DNA Analysis: आज हम डीएनए की शुरूआत उस वार्ता के विश्लेषण से करेंगे, जिसे दुनिया को एक नए युद्ध में धकेलने से बचाने की आखिरी उम्मीद कहा जा रहा है. ये वार्ता दिल्ली से लगभग 2 हजार किलोमीटर दूर ओमान की राजधानी मस्कट में हुई. जिसमें अमेरिका और ईरान के वार्ताकारों ने ओमान के जरिए एक दूसरे को हमला ना करने की शर्तें बताईं. इस वार्ता पर सारी दुनिया की निगाहें टिकी हैं क्योंकि अगर ये वार्ता किसी नतीजे तक नहीं पहुंचीं, तो वो मिसाइलें चलनी शुरू हो जाएंगी. जिन्हें एक दूसरे पर तानकर ईरान और अमेरिका ये वार्ता करने पहुंचे हैं. यानी सिर्फ मिडिलईस्ट नहीं पूरी दुनिया में ये वार्ता बिना नतीजे के खत्म होते ही आग लग सकती है. आपको भी जानना चाहिए ओमान की राजधानी मस्कट में जारी शांति वार्ता किसी अंजाम तक पहुंची या फिर ट्रैक से उतर गई, इस वार्ता में दोनों देशों ने मध्यस्थ देश ओमान से क्या क्या कहा? एक दूसरे के सामने कौन कौन सी शर्तें रखीं और वार्ता शुरू होने से पहले ईरान और अमेरिका ने ऐसा क्या क्या किया, जिसे युद्ध की आखिरी तैयारी कहा जा रहा है.
आज आपको जानना चाहिए ईरान और अमेरिका के बीच इनडायरेक्ट वार्ता में दोनों पक्षों में मुख्य वार्ताकार कौन कौन रहे. इनडायरेक्ट वार्ता उस बातचीत का कहते हैं. जिसमें संबंधित देश के वार्ताकार सीधे बात नहीं करते, बल्कि मध्यस्थ देश के जरिए एक दूसरे को संदेश देते हैं. यानी इस वार्ता में अमेरिका और ईरान के वार्ताकार आमने सामने नहीं बैठे दोनों ने अलग अलग ओमान के नेता से बात की, जिसके बाद ओमान के विदेश मंत्री बदर बिन हमद अल बुसैदी ने एक पक्ष की शर्तें दूसरे तक पहुंचाई. मिसाइलें तैनात करके वार्ता करने पहुंचे ईरान और अमेरिका में अविश्वास इतना ज्यादा गहरा है कि दोनों देशों के वार्ताकार एक दूसरे के सामने बैठने तक को तैयार नहीं है. ईरान की तरफ से विदेश मंत्री अब्बास अराघची मुख्य वार्ताकार थे, तो अमेरिका की तरफ से ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जारेड कुश्नर मौजूद थे. जारेड कुश्नर अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दामाद हैं, इस जोड़ी को ट्रंप ने रूस यूक्रेन वॉर सुलझाने का जिम्मा भी दिया है, लेकिन ये भी बहुत बड़ी सच्चाई है, तमाम दावों के बावजूद रूस-यूक्रेन वॉर जारी है और ईरान अमेरिका की वार्ता से भी बहुत अच्छी खबर नहीं आई है. आज आपको जानना चाहिए इस वार्ता में क्या क्या हुआ.
#DNAमित्रों | खलीफा का संवाद यानी युद्ध का आगाज !…ईरान के लिए ट्रंप का ‘अंडरकवर प्लान’
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— Zee News (@ZeeNews) February 6, 2026
ईरान के विदेश मंत्री का बयान आया सामने
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का बयान सामने आया है..आज आपको उसके बारे में भी जानना चाहिए . क्योंकि इस वार्ता में ईरान का बहुत कुछ दांव पर लगा है. जून 2025 में हुए युद्ध के बाद अविश्वास का माहौल बना हुआ है, जो बातचीत के लिए एक बड़ी चुनौती है. अराघची ने कहा कि ईरान की चिंता हित और अधिकार अमेरिका के सामने रखे गए हैं और दूसरे पक्ष की बातों को भी सुना गया. अगर हम इसी सकारात्मक रास्ते पर आगे बढ़ते हैं, तो ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु वार्ता को लेकर एक सकारात्मक ढांचा तैयार किया जा सकता है.
