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Home The World dna analysis apple has agreed to pay Chilean consumers 3.4 million dollar in a lawsuit apple iPhones | सॉफ्टवेयर अपडेट के नाम पर Apple की बड़ी बेईमानी आई सामने, ग्राहकों को ऐसे दिया धोखा

dna analysis apple has agreed to pay Chilean consumers 3.4 million dollar in a lawsuit apple iPhones | सॉफ्टवेयर अपडेट के नाम पर Apple की बड़ी बेईमानी आई सामने, ग्राहकों को ऐसे दिया धोखा

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dna analysis apple has agreed to pay Chilean consumers 3.4 million dollar in a lawsuit apple iPhones | सॉफ्टवेयर अपडेट के नाम पर Apple की बड़ी बेईमानी आई सामने, ग्राहकों को ऐसे दिया धोखा

नई दिल्ली: भारत में कहा जाता है कि दादा खरीदे और पोता बरते, लेकिन अब ये कहावत कमजोर पड़ने लगी है क्योंकि, आजकल की कंपनियां चाहती हैं कि आप आए दिन नया नया सामान खरीदते रहें और उनका मुनाफा भी बढ़ता रहे. इसलिए अब हम ग्राहकों को कष्ट देने वाली बड़ी कंपनियों के मार्केटिंग फॉर्मूले का विश्लेषण करेंगे और इस खबर को देखने के बाद आप समझ जाएंगे कि कैसे बदलाव अब एक बिजनेस मॉडल बन गया है.

ग्राहकों के साथ Apple की बेईमानी

हमारे इस विश्लेषण का आधार है, दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनी एपल की उसके ग्राहकों के साथ की गई बेईमानी, जिसके लिए दक्षिण अमेरिका के एक देश चिली ने उस पर 3.4 मिलियन डॉलर यानी 25 करोड़ रुपये से ज्यादा का जुर्माना लगाया है.

चिली में हुई जांच के मुताबिक, एपल ने उसका i-Phone इस्तेमाल करने वाले लोगों को सॉफ्टवेयर अपडेट के नाम पर धोखा दिया है और ऐसा करके उसने फोन की फंक्शनिंग और बैटरी को स्लो कर दिया. यानी एपल ने जानबूझकर फोन को बेकार बना दिया और ऐसा इसलिए किया गया ताकि उसके ग्राहक अपने पुराने फोन से परेशान हो जाएं और नया i-Phone खरीदने के लिए मजबूर हो जाएं.

सॉफ्टवेयर अपडेट के नाम पर धोखा

सोचिए, एपल ने कैसे अपने ग्राहकों के साथ बेईमानी की और अपने आई फोन की उम्र घटा दी.यानी जो फोन कम से कम 5 वर्ष तक चल सकते थे या उससे ज्यादा समय तक इस्तेमाल हो सकते थे. उन्हें एपल ने बेईमानी वाले सॉफ्टवेयर से बेकार बना दिया और हमारा मानना है कि ये लोगों के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात है.

तेजी से बदलता बिजनेस

हालांकि आज ये खबर तेजी से बदलते बिजनेस के बारे में भी जागरूक करती है. आपको याद होगा पहले भारत में जब लोग खरीदारी के लिए बाजारों में जाते थे तो उनकी पहली मांग यही होती थी कि चीज टिकाऊ होनी चाहिए. लोग कहते थे कि ऐसा प्रोडक्ट दिखाओ, जो सालों साल चले और परेशान न करे. तब कंपनियां भी इस बात को समझती थीं. ज्यादातर विज्ञापनों में हम प्रोडक्ट्स को लेकर यही सुनते थे कि एक बार खरीदो और बार बार का झंझट छोड़ दो.

जूते, कपड़े, टीवी और यहां तक कि फर्नीचर खरीदते समय इस बात का ध्यान सिर्फ लोग ही नहीं रखते थे, बल्कि कंपनियां भी इस बात का ध्यान रखती थीं और दो दशक पहले तक भारतीय बाजार इसी रूपरेखा पर चलता था. गुजरात में एक बात काफी बोली जाती थी और वो ये कि टिकाऊ है तो बिकाऊ है. यानी लम्बे समय तक चलने वाली चीज है, तो खरीदने वालों की कमी नहीं होगी.

