मुंबई: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) द्वारा H1-B वीजा पर लिए गए चुनावी फैसले की सबसे ज्यादा मार भारतीय आईटी कंपनियों (Indian IT Companies) पर पड़ रही है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, नियमों में संशोधन से आईटी कंपनियों का मुनाफा 5.80 फीसदी तक कम हो जाएगा और मिड-टियर कंपनियों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना होगा.
तीन साल में दिखेंगे प्रभाव
डोनाल्ड ट्रंप ने 3 नवंबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को ध्यान में रखते हुए H1-B वीजा संबंधी नियमों में संशोधन किया था. ट्रंप ने स्थानीय लोगों को ज्यादा से ज्यादा फायदा पहुंचाने के लिए यह कदम उठाया है, लेकिन भारतीय आईटी कंपनी और पेशेवरों पर इसके नकारात्मक प्रभाव होंगे. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले तीन सालों में ये नकारात्मक प्रभाव साफ तौर पर नजर आने लगेंगे.
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अमेरिका पर निर्भरता ज्यादा
$180 बिलियन से अधिक का भारतीय आईटी उद्योग अमेरिका (America) पर काफी हद तक निर्भर है और भारतीय पेशेवरों को ऑनशोर क्लाइंट लोकेशन पर काम के लिए भेजा जाता है, जिसके लिए H1-B वीजा जरूरी है. रेटिंग एजेंसी इक्रा (Icra) ने कहा कि संशोधन के पूरी तरह से लागू होने के बाद ऑनशोर H1-B वीजा के लेवल के आधार पर मार्जिन इफेक्ट 2.60-5.80 फीसदी की रेंज में होगा.
कई संशोधन किये
संशोधन में H-1B वीजा के लिए अर्हता प्राप्त करने और न्यूनतम वेतन स्तर बढ़ाने और ऑनसाइट थर्ड पार्टी एम्प्लॉई वीजा की श्रेणियों के लिए कार्यकाल को तीन साल से घटाकर एक साल करना आदि शामिल हैं. इक्रा के उपाध्यक्ष गौरव जैन (Gaurav Jain) ने कहा, ‘बिना प्राप्ति में वृद्धि और अन्य कम गंभीर कारकों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न प्रावधानों के हमारे आकलन के अनुसार, सभी प्रावधानों का सकल प्रभाव 2.85-6.50 प्रतिशत के दायरे में होगा’.
क्रेडिट प्रोफाइल में होगी गिरावट
जैन के मुताबिक, बड़ी कंपनियां यह झटका सह लेंगी, क्योंकि उनकी बैलेंसशीट पहले से मजबूत रही है, लेकिन मध्यम आकार वाली कंपनियों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा. उन्हें अपने क्रेडिट प्रोफाइल में गिरावट का सामना करना पड़ सकता है. अकेले वेतन नियमों में बदलाव से प्रवेश स्तर के वेतन में 20-30 प्रतिशत की वृद्धि होगी. व्यापक रूप से पसंदीदा सामान्य इंजीनियरिंग डिग्री नियमों में संशोधन के बाद शायद पर्याप्त न रहे.
ऑफशोरिंग की गति बढ़ेगी
उन्होंने आगे कहा कि बहुत अधिक शुरुआती वेतन होने के कारण ऑफशोरिंग की गति में वृद्धि की अपेक्षा है. भारतीय कंपनियां जो पहले ही पारंपरिक/लैगेसी सेवाओं के मूल्य निर्धारण का दबाव झेल रही हैं, वे सेवा वितरण की बढ़ती लागत को दूसरों पर डालने का प्रयास करेंगी. इससे ऑफशोरिंग में बढ़ोत्तरी होगी और यह क्लाइंट एवं आईटी कंपनियों दोनों के लिए जीत जैसा होगा.


