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गाँव के बीचोबीच बरगद के पेड़ तले आज बड़ी हलचल थी। इतवार की सुबह आज पूरा गाँव धीमे धीमे जमा होने लगा था। बड़का वकील साहब बीच कुर्सी पर कुछ विचार करते हुए बैठे थे। तभी बगल के गाँव से राम किशोर सिंह और पंचानन पांडेय आ बैठे।
वकील साहब सीताराम शुक्ला कई वर्षों से प्रधान पद पर थे। वह आस-पास के जिला-जवार में अत्यंत सम्मानित व्यक्ति थे। गाँव के छोटे-मोटे झगड़े हो या बड़े-बड़े फौजदारी, सबमें उनका निर्णय मान्य होता था। गंगा किनारे बसा ये गाँव कंचनपुर छोटा ही था परन्तु इस गाँव में हर जाति के लोग थे। कहते हैं कि दूर गाँव से अपनी प्रजा के साथ आकर सुकुल लोगों ने यह गाँव बसाया था। आसपास ऐसे कई छोटे-छोटे गाँव थे, जिन्हें इसी प्रकार बसाया गया था।
सुबह के ग्यारह बजे तक बरगद के आस पास भीड़ जमा हो गई। आज पंचायत थी। अगल बगल के गाँवों से भी लोग आए थे। खुसुर फुसुर हो रही थी। वकील साहेब बोल उठे, “हाँ तो दोनों पक्ष को बारी-बारी से बात रखने का मौका दिया जाएगा। फिर पंचायत जो निर्णय लेगी वो आप सबको मान्य होगा। ठीक है?”
सिर झुकाए बैठे तिरभुवन हाँ में सिर हिला कर रह गए। पहले पतरूवा की मेहरारू बोलना शुरू हुई, “ए बाबा! बिना सासू के घर में अपनी हैसियत से दोनों मरद मेहरारू जोड़ बटोर के ई आसवा को पार लगाए रहे। बियाह किए, गवना किए अउर बिदा किए। आ ई लीला देखिए कि इसको महीने भर बाद ही मरद छोड़ गया कि ई बौराहिन है, पागल है। ऊ कौनो झूठ तो बोला नाही कि लड़ें और गरजें, ई लईकी तो शुरूवे से दिमाग से कमजोर रही।”
तिरभुवन चुपचाप मुड़ी झुकाए अपनी पतोहिया की बात सुन रहे थे। वो फिर बोलना शुरू हुई, “हमरो तीन गो बेटी और दो बेटवा हैं। कब तक ई पागल को सँभाल पाते तो हम इसे निकाल दिए। तब्बो हमरे ही जमीन पर गाँव के बाहर बाँस की कोठी के नीचे झोपड़ा डाल रहने लगी। पूरे दिन आस पास के गाँव में घूमती, अपना गुजारा कर लेती। ई दोनों बाप पूता शहर में मजदूरी करते हैं तो बच्चों का खर्चा निकल जाता है। अब राम जाने कि पगली केकरा से का करवाई की पेट से हो गई। जब तक जानते तब तक समय निकल चुका था आ अब दो हफ्ता पहले लड़का जनी है। अब बाबू जी आए और बोले कि आसवा को घर में रखो नहीं तो हिस्सा नहीं देंगे। पाप के इस बोझ को हम अपने घर नहीं ले जाएँगे। हमारा यही अरज है, सरकार।”
इतना बोल के वह क्रोध में धम्म से बैठ गई। बुज़ुर्ग और विरादरी में आदर की पात्र बिलास बो काकी बोल पड़ीं, “ए बाबा! इहे पूछा जाए कि कौन है बच्चें का बाप?”
