सोनू सूदः सीधे काम की बात – man at work

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम का एसडीजी स्पेशल ह्यूमैनिटेरियन एक्शन अवॉर्ड पानेवाले अभिनेता सोनू सूद ने (पत्रकार मीना अय्यर के साथ लिखी) अपनी किताब आइएम नो मसीहा और अपने परोपकारी भविष्य पर

● आपने यह किताब क्यों लिखी?
मेरी मां प्रोफेसर थीं और वे कहा करती थीं कि जिंदगी के बेहतरीन अनुभवों को कागज पर उतार लेना चाहिए जिससे वे हमेशा आपके पास बने रहेंगे. मुझे लगता है जैसे हर जिले में मेरा परिवार है और मैं उन लोगों के साथ वे किस्से साझा करना चाहता हूं जो शायद जानना चाहें कि ‘घर भेजो’ अभियान को कैसे अंजाम दिया गया. इससे कुछ और लोगों को आगे आकर दूसरों का जीवन बदलने की प्रेरणा मिल सकती है.

● आपने बॉलीवुड में शुरुआती दिनों के अपने संघर्ष का जिक्र किया है. बॉलीवुड में नेपोटिज्म को लेकर चली बहस पर आपके क्या विचार हैं?
जरूरत से ज्यादा ही इसका रायता फैला दिया गया. हर किसी को पता है कि इंडस्ट्री के भीतर के लोगों को दूसरों पर बढ़त मिली होती है. लेकिन वहां टिक तो आप अपनी प्रतिभा के बूते ही सकते हैं ना!

● आपने श्रमिकों की मदद के लिए की गई पहल इलाज इंडिया और प्रवासी रोजगार योजना के बारे में लिखा है. तो क्या फिल्मों से किनारा कर रहे हैं?
फिल्में मेरे परोपकारी कामों के साथ-साथ चलती रहेंगी. फिलहाल तो मैं एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहा हूं कि काम फिर अपने आप चलता रहे जिससे कि मैं अगर शूटिंग वगैरह में व्यस्त भी हो जाऊं तो टीम सरकार के और दूसरे लोगों से बात करके काम आगे बढ़ाती रहे.

● आरोप है कि यह सब आपने राजनीति में उतरने के लिए किया…
फिलहाल राजनीति में जाने की न तो मेरी कोई योजना है और न ही उसमें रुचि है.

 


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