थारू जनजाति के लोगों की खास तरह की होली लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है.
भारत-नेपाल (Indo-Nepal) सीमा पर सुहेलवा वन्यजीव प्रभाग के घने जंगलों में बसे थारू जनजाति (Tharu Tribe) के लोग होली (Holi) का उत्साह खास तरह से मनाते हैं. ये लोग अपने कुलदेवता को टीका लगाकर त्योहार को शुरू करते हैं.
सीमा के उस पार नेपाल राष्ट्र में भी थारू जनजातियों की बड़ी संख्या निवास करती है. होली थारू जनजाति के प्रमुख त्योहारों में एक है. मुहूर्त के अनुसार थारू जनजाति के लोग होलिका दहन के बाद अपने-अपने घरों में स्थापित देवताओं को भभूत लगाते हैं. कुछ लोग गांव में स्थापित सामूहिक कुल देवता के स्थान पर पहुंचकर उनकी पूजा करते हैं और भभूत लगाने के बाद ही होली खेलते हैं. थारू जनजाति के लोगों की होली खेलने की परंपरा भी कुछ हटकर है. गांव के सभी लोग सबसे पहले मुखिया के घर पर इकट्ठा होते हैं. मुखिया के घर से ही होली की शुरुआत होती है. मुखिया के घर पर पहुंचकर महिलाओं और पुरुषों की अलग-अलग टोली बन जाती है.
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इन टोलियों में ढोल, मृदंग और मजीरा बजाते हुए लोग एक दूसरे पर अबीर-गुलाल और रंगों की बरसात करते हैं. यह टोलियां पूरे गांव में भ्रमण करती हैं और रंग के उत्सव में सराबोर हो जाती है. इस दौरान जमकर थारू नृत्य किया जाता है. थारू नृत्य के साथ फगुआ मांगने का कार्यक्रम होता है, जिसमें लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हों. महिलाएं और पुरुष अपनी-अपनी टोलियों में नाचते गाते एक दूसरे पर रंग डालते हैं. जब दो टोलियों का आमना-सामना होता है तो एक दूसरे को रंगने की होड़ मच जाती है.होली के त्यौहार में थारू जनजातियों में पकवान का बड़ा महत्व होता है. होली के दिन गुझिया और खीर विशिष्ट मिष्ठान होता है. होली के अवसर पर प्रत्येक घरों में मांसाहार पकया जाता है. इमिलिया कोडर के पूर्व प्रधान और थारु नेता मंगल थारु कहते हैं कि दशहरे के बाद होली थारुओं का मुख्य त्यौहार है. समाज के सभी लोग गांव में इकट्ठा होकर सबसे पहले कुलदेवता को भभूत लगाकर होली का शुभारंभ करते हैं. और फिर हर्षोल्लास के साथ इस त्योहार को मनाते हैं. टोलियां बनाकर होली खेलते हैं और फिर एक दूसरे के गले मिलकर होली की शुभकामनाएं भी देते हैं. होली के आठवें दिन ठठेरा फोड़ने के साथ ही होली के त्यौहार का समापन होता है.


