आईएएस ने एक साल की सजा का अपराध किया है
सूरजपुर के कलेक्टर रणवीर शर्मा का कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 323 के जमानती गैर संज्ञेय अपराध है. इसमें एक साल की सजा का प्रावधान है. लेकिन,छत्तीसगढ़ सरकार ने रणवीर शर्मा का सिर्फ सूरजपुर के कलेक्टर पद से तबादला मात्र किया है. उन्हें न तो अनुशासनात्मक कार्यवाही का नोटिस दिया गया है और न अपराध पंजीबद्ध किया गया है. इससे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं. यह सवाल भी बड़ा है कि क्या किसी लोक सेवक अपने मालिक अर्थात आमजन पर हिंसात्मक कार्यवाही का अधिकार प्राप्त है? मध्य प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक स्वराज पुरी कहते हैं कि किसी भी लोक सेवक को बल प्रयोग करने का अधिकार नहीं है. लोक सेवक की जिम्मेदारी कानून का उल्लंघन पाए जाने पर कानूनी कार्यवाही करने का है. यह अदालत तय करती है कि अपराध हुआ अथवा नहीं? सजा भी अदालत तय करती है. रणवीर शर्मा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के 2012 बैच के अधिकारी हैं.
अंग्रेजों के जमाने के कानून से चलती व्यवस्था
देश की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में आईएएस को सर्वोच्च सेवा माना जाता है. विदेश सेवा और पुलिस सेवा इसके बाद आते हैं. 1858 में अंग्रेजों द्वारा विकसित की गई दमनकारी व्यवस्था में इंडियन सिविल सर्विस की स्थापना की गई थी. यह व्यवस्था 1857 की क्रांति से उपजी थी. 1947 में देश के आजाद होने के बाद इसे आईएएस नाम दे दिया गया. लेकिन,अंग्रेजों के बनाए कानूनों में कोई बड़े बदलाव नहीं किए गए. कलेक्टर जिले का मुखिया होता है और वह जिला दंडाधिकारी भी कहलता है. दंडाधिकारी के तौर पर उसे अर्ध न्यायिक स्वरूप की शक्तियां भी विभिन्न कानूनों में दी गईं हैं. शक्तियों की अवधारणा में अंग्रेजों के कानून हैं. कुछ साल पहले तक देश में पुलिस भी सीधे कलेक्टर अर्थात जिला दंडाधिकारी के अधीन ही होती थी. लेकिन,सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद पुलिस अधीक्षक की गोपनीय चरित्रावली लिखने के अधिकार कलेक्टर से छीन लिए गए. उसके बाद से ही पुलिस अफसरों ने कलेक्टर के निर्देशन में सीधे काम करना बंद कर दिया. यद्यपि दंडाधिकारी शक्ति अभी मजिस्ट्रेट के नाम प्रशासनिक अधिकारियों के पास हैं.
आईएएस के दबदबा कायम रखने की मंशाआईएएस अधिकारियों के पास दंडाधिकारी शक्तियां केंद्रित करने की वजह पुलिस के निरंकुश होने की संभावना के कारण किया गया. तर्क दिया गया कि अंग्रेजों के दौर में जनता पर जुल्म पुलिस वालों ने ही किया था. यद्यपि 1861 का पुलिस एक्ट आज भी देश में लागू है. इसमें बदलाव का साहस सरकार नहीं जुटा पा रही है. विधायिका बदलाव करना भी नहीं चाहती. अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए अंग्रेजों का बनाया कानून उनकी काफी मदद करता है.
रणवीर शर्मा देश के ऐसे पहले आईएएस अधिकारी नहीं हैं, जिन्होंने आम आदमी पर पद का रुतबा दिखाया है. कोरोना काल में ही अगरतला के जिला मजिस्ट्रेट शैलेश कुमार यादव ने एक शादी हॉल में घुसकर दूल्हे और बारातियों के साथ मारपीट की थी. पश्चिमी त्रिपुरा में जिला मजिस्ट्रेट डॉक्टर शैलेश कुमार यादव ने बारातियों के साथ जब मारपीट की तब उन्होंने कहा कि थाना प्रभारी को मैं मजिस्ट्रेट की हैसियत से निलंबित कर रहा हूं. बाद में घटना का वीडियो वायरल होने के बाद त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने यादव को सस्पेंड कर दिया. यादव के खिलाफ पीड़ित परिजनों की ओर से एफआईआर भी दर्ज कराई गई. दिलचस्प यह है कि शादी समारोह जिला मजिस्ट्रेट की औपचारिक अनुमति के बाद भी हो रहा था.