उस दौर में अगर किसी कम्पनी का कोई प्रोडक्ट खराब निकलता था, तो ये बात एक घर से होते हुए कई घरों तक पहुंच जाती थी. पहले आप अपने पड़ोसी को बताते थे कि जो टीवी या कोई और प्रोडक्ट उन्होंने कुछ ही दिनों पहले लिया था, वो अब सही से काम ही नहीं करता और जैसे जैसे ये दूसरे लोगों तक पहुंचती थी तो वो भी उस कंपनी के प्रोडक्ट्स से दूरी बना लेते थे. दुकानदार से लोगों का पहला संवाद यही होता था कि भाईसाहब उस कम्पनी का नहीं चाहिए, लेकिन आज समय बदल गया है.

बेईमानी वाले मेथड पर आधारित बिजनेस मॉडल 

आज एपल जैसी कई बड़ी कंपनियां बदलाव को अपना बिजनेस मॉडल बना चुकी हैं और मॉडल बेईमानी वाले मेथड पर आधारित है. आज कंपनियां ये नहीं चाहतीं कि आप एक ही मोबाइल फोन लंबे समय तक इस्तेमाल करते रहें या पिछले साल गर्मियों में खरीदे गए कपड़े इस साल भी पहनते रहें क्योंकि, अगर आप ऐसा करेंगे तो इन कंपनियों की बिक्री कैसे बढ़ेगी. आज जमाना न्यू अराइवल्स का है. आप इस हफ्ते जो प्रोडक्ट खरीदते हैं. वो अगले हफ्ते ही ट्रेंड से बाहर हो जाते हैं और आपको नए प्रोडक्ट्स की खरीदारी की जरूरत महसूस होने लगती है.

इसे आप एपल के ही एक उदाहरण से समझ सकते हैं. एपल कंपनी ने जब आईफोन 6 और 6 Plus लॉन्च किया तो वो आईफोन 7 पहले ही बना चुकी था. इसी तरह जब आईफोन 7 लॉन्च हुआ तो उसका नया वर्जन 8 भी पहले से तैयार था. यानी आज कंपनियां आपको जो नया बताकर बेचती हैं. असल में वो नया नहीं पुराना होता है क्योंकि, नया वर्जन पहले से ही तैयार कर लिया जाता है और जब आप किसी से कहते हैं कि मेरे पास किसी मोबाइल फोन का नया मॉडल है, तो आपको पता चलता है कि ये मॉडल तो पुराना हो चुका है.

और ऐसा सिर्फ मोबाइल फोन के साथ नहीं होता. घड़ियों का बाजार भी बदल चुका है. एक रिपोर्ट के मुताबिक पुरानी घड़ियां औसतन 25 से 30 वर्ष तक आसानी से चल जाती थीं, लेकिन आज ये तस्वीर भी बदल गई है. आज बाजार में महंगी स्मार्ट वॉच की मांग ज्यादा है, लेकिन इन घड़ियों के भी हर एक दो वर्ष में नए-नए मॉडल आ जाते हैं और इन घड़ियों की उम्र ज्यादा नहीं होती.

मोटी मोटी बात ये है कि आज बदलाव को इन कंपनियों ने मुनाफे का नया तरीका बना लिया है और एपल की बेईमानी इसी का सबसे बड़ा सबूत है और ऐसा नहीं है कि एपल पर पहली बार किसी देश में इसके लिए जुर्माना लगा है.

इससे पहले अमेरिका में भी उस पर ग्राहकों से धोखाधड़ी के लिए 613 मिलियन यूएस डॉलर यानी करीब साढ़े चार हजार करोड़ रुपये का जुर्माना लग चुका है. इसके अलावा फ्रांस में 27 Million यूरो यानी 222 करोड़ रुपये और इटली में 10 मिलियन यूरो यानी 90 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था. यही नहीं इटली इसी तरह की बेईमानी के लिए दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी सैमसंग पर 5 मिलियन यूरो यानी लगभग 45 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था.

