भारत के Covid-19 रिकवरी रेट में उछाल देखने के लिए रहें तैयार – Corona virus get ready to witness a spurt in india covid 19 recovery rate diu

  • 17,000 लोग अस्पतालों-आइसोलेशन वॉर्ड में 10 या ज्यादा दिन से भर्ती
  • सरकार ने 8 मई को हल्के लक्षण वालों के लिए डिस्चार्ज पॉलिसी बदली

भारत में नोवेल कोरोना वायरस का पहला केस चीन के वुहान से केरल लौटे एक मेडिकल छात्र में रिपोर्ट हुआ. इसने एक दिन के बुखार और गले में खराश से अलग और कोई लक्षण नहीं दिखाया. फिर भी उसने एक सरकारी अस्पताल में आइसोलेशन में 25 दिन बिताए. केरल के पठानमथिट्टा की एक अन्य 62 वर्षीय महिला ने आखिरकार 22 अप्रैल को निगेटिव टेस्ट दिखाया. इससे पहले हफ्तों तक बिना किसी लक्षण वाली इस महिला ने 42 दिन अस्पताल में बिताए. इस दौरान उसके 22 टेस्ट हुए.

भारत में महामारी प्रबंधन की खास बातों में अस्पतालों और अन्य देखभाल सुविधाओं में अधिक मरीजों का भर्ती किया जाना भी शामिल है. सरकारी नीतियों के जोड़ के मुताबिक पॉजिटिव टेस्ट देने वाले सभी लोगों को अस्पताल या अन्य केयर फेसिलिटी में भर्ती कराया जाना जरूरी है. साथ ही डिस्चार्ज के लिए RT-PCR टेस्ट का नतीजा निगेटिव आवश्यक है. भारत में कम से कम 17,000 लोग अस्पतालों और आइसोलेशन वॉर्ड में 10 या ज्यादा दिन से भर्ती हैं.

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बुखार न होने पर डिस्चार्ज

लेकिन अब इस स्थिति में सरकार की नीतियों की वजह से बदलाव होगा. ऐसे में आने वाले हफ्तों में सक्रिय केसों के आधिकारिक आंकड़े में तेज गिरावट देखने को मिल सकती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि 8 मई को, सरकार ने फैसला किया कि अब जिनमें हल्के या मध्यम लक्षण हैं, उन्हे लक्षणों का शुरू होना दिखाई देने के 10 दिन बाद डिस्चार्ज कर दिया जाएगा. उन्हें RT-PCR टेस्ट के बिना रिकवर्ड मान लिया जाएगा बशर्ते कि उन्हें अब बुखार न हो.

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ज्यादा लोग रिकवर होने से अप्रैल से Covid-19 मरीजों के अस्पतालों में भर्ती होने का आंकड़ा धीमे बढ़ रहा है. पहली बार सभी मरीजों का हिस्सा, जो वर्तमान में अस्पतालों में भर्ती हैं, 60% से नीचे आया है. 8 मई को सरकार की नीति बदलने के बाद अधिक डिस्चार्ज हो रहे हैं. ऐसे में ये आंकड़ा एक हफ्ते में ही 50% से नीचे आने की उम्मीद है.

सरकारी नीतियों की वजह से भारत में Covid-19 मरीजों के अस्पताल में भर्ती होने की दर ऊंची है. 27 अप्रैल तक सभी पॉजिटिव टेस्ट होने वाले लोग, चाहे वो बिना लक्षण वाले हों, उन्हें मेडिकल फेसिलिटी में आइसोलेट किया जा रहा था. हालांकि जिन्हें इंटेंसिव केयर की जरूरत थी, उनकी हिस्सेदारी कम ही थी. सरकार पहले कह चुकी है कि 85% ने सिर्फ हल्के या मध्यम लक्षण ही दिखाए थे.

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अब तक, अस्पताल या केयर फेसिलिटी में मौजूदा स्थिति में जो भर्ती हैं, उनमें 25-33 % ऐसे हैं जो 10 से ज्यादा दिन से भर्ती हैं. यह एक अनुमान है और वास्तविक संख्या की न्यूनतम रेंज है. क्योंकि इसमें पिछले 10 दिन में रजिस्टर ऐसे नए केसों की डबल काउटिंग शामिल है, जिनकी पहले ही मृत्यु हो चुकी है. इस स्थिति में सरकार की नई नीति से बदलाव आएगा. अब जिनमें हल्के या मध्यम लक्षण हैं, उन्हे लक्षणों का शुरू होना दिखाई देने के 10 दिन बाद डिस्चार्ज कर दिया जाएगा. इसके मायने है कि ‘रिकवरी दर’ खासी ऊंची होना शुरू हो जाएगी.

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लेकिन ये आंकड़े राज्यों में अलग-अलग होते हैं, महाराष्ट्र पर संस्थागत लोगों का सबसे ज्यादा बोझ है, खासतौर पर वो जिन्हें 10 दिन से ज्यादा भर्ती हुए हो गए हैं. वहीं केरल और बिहार में ऐसे लोगों की संख्या कम है जो 10 से ज्यादा दिन के लिए संस्थागत भर्ती हुए यानि अस्पताल या केयर फेसिलिटी में.

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85 प्रतिशत हल्के केस

सरकार के अनुमान के मुताबिक 85 प्रतिशत केस हल्के या मध्यम लक्षण वाले होते हैं. रिकवरी के नए अनुमान उससे पहले के 10 दिन में दर्ज कुल नए केसों के 85 प्रतिशत की गणना के आधार पर किए गए. डिस्चार्ज के नए नियम के साथ भारत में सक्रिय केसों का आंकड़ा तेज़ी से नीचे आएगा. अगर ये नियम मई के पहले हफ्ते में लागू किया होता तो भारत में उस वक्त तक 9,000 ज्यादा लोग ‘रिकवर्ड’ घोषित हो जाते.

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क्या इसके मायने ये हैं कि भारत में बीमारी का वक्र तेजी से बदल रहा है? बहुत ज्यादा नहीं, लेकिन आंकड़े परिभाषा से जुड़े बदलावों की जरूर ट्रिक करेंगे, जो उन्हें रेखांकित करते हैं.

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