रणवीर शर्मा के रवैये की आलोचना एसोसिएशन खिलाफ
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सिर्फ कलेक्टर का तबादला किया है. लगता है कि वे नौकरशाहों से अपेक्षित लोक सेवक के भाव को नजरांदाज कर रहे हैं. बघेल कहते हैं कि सार्वजनिक जीवन में इस तरह का आचरण स्वीकार नहीं है. मुख्यमंत्री पीड़ित युवक के परिजनों से सार्वजनिक रूप से माफी भी मांग रहे हैं. कलेक्टर ने जिस युवक की पिटाई कि वह कोरोना से पीड़ित परिजन की दवा लेने बाहर निकला था. पिटाई का जो वीडियो वायरल हुआ है,उसमें कलेक्टर पुलिस कर्मियों को पिटने के लिए उकसा भी रहे हैं. आईपीसी में उकसाने की धारा अलग है.
छत्तीसगढ़ आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष चितरंजन खेतान कहते हैं कि शर्मा को पीड़ित युवक के पिता से माफी मांगना चाहिए और नया मोबाइल भी देना चाहिए. खेतान कहते हैं कि कलेक्टर का रवैया सेवा और सभ्यता के खिलाफ है. आमतौर पर आईएएस एसोसिएशन अपने किसी साथी के खिलाफ नहीं बोलती. लेकिन,छत्तीसगढ़ आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष खेतान की प्रतिक्रिया से बताती है कि वे लोक सेवक की भूमिका को व्यापक स्वरूप में देख रहे हैं. लेकिन,छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल,त्रिपुरा के मुख्यमंत्री की तरह कठोर रूख क्यों नहीं अपना रहे?
रिश्वत लेते पकड़े गए फिर भी मिली कलेक्टरी
आजादी के पचहत्तर साल के बाद भी यह देखा जा रहा है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि लोक सेवक के कदाचरण के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने से डरता है. इसकी बड़ी वजह हमारी संवैधानिक व्यवस्था में कार्यपालिका का भाव स्थायी होना है. यह निष्पक्ष प्रशासन के लिए जरूरी भी है. व्यक्ति एक बार शासकीय नौकरी में आ गया उसके बाद वह रिटायरमेंट तक अपने पद पर बने रहता है. लेकिन विधायिका में जनता बदलाव कर देती है. चुने हुए जन प्रतिनिधि, जनहितों के काम के लिए शासकीय अमले पर आश्रित होते हैं. इस कारण सत्ता में होने पर भी आईएएस अफसर के खिलाफ कोई कार्यवाही कर उन्हें अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहता. रणवीर शर्मा का ही उदाहरण सामने है. वे 2015 में रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए थे. उस वक्त वे भानुप्रतापपुर में एसडीएम थे. उस वक्त भी सरकार ने उन्हें तबादला कर बचा लिया था. राज्य में रमन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार थी. सवाल यह उठता है कि जो अधिकारी रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ा जाए क्या उसे कलेक्टर बनाया जाना चाहिए? लेकिन पिछले साल मई में भूपेश बघेल ने उन्हें सूरजपुर का कलेक्टर बनाकर सभी को चौंका दिया था.
जन प्रतिनिधियों पर हावी होते लोक सेवक
चुने हुए जनप्रतिनिधि की राजनीति कई बार नौकरशाही पर आश्रित देखी जाती है. मूल्य और सिद्धांतों का इसमें अभाव होता है. कार्यपालिका को संविधान में जिस लोक सेवक के भाव से देखा गया इसके विपरीत वह वास्तविक शासक की तरह काम करता दिखाई देता है. किसी भी दल की सरकार हो उसे संरक्षण मिलता रहता है. मध्यप्रदेश में भी दो साल पहले आईएएस अधिकारी निधि निवेदिता ने सीएए के समर्थन में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता की पिटाई कर दी थी. राजनीतिक कारणों से तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने निधि निवेदिता का बचाव किया था. संयोग देखिए रणवीर शर्मा और निधि निवेदिता दोनों एक ही बैच 2012 के आईएएस हैं.
सीआरपीसी की धारा में मिले संरक्षण का दुरुपयोग
दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 197 शायद वह वजह है, जिसके कारण नौकरशाही बड़े-बड़े कारनामे करने के बाद भी बच जाते हैं. यह धारा कार्यपालिका और न्यायपालिका को संरक्षण प्रदान करती है. इस धारा के तहत यदि केंद्र अथवा राज्य सरकार ने मंजूरी नहीं दी तो कितना भी बड़ा अपराध किया हो, मुकदमा नहीं चल सकता. रणवीर शर्मा के खिलाफ मामला दर्ज होता है तो भी 197 की अनुमति के लिए मामला केन्द्र सरकार को भेजना पड़ेगा. सालों तक अनुमति लटकी रहेगी. मुकदमा भी नहीं चलेगा.
दिनेश गुप्ता
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.