वकील साहेब बोले, “वो कैसे आएगी?” तब तक दो औरतें आसवा और बच्चे को लिए आ पहुँची थीं। सन्नाटा पसरा था। सब आसवा को अजीब नजर से देख फुसफुसाने लगे। मानसिक बीमार थी आशा। काला पक्का रंग, लंबा कद, गठा शरीर, गंदे कपड़े बिखरे बाल। वो रोते हुए बोल पड़ी, “ए बाबा! ऊ लोग हमको बड़ी मार मारे थे और हमारे साथ गंदा काम किए। हम बहुत रोए, चिल्लाए पर वो नहीं माने। हम बाबा को बताए तो वह बोले कि चुप रहना वरना वो लोग सबकी जान ले लेंगे।”
वो पगली अपनी आप बीती सुना रही थी। जवार के सारे प्रतिष्ठित लोग वहाँ बैठे थे। ऐसा नहीं था कि आसवा जो राज खोलने वाली थी, वो किसी को पता नहीं था। ‘समरथ को नहीं दोस गोसाईं’ के पालन में आस पास के गाँव जवार में क्या मजाल कि कोई कुछ बोले।
आसवा ने आगे कहा, “हम दुनो जन को चिन्हते हैं बाबा। सरकार ऊ लोग बड़का गाँव के …” आसवा को बीच में ही रोकते हुए उसके सिर पर हाथ रखकर बिलास बो काकी बोल पड़ीं, “ए बाबा! ई बेचारी पगली तो भर गाँव उछलत कूदत आपन दिन बीता देती थी। ई सब रात के करियाई में भईल काम है। ई पगली कइसे पहचान सकी होगी। गलती से गलत नाम धर देगी तो सन्यासी फाँसी हो जाएगा, बाबा।“ तिरभुवन ने भी काकी की बात का समर्थन किया। काकी आसवा का सिर सहलाती रहीं। आसवा बोलने की कोशिश में थक कर चुप हो गयी थी और सिर्फ रो रही थी।
लड़के जवान थे। हो गई गलती, पगली को ही कायदे से रहना था। दिन भर गाँव गाँव घूमेगी तो ऐसा होना ही था। लोग पहले ही फैसला दे चुके थे कि अपराधी कोई नहीं पगली ही है। आज तो बस घर जाने का निर्णय देना था पर अपराध बोध कहीं ना कहीं हर व्यक्ति के हृदय के कोने में दबा ही था। पंचायत दुविधा में थी। सिर्फ एक पक्ष की आधी बात थोड़ी सुविधाजनक थी। निर्णय अभी हुआ नहीं था। पर दोनों पक्षों को बखूबी जानती जनता एकतरफा न्याय कर चुकी थी।
तभी दूर गंगा पार से अपने खेत की सब्जी बेचने आने वाली तुरहिनिया आ गयी। भीड़ देखकर पंचायत में पहुँच गई। आज वो महीनों बाद आई थी। मौसम के अनुसार फल सब्जी लेकर गंगा पार से इस पार बेचने आती रहती थी। साल में कई चक्कर लगा जाती। भीड़ देख उत्सुकतावश रुक गई और जल्द ही पूरा मामला समझ गई। पंच लोग निर्णय लेने की जद्दोजहद में लगे ही थे कि तुरहिन गंभीर और तेज़ आवाज़ में बोल उठी, “जो अगर पंच लोग आज्ञा दें तो हम कुछ कहना चाहेंगे।”
पूरे गाँव की आँखें तुरहिन की ओर उठ गईं। वो अपनी जगह खड़ी हुई और बोल उठी, “दस बरस बिआह को हो गए। बाबा विश्वनाथ की किरपा से सब पाए पर माँ नहीं बन पाए। बंजर ज़मीन पर कुछ ना उगे तो परती छोड़ दी जाती है। कई साल देवता पित्तर मनाने और ओझाई-सोखाई कराने के बाद भी हम पापिन से जब कोई फूल ना उगा तो घर का कोना पकड़ा दिया गया और हमरी सास दोसर पतोह ले आईं। वह दो साल बाद चल बसी पर संतान ना दे पाई। यही हूक लेकर सास भी सिधार गईं। माँ बनना हर सुहागन का सौभाग्य है। पगली के लिए यही सुख दुर्भाग्य बन गया। हमें दे दीजिए ये बच्चा। हम भी तर जाएँगे।”
पंचों के साथ जनता भी इससे सहमत थी। गंगापार की तुरहिन का व्यवहार किसी से छुपा नहीं था। बच्चा तुरहिन ले जाएगी, यह सुन सहमी हुई हिरनी सी अपने बच्चे को आँचल से छुपाती हुई आसवा चिल्लाई, “नहीं, हम अपना बाबू किसी को नहीं देंगे। हमारा दूध पीता है, हम नहीं ले जाने देंगे।” और वो इधर उधर छुपने सी लगी। माँ, माँ होती है, क्या पागल, क्या होशियार। वहाँ मौजूद हर माँ का दिल पसीज गया पर कोई उपाय नहीं था। बच्चे का भविष्य सबको ज़रूरी लगा। बिलास बो काकी आँसू पोंछते हुए उठीं और आसवा से बच्चे को अलग कर तुरहिन को थमा दिया।
“पुलिस की लिखा-पढ़ी बाद में होती रहेगी।” पंचों ने फरमा दिया। और फिर जो चित्कार सबने सुनी, वो पत्थर दिल को भी पिघला दे। आशा अपने बच्चे के लिए मछली सी तड़प रही थी। जनता मूक दर्शक थी। चौराहे तक गई तुरहिन वापस लौट आई। वह आशा की गोद में बच्चा रखकर पंचों से बोल उठी, “आसवा को भी ले जाने का कवनो लिखा पढ़ी होगा का मालिक? हम इसे भी ले जाएँगे, अपनी सौत बनाकर। हमारे कान्हा को हम मिलकर पाल लेंगे। ई अपना बेटा बाँट सकती है तो हम भी अपना सुहाग बाँट लेंगे।”
सब स्तब्ध और नि:शब्द रह गए। मातृत्व की परम शक्ति सही और ग़लत से परे रहकर निर्णय ले चुकी थी। पंचों के सिर से ज़िम्मेदारी का बड़ा बोझ उतर गया था। इस सुखांतक निर्णय से एक बार फिर स्थापित हो गया कि पंच ही परमेश्वर होते है – सत्य या असत्य।

