छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- बस्तर के ‘ढुसिर’ वाद्य यंत्र बनाम सारंगी के चमत्कार

अइसन बइद, बइगा-गुनिया, ओझा अउ पंडा हे के बड़े-बड़े बीमारी ला झाड़-फूंक में अइसे छूमंतर कर देथें जेकर खातिर बड़े-बड़े डिग्रीधारी अउ ‘फारेन रिटर्न’ डॉक्टर मन लाखों रुपया डकार लेथे फेर बीमारी जस के तस माढ़े रहिथे. मरीज तड़प-तड़प के जान गंवा देथे.

ओतेक दूरिहा बात ला नइ लमाके ओला इही तीर से शुरू करे जाथे, के ये बात ला तो सबो झन जानत, समझत अउ सुने होहू के जब रात मं लइका रोथे तब ओकर महतारी मन थपकी देवत लोरी गा-गा के सुना-सुना के ओला सुताय के उदीम करथे. कतको लइका उतिलइंग असन होथे, सुते के ढोंग करथे फेर नइ सुते ले धरय. तब ओला ‘सुत जा रे बेटा सुत जाबे रे, तोर दाई गे हे चिचोल खोंदरा, तोर पर लानही पाट फुंदरा, तोला सोखाही गोइहा के गार’ जइसन लोरी सुनाथे, ओला थपकी मार के सुताय के उदीम करथे.

लइका जब लोरी मन नइ सुते ले धरय, ये उदीम काट नइ करय तब ओला डेरवावत कहिथें- सुत जा रहे बेटा, नइते कोलिहा, हुर्रा, बघवा आ जही, अउ झपट के ले जाही. अब नानकीन लइका, का जानही हुर्रा, कोलिहा, अउ बघुआ ला, अइसने अउ एक ठन फिलिमि डॉयलॉग ला सुनाथे-“बेटा सो जा नहीं तो गब्बर आके ले जाएगा”. अइसने ओ हर फेर कहिथे-सो जा बेटा, काबर अतेक पदोथस मोर सरी काम बुता माढ़े हे. तोर डोकरी दाई कइही- काम के ओतहिन हा ढचरा करत हे, ढोंग हे बेटा ला सुताय के. हमरो मन के तो दू-दू तीन-तीन झन लोग लइका रिहिस हे, फेर अइसन लइका ला धरे नइ बइठे राहन. ताना मारही बेटा, सुत जा रे मोर दुलरवा लइका. तोर बाप आही तउन अलग हुदेसना मारही. फेर से लइका ला सुतना रइही तब तो सुतही. मार-गारी, ताना तो बदे रहिथे महतारी मन के भाग मं.

जब लोरी हा लइका ला सुतायबर फेल होगे तब एक ठन सुग्घर ढंग के परयोग बस्तर अंचल मं करे के खबर मिले हे. कइसनो लइका रोवत गावत रइही, चाहे प्रसव पीरा मं कलहरत महतारी अउ लइका होवय दोनो झन मं जब एकर परयोग करे गे हे तेमा फायदा होय के जानकारी मिले हे. बताथें- बस्तर के वन अंचल मं ‘ढुसिर’ नांव के एक ठन बाजा (वाद्य यंत्र) होथे. जब एला बजाय जाथे तब नइ सुतत राहय तइसनो लइका मन ला निंदरी (नींद) आ जथे, झपकी मारत-मारत सुत जथे.

अब ये ‘ढूसिर’ बाजा का हे तेला जानिन. ये बाजा ला सल्फी के रेशा ले तइयार करे जाथे. बस्तर मं सारंगी जइसन वाद्य यंत्र होथे तेने ला ढूसिर केहे जाथे. सागौन के लकड़ी ला छिल के ओला सारंगी के आकार दे जाथे. एकर एक हिस्सा मं बड़े जिनिस नारियर के खोपड़ी लगाय जाथे. ओकर ऊपर मं बकरा के खाल ला कोसा ल तइयार करके डोरी (रस्सी) ला बांधे जाथे. एकर बाद सल्फी पेड़ के तना ले मिले रेशा ल तांत असन कस के बांध दे जाथे, तांत ल कसे बर तेंदू के खूटी बनाय जाथे. ढुसिर बनाय बर बांस के धनुष मं सल्फी के रेशा ला लपेटे जाथे. जब एला बजाय जाथे तब देखइया-सुनइया आदिवासी मन के कहना है- जब कोनो महतारी, प्रसव पीरा मं परेशान हो जथे तब एकर आवाज मं ओ शक्ति अउ होथे के सुनते ही ओकर पीरा दूर हो जाथे. वइसने जौंन जच्चा होथे अउ दूसर लइका कइसनो हलाकान करत राहय, रोवत गावत राहय ‘ढुसिर’ के आवाज सुनते ही उहू मन ला निंदरी (नींद) आ जथे, चुप हो जथे. अतेक जादू अउ ताकत भरे हे बस्तर के ए वाद्य ढुसिर मं .

‘ढुसिर’ वाद्य यंत्र के बारे मं एकर बनइया (निर्माता) अउ बजइया वन ग्राम गुड़िया के गोंचा, धुरवा मन बताइन- पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘ढुसिर’ अक्सर ओ समय बजाय जाथे जब कोनो महिला प्रसव पीरा झेलत रहिथे. आमापारा गुड़िया के रुकनदेई, सोनशीला, महादई ,जयंती अउ रेला-धुरवा बताथे- जब ‘ढुसिर’ के तान ला जच्चा सुनथे तब महतारी के प्रसव पीड़ा कम हो जाथे. पुचला के तुलाराम नाग, मंगलराम के कहना के ‘ढुसिर’ ला प्रसव पीड़ा के समे के अलावा छोटे लइका मन ला सुताय के बखत, पौष पूर्णिमा के दिन छेरछेरा मांगे अउ गांव मन मं जिहां-जिहां जाल रखे जाथे तिहों बजाय जाथे. ये ‘ढुसिर’ ला बस्तर मं सल्फी के रेशा ले बने सारंगी घला के हे जाथे.

(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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