सरल शब्दों में कहें तो बेईमानी वाली इस नदी के किनारे पर सिर्फ एपल की ही नाव नहीं खड़ी है, बल्कि सैमसंग और दूसरी बड़ी कंपनियां की भी इसमें भागीदार हैं. इन कंपनियों का 100 प्रतिशत सक्सेस रेट यही है कि ये शानदार प्रोडक्ट्स लेकर ग्राहकों तक पहुंचती हैं, लेकिन इन प्रोडक्ट्स की उम्र ज्यादा नहीं होती.

कंपनियों ने डलवाई चीजें खरीदने की आदत

हालांकि ऐसा नहीं है कि ये बिजनेस मॉडल एक दिन में खड़ा हो गया. ये आइडिया 100 वर्षों पुराना है. उस समय पूरी दुनिया में महामंदी का दौर था और तब अमेरिका के एक Marketing Genius, George Frederick ने ये विचार रखा था कि लोगों को लगातार नई नई चीज़ें खरीदने की आदत डलवानी होगी. इसलिए नहीं कि वो इन चीज़ों को लम्बे समय तक इस्तेमाल करें, बल्कि इसलिए कि वो इन चीज़ों को इस्तेमाल कर फेंक दे और फिर दोबारा नई चीज़ें ख़रीदें ताकि व्यापार चलता रहे और कंपनियों का मुनाफा बढ़ता रहे. उनका ये आइडिया काफ़ी लोकप्रिय हुआ और इसका पहली बार इस्तेमाल Light Bulb बनाने वाली कंपनियों ने किया.

1920 के दशक में Phillips, General Electric और Osram कम्पनी के बीच एक समझौते हुआ, जिसके तहत उन्होंने Light Bulbs के चलने की उम्र घटा दी. पहले जहां ढाई हज़ार घंटे ये Bulbs जगमगाते थे तो इस समझौते के बाद ये समय एक हज़ार घंटे हो गया, हालांकि उस समय लोगों पर इसका ज़्यादा प्रभाव नहीं हुआ.

टूथपेस्ट कंपनी ने अपनाई थी ऐसी स्ट्रैटजी

भारत में भी कई कंपनियों ने इस तरह की स्ट्रैटजी अपनाई. टूथपेस्ट बनाने वाली एक मशहूर कंपनी ने हम उसका आज यहां नाम नहीं बता रहे हैं. इस कंपनी ने पेस्ट की ट्यूब का होल बड़ा कर दिया. इससे एक बार में ट्यूब से इतना ज्यादा पेस्ट निकलता था, जिससे ट्यूब जल्दी खत्म हो जाती थी. यानी पहले एक परिवार में एक टूथ पेस्ट की ट्यूब लगभग एक महीने चल जाती थी, तो वो 10 दिन में खत्म होने लगी और इस तरह ये बदलाव एक बिजनेस मॉडल बन गया. मतलब कंपनी के ग्राहक नहीं बढ़े, लेकिन बिक्री बढ़ गई.

आपका फोन भी स्लो काम करता है?

आज आपके घर में भी कुछ पुरानी चीजें रखी होंगी, जो आपने 20 वर्ष पहले या उससे पहले खरीदी होंगी और वो आज भी चल रही होगी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब समय बदल गया है और अब कंपनियों का सॉफ्टवेयर इतनी तेज हो गया है कि वो आपकी जेब से किसी न किसी तरह पैसा निकाल ही लेती हैं. चाहे इसके लिए बेईमानी ही क्यों न करनी पड़े और एपल ने भी ऐसा ही किया. आज भारत में एपल के डेढ़ करोड़ से ज्यादा फोन हैं और इनमें से जो लोग आज हमारा ये विश्लेषण देख रहे हैं, उन्हें समझ आ गया होगा कि आखिर उनका मोबाइल फोन स्लो काम क्यों करता है.




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