Chhattisgarh News In Hindi : The river’s stream, which was changed by the flood, arose after 13 years due to the untiring efforts of 49 villagers and IITs | बाढ़ से बदल गई थी जिस नदी की धारा, 49 गांव के लोगों और आईआईटी के अथक प्रयासों से 13 साल बाद जी उठी ‘संकरी’

  •  कवर्धा की एक नदी को बचाने के लिए तकनीक के साथ ग्रामीणों की मेहनत रंग लाई
  •  लगातार हुए काम के बाद शहर से 10 किलोमीटर दूर रेंगाखार के पास नदी में अब इतना पानी है

Dainik Bhaskar

Mar 05, 2020, 02:18 AM IST

कवर्धा (परमेश्वर डड़सेना ) . कवर्धा शहर के उत्तरी हिस्से को छूकर निकलने वाली छोटी सी नदी संकरी में 13 साल बाद मार्च में पानी नजर आ रहा है। यह 49 गांवों के लोगों और जिला प्रशासन के प्रयास से संभव हो पाया है। पिछले 13 साल से नदी नवंबर में ही सूख जाती थी। नदी को जिंदा करने छत्तीसगढ़ में पहली बार आईआईटी के विशेषज्ञों की टीम के जरिए ड्रोन और सेंसर तकनीक की मदद से सर्वे कर नदी को जीवित करने योजना बनाई गई। केंद्र सरकार ने इसकी सफलता पर इस योजना को सूखती नदियों को जीवनदान देने के लिए दूसरे राज्यों में भी लागू करने कहा है।

 चौरा के बुजुर्ग परदेशी मरकाम ने बताया 1998 में आई बाढ़ के बाद नदी ने अपनी दिशा बदल ली थी। अक्टूबर 2017 में 49 गांव वालों की मांग पर सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर फॉर क्लाइमेट रिजाईलेन्ट ग्रोथ की टीम को जिला प्रशासन के साथ काम पर लगा दिया। जिले में नदी के किनारे पहले गांव चौरा से लेकर जिले की सीमा में नदी के आखिरी गांव सोनपुरी तक के हिस्से को गोद ले लिया। 

फरवरी-मार्च 2018 में नदी का पहले चरण में 37 किलोमीटर के बहाव का हाइड्रोलॉजिकल सर्वे किया गया। आईसीआरजी की स्टेट हेड नमिता मिश्रा ने बताया कि कई स्थानों पर नदी जमीन से 3 से 9 फीट नीचे तक बह रही है। इसका बहाव टूट चुका है और जंगल के कटने और मिट्‌टी के बढ़े कटाव के साथ ही स्टॉपडेम में गाद (सिल्ट) जमा होने के कारण यह स्थिति बनी है। 

30 एकड़ में नदी किनारे लगाए पौधे : टीम ने नदी के दोनों किनारे पौधे लगाने के सुझाव दिए। बताया गया कि नदी के प्रवाह की ताकत अब इतनी नहीं रह गई है कि वह खुद अपना सिल्ट हटा सके। िफर नदी को बचाने के लिए 40 पंचायतों के 10 हजार ग्रामीणों ने काम किया। इस अिभयान में महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल हुई। मनरेगा के कार्यक्रम अधिकारी के रवि बताते हैं कि पहले चरण में 37 किलोमीटर के लिए पूरी वर्किंग प्लान तैयार है और इसका क्रियान्वयन भी शुरू किया जा चुका है। नदी को बचाने पिछले दो साल में 4.12 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। इसमें लगभग 30 एकड़ में किनारों पर पौधे लगाए गए हैं। लूज चेक डेम बनाए गए हैं, अब भी गाद साफ करने का काम जारी है। लेकिन इतने काम से ही नदी में अब पानी नजर आने लगा है।
 


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