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मप्र मंत्रिमंडल विस्तार… बगावत का भय

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मप्र मंत्रिमंडल विस्तार… बगावत का भय

क्या कांग्रेस के सम्पर्क में है बीजेपी के विधायक?


खबर अंदरखाने की / धीरज चतुर्वेदी

आसान नहीं मप्र कि सियासत कि राह क्योकि राजनीति है सम्भावनाओ का खेल। बीजेपी ने कभी सोचा नहीं होगा कि कमलनाथ कि कुर्सी पलटने के बाद सत्ता तो हासिल हो गई लेकिन मंत्रिमंडल का विस्तार करना गले कि फ़ांस बन रह जायेगा।

ताकतवर क्षत्रपों को खुश करना मज़बूरी तो सिंधिया के एक बीजेपी में प्रवेश नये दल का भी समायोजन करना चुनौती भरा तो है। कभी कभी कयास भी सच साबित होकर अल्टा पल्टी करा देते है। यही जोखिम बीजेपी के सामने है क्योंकि कभी मैनेजमेंट गुरु कहलाने वाले कमलनाथ अपना मैनेजमेंट करने में अक्षम हुए हो पर गुणाभाग तो लग रहे है। इन सियासी चर्चाओं को नजर अंदाज भी नहीं किया जा सकता।


सविधान के अनुसार किसी भी राज्य में मंत्रियो कि संख्या 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। 230 सीटों वाली मप्र विधानसभा में फिलहाल 206 सदस्य है। इस आधार पर मंत्रियो कि संख्या का दायरा 30 होता है। मुख्यमंत्री सहित 5 मंत्री पहले से ही प्रतिनिधितत्व कर रहे है इसलिये 24 मंत्री ओर बनाये जा सकते है। सिंधिया ने जब कांग्रेस सरकार को झटका दिया था तब उनके साथी बने वह 6 चेहरे थे जो मंत्री पद पर आसीन थे। साथ ही टूटकर जाने वालो में राजयवर्धन दत्तीगांव, बिसाहूलाल, एंदल कंसाना वो थे जो मंत्री पद दौड़ में थे।

सियासी खबरों के अनुसार सभी 9 को मंत्री पद देने कि शर्त पर ही उठापठक हुई थी। वर्तमान हालात पर गौर किया जाये तो पहले मंत्रिमंडल विस्तार में सिंधिया खेमे के तुलसी सिलावट ओर गोविन्द सिंह को फिट कर दिया गया। सिंधिया खेमे के शेष 7 चेहरों को भी नये मंत्री मंडल में स्थान मिलता है तो शेष संख्या 18 रह जाती है। इसमें निर्दलीय सुरेंद्र सिंह शेरा ओर रामबाई को भी जगह देना इसलिये मज़बूरी है क्योंकि दोनों वर्तमान में विधायक भी है ओर मंत्री पद कि शर्त पर ही बीजेपी को समर्थन दिये है। इस आंकड़े से 16 कि संख्या वह है जिसमे बीजेपी के मूल कैडर के विधायकों को समायोजित किया जाना है। सिंधिया व अन्य को मैनेज़ कर लिया जाता है तब भी 20 से अधिक बीजेपी विधायकों कि संख्या नहीं पहुँचती जो मंत्री पद से नवाजे जा सके।

दूसरा पहलू देखे तो शिवसरकार के पूर्व कार्यकाल में मंत्री रहे विधायकों कि बड़ी फेहरिस्त है। साथ ही उन लोगो को भी सम्मान देना जरुरी है जिन्होंने कमलनाथ का तख्ता पलटने में मुख्य भूमिका निभाई, जैसे अरविन्द भदौरिया। बीजेपी आलाकमान को यह सामंजस्य भी बैठाना टेढ़ा है जिससे क्षत्रप खुश रहे यानि उनके करीबी विधायकों को भी मंत्रिमंडल का हिस्सा बनाया जाये। हालात तो दुश्वार है क्यो कि सावधानी हटी ओर दुर्घटना घटने के कारण ही कांग्रेस को मुँह कि खानी पढ़ी है। इसलिये बीजेपी कांग्रेस कि आपबीती को आत्मसात कर फूक फूक कर कदम जरूर रख रही है लेकिन सभी को खुश संतुष्ट करना भी आसान नहीं है। कांग्रेस तो इंतजार के मूड में दिखाई दे रही।

चर्चाएं तो यह भी है कि कमलनाथ ने अपना जाल अभी से बिछा दिया है। कई बीजेपी के नेता ओर विधायक कांग्रेस के सम्पर्क में भी बताये जाते है। यह तय है कि इस बार सियासी खेल उस सर्कस कि तरह होगा जिसमे झूले पर सवार कभी ऊपर जाता है तो कभी नीचे आ जाता है.।

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