दोनों देशों के बीच बातचीत की रूपरेखा दोनों देशों की राजधानियों में होने वाले परामर्श से तय होगी. यानी विटकॉफ ट्रंप को और अराघची, खामेनेई को इस बैठक की जानकारी देंगे. उसके बाद तेहरान और वॉशिंगटन तय करेंगे आगे बातचीत होगी या फिर नही होगी. अगर दोनों देश एक दूसरे की शर्तों पर बातचीत के लिए राजी होते हैं, तो बातचीत की तारीख ओमान के विदेश मंत्री के साथ बैठक के बाद तय की जाएगी.
यानी अराघची इस वार्ता को अविश्वास के बावजूद सकारात्मक मान रहे हैं, लेकिन पिछली बार भी इजरायली हमले के एक दिन पहले भी मस्कट में ऐसी ही वार्ता हुई थी. उस वक्त भी अराघती सकारात्मक थे, लेकिन ईरान ने बम गिराने शुरू कर दिए थे. आज की वार्ता में दोनों देशों ने एक दूसरे की शर्तें तो सुन लीं, लेकिन इन शर्तों के चक्रव्यूह को सुलझाना आसान नहीं है.
बातचीत से बढ़ी उम्मीद
हालांकि बातचीत को लेकर थोड़ी उम्मीद बनी है, लेकिन मतभेद अब भी बहुत गहरे हैं. ईरान साफ़ कह रहा है कि बातचीत सिर्फ उसके परमाणु कार्यक्रम पर ही होगी, किसी और मुद्दे पर नहीं. ईरान का कहना है कि उसे अपने देश में यूरेनियम संवर्धन करने का पूरा अधिकार है और वह 400 किलो से ज़्यादा संवर्धित यूरेनियम किसी दूसरे देश को नहीं देगा. वहीं अमेरिका चाहता है कि बातचीत का दायरा बड़ा हो और इसमें ईरान का मिसाइल कार्यक्रम, चीन को तेल-गैस बेचने का मामला और इजरायल से रिश्ते भी शामिल किए जाएँ. ईरान इन सभी मुद्दों पर साफ़ कह चुका है कि इन पर कोई बातचीत नहीं होगी.
ईरान और अमेरिका के बीच कितनी अविश्वास की खाई?
ईरान और अमेरिका के बीच अविश्वास की खाई कितनी ज्यादा गहरी है. उसे आप इस तरह भी समझ सकते हैं कि शांति की इस वार्ता के शुरू होने से पहले ही दोनों देश युद्ध की तैयारी कर चुके हैं. इस वक्त अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास इतना ज्यादा गहरा है कि वार्ता शुरू होने से ठीक पहले अमेरिका की तरफ से अपने नागरिकों के लिए एक एडवायजरी जारी की गई है, जिसमें कहा गया है सभी अमेरिकी नागरिक फौरन ईरान छोड़ दें. अब आप सोचिए जिस देश को शांति बहाल होने की उम्मीद होगी. वो अचानक इस तरह की एडवायज़री क्यों जारी करेगा. आज आपको भी अमेरिका की इस एडवायज़री के बारे में जानना चाहिए. अमेरिका ने इस एडवायजरी में फौरन अपने नागरिकों को ईरान छोड़ने की सलाह देते हुए कहा..ईरान में सुरक्षा हालात बिगड़ रहे हैं, सड़क और पब्लिक ट्रांसपोर्ट बाधित हैं .
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ईरान से बाहर संपर्क मुश्किल है..क्योंकि मोबाइल, लैंडलाइन व इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदियां बढ़ रही हैं.
