉडर्न इलाज का है कमाल – modern treatment of schizophrenia and mental disease in hindi

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सीजोफ्रेनिया एक क्रॉनिक डिजीज है। लेकिन इस बीमारी के मरीज खुद को बीमार नहीं मानता इस कारण दवाई खाने से और डॉक्टर के पास जाने से बचता है। इस स्थिति में मरीज की हालत और अधिक गंभीर होती जाती। मरीज एक सामान्य जीवन जी सके इसके लिए उसके परिवार को अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता होती है…यहां मैक्स हॉस्पिटल पटपड़गंज (दिल्ली) के सीनियर सायकाइट्रिस्ट डॉक्टर राजेश कुमार बता रहे हैं कि बीते दशकों में सीजोफ्रेनिया के इलाज में किस तरह का बदलाव आया है…

बीमारी में ही छिपा है इसका बैरियर

-सीजोफ्रेनिया शक की बीमारी है तो मरीज अपने परिवार पर भी शक करता है मरीज कि मेरा परिवार ही मुझे मारना चाहता है। इसलिए डॉक्टर के पास लेजाकर मुझे पॉइजन दिलाना चाहते हैं या दवाइयों के जरिए मारना चाहते हैं। ऐसी स्थिति सीजोफ्रेनिया के ज्यादातर मरीजों में देखने को मिलती है।

इलाज से जुड़ी मुश्किलें

-साइकॉलजिस्ट और सायकाइट्रिस्ट की कमी के चलते समय रहते रोगी को उचित चिकित्सा नहीं मिल पाती है। इस कारण रोग अपनी गंभीर अवस्था में पहुंच जाता है, जिसे बाद में दवाओं के साथ भी मैनेज करना मुश्किल होता है।

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-सीजोफ्रेनिया के इलाज में एक दूसरी दिक्कत यह है कि लोगों के बीच इस बीमारी को लेकर जागरूकता बहुत कम है। इस जानकारी को बढ़ाने के लिए ही हर साल वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की तरफ से ‘मेंटल हेल्थ अवेयरनेस वीक’ मनाया जाता है और हर साल 24 मई को ‘वर्ल्ड सीजोफ्रेनिया डे’ के रूप में मनाया जाता है।

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सीजोफ्रेनिया का इलाज हुआ आसान

ट्रीटमेंट का मॉर्डन तरीका

-आज के वक्त में इलाज पहले की तुलना में काफी बेहतर हो चुका है। मॉर्डन मेडिसिन लेने के बाद उस तरह की दिक्कत नहीं देखने को नहीं मिलती है, जिस तरह की दिक्कत पुराने वक्त में सामने आया करती थीं।

-मॉडर्न टाइम में सीजोफ्रेनिया के मरीज को यदि सही समय पर ट्रीटमेंट दिलाया जाए तो वह सामान्य जीवन जी सकता है।

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-पहले इस बीमारी के इलाज के दौरान मरीजों को नींद बहुत अधिक आती थी। इलाज आसानी से उपलब्ध नहीं था। लेकिन अब इलाज भी उपलब्ध है और दवाइयां खाने के बाद मरीज को बहुत नींद भी नहीं आती है। इससे व्यक्ति की प्रोडक्टिविटी बनी रहती है।

-जो मरीज इस बीमारी के प्रारंभिक स्तर पर होते हैं, उन्हें यदि समय से दवाई और ट्रीटमेंट दिलाया जाए तो वे सामान्य व्यक्ति की तरह अपना करियर और सोशल लाइफ इंजॉय कर सकते हैं।

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अब नहीं होता दवाओं का साइड इफेक्ट

खत्म हो गया दवाओं का साइड इफेक्ट

-अस्सी या नब्वे के दशक में जिन दवाओं से सीजोफ्रेनिया के मरीजों का इलाज किया जाता था, उन दवाओं का साइड इफेक्ट काफी गंभीर रूप में देखने को मिलता था। इनमें, शरीर का कोई अंग टेढ़ा हो जाना, हर समय कंपकपी आना, हर समय मुंह से लार टपकते रहना या दौरे पड़ जाना शामिल थे।

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-लेकिन मॉडर्न ट्रीटमेंट में इस तरह के साइड इफेक्ट ना के बराबर होते हैं। यदि सही तरीके से ट्रीटमेंट लिया जाए तो कोई दूसरा व्यक्ति यह जज नहीं कर पाएगा कि सामनेवाला इंसान सीजोफ्रेनिया जैसी बीमारी से जूझ रहा है।

-क्योंकि सीजोफ्रेनिया के मरीजों को परिवार, दवाई और डॉक्टर पर शक रहता है। इसलिए मॉडर्न ट्रीटमेंट में इस तरह की टैबलेट्स भी हैं, जिन्हें पानी और खाने में घोलकर दिया जा सकता है। अगर इसमें भी दिक्कत हो तो मरीज को इंजेक्शन दिया जा सकता है, जिसका असर करीब एक महीने तक रहता है।

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