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इसीलिए अमेरिकी नागरिकों को तुरंत और किसी भी तरीके से ईरान छोड़ने की सलाह दी गई है.
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इस एडवायज़री में बताया गया है. अंतरराष्ट्रीय उड़ानें सीमित या रद्द हो रही हैं, इसलिए हवाई रास्ते भरोसेमंद नहीं.
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इसीलिए अमेरिकी नागरिकों को ज़मीन के रास्ते आर्मेनिया या तुर्किए जाने की सलाह दी गई है.
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अमेरिका ने साफ कहा है कि ईरान में फंसे नागरिक सरकारी मदद पर निर्भर न रहें. क्योंकि ईरान में अमेरिका का प्रभाव बहुत कम है.
एडवाइजरी में किसको दी गई चेतावनी?
इस एडवायजरी में दोहरी नागरिकता वालों को चेतावनी दी गई है…ऐसे नागरिकों को अमेरिकी पहचान छिपाने का निर्देश दिया गया है . और ईरानी पासपोर्ट पर यात्रा करने की सलाह की गई है . ईरान में अमेरिकी नागरिकों को हिरासत में लेने का खतरा जाहिर किया गया है. अमेरिका की इस एडवायजरी की भाषा तो ऐसी है, जैसे अमेरिकी नागरिकों के तेहरान से बाहर निकलते ही डॉनल्ड ट्रंप ईरान पर हमले का आदेश दे देंगे. वैसे सिर्फ अमेरिका ही नहीं भारत और दूसरे देश भी ईरान की स्थितियों पर नजर बनाए हुए है. इससे पहले हम आपको ईरान को चारों तरफ से घेर कर खड़े अमेरिकी कैरियर स्ट्राइक ग्रुप, वॉर शिप और फाइटर जेट्स की जानकारी विस्तार से दे चुके हैं. जो अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के एक आदेश पर ईरान पर हमला कर सकते हैं. लेकिन ओमान में अमेरिका से वार्ता करने आए ईरान ने भी पिछले अनुभव से सबक लिया है. और अमेरिका और इजरायल पर भरोसा ना करते हुए पलटवार की पूरी तैयारी कर ली है. आज आपको इन तैयारियों और इसकी वजह के बारे में भी जानना चाहिए.
किन परिस्थितियों में ईरान और अमेरिका वार्ता को तैयार?
आज आपको ये भी समझना चाहिए, आखिरकार ईरान और अमेरिका किन परिस्थितियों में एक दूसरे से वार्ता करने के लिए राजी हुए. अगर दोनों देश वाकई युद्ध से बचना चाहते थे, तो एक दूसरे पर मिसाइलें तानकर बातचीत के लिए क्यों बैठे. पिछली बार भी ईरान पर इजरायल के हमले से एक दिन पहले ओमान में शांति वार्ता हुई थी और अगले ही दिन इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया था. ये बात ईरान को अच्छी तरह से याद है. इसलिए ईरान वार्ता से पहले युद्ध की पूरी तैयारी कर चुका है. आज आपको ईरान की इन तैयारियों के बारे में सब कुछ जानना चाहिए. जिस वक्त ईरान और अमेरिका के बीच ओमान में वार्ता शुरू हुई, उससे पहले ईरान ने अपनी सबसे घातक मिसाइल को मोर्चे पर तैनात कर दिया. यानी एक तरफ अमेरिका ने बातचीत के लिए ईरान के सामने मिसाइल कार्यक्रम बंद करने की शर्त रखी थी.
दूसरी तरफ ईरान ने वार्ता से पहले अपनी हाइपरसोनिक मिसाइल खोर्रमशहर-4 को मोर्चे पर तैनात कर दिया. इससे पहले इज़रायल के खिलाफ पिछले युद्ध में भी ईरान ने इस मिसाइल का इस्तेमाल किया था, लेकिन इसकी जानकारी नहीं दी थी. ईरान ने पहली बार इसे कॉम्बैट सर्विस में शामिल करने की बात मानी है. यानी ये मिसाइल अब परीक्षण और प्रदर्शनी का हिस्सा नहीं है. बल्कि इजरायल और अमेरिकी बेस पर हमले के लिए तैयार है. आज आपको ईरान की इस घातक मिसाइल की ताकत के बारे में भी जानना चाहिए और ये भी समझना चाहिए, ये मिसाइल इज़रायल और अमेरिका के लिए क्यों सबसे बड़ा खतरा कही जा रही है.
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खोर्रमशहर मिसाइल की रेंज 2 हजार किलोमीटर है. इसका मतलब ये हुआ कि यह मिसाइल पूरे इज़रायल में किसी भी टारगेट को आसानी से निशाना बना सकती है. इसके अलावा मिडिल ईस्ट के अमेरिकी बेस भी इसके निशाने पर हैं.
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यह मिसाइल 1,500 से 1,800 किलोग्राम तक परमाणु या पारंपरिक विस्फोटक ले जाने में सक्षम है…यानि इस मिसाइल से बड़े सैन्य ठिकानों और एयरबेस को निशाना बनाया जा सकता है . इसके अलावा ये क्लस्टर बमों को लॉन्च करने का घातक हथियार है
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इस मिसाइल की रफ्तार..मैक 12 है..यानि ये आवाज़ की रफ्तार से 12 गुना तेज चलती है. लेकिन ईरान की कुछ मीडिया रिपोर्ट इसकी रफ्तार 17 मैक तक बता रही हैं . यानी इसे रोकना बहुत मुश्किल है.
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खोर्रमशहर-4 वर्ज़न में एडवांस गाइडेड सिस्टम है जो दुश्मन के एयर डिफेंस को जवाब देने का ज्यादा वक्त नहीं देता. यानी इसका वारहेड अंतिम सेकंड में दिशा या एंगल बदल सकता है. इसलिए किसी भी एयर डिफेंस के लिए इसे इंटरसेप्ट करके इसे नष्ट करना बहुत मुश्किल है
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कुछ रिपोर्टों के अनुसार इस मिसाइल में एक साथ कई टारगेट पर वार करने की क्षमता विकसित की जा रही थी. लेकिन अब तक ईरान ने इसे लेकर कोई दावा नहीं किया . वैसे इस ताकत को छिपाने के पीछे ईरान की दुश्मन को शॉक देने की रणनीति भी हो सकती है .
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ईरान ने इज़रायल के साथ पिछले युद्ध में क्लस्टर बमों को लेकर जाने वाली मिसाइल से हमला किया था, जिसने इज़रायल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था . ये बात खुद इज़रायल की सेना ने स्वीकार की थी . इजरायल की सेना ने इस हमले के बारे में बताया था.
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ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल पर लगा वारहेड करीब 23 हजार फीट यानि जमीन से 7 किलोमीटर की ऊंचाई पर फट गया. इस वॉरहेड से करीब 20 अलग अलग बम निकले. हर बम में 2.5 किलोग्राम विस्फोटक थे, जो करीब 16 किलोमीटर के क्षेत्र में गिरे और तबाही मचाई .
ईरान ने बताया अपनी मिसाइल का नाम
ईरान ने तब अपनी इस मिसाइल का नाम नहीं बताया था, लेकिन इजरायल की एजेंसियों ने इस मिसाइल की पहचान खोर्रमशहर 4 के तौर पर की थी. उस वक्त इजरायल ने दावा किया था. ईरान के सीधे युद्ध में अपनी घातक मिसाइल का सफल परीक्षण किया था. तब इजरायल के एयर डिफेंस इस मिसाइल को नहीं रोक पाए थे. खोर्रमशहर सीरीज का डिजाइन नॉर्थ कोरिया के ह्वासोंग-10 मिसाइल पर आधारित है, जो खुद रूसी स्कड टेक्नोलॉजी से प्रेरित है. यानि ईरान को ये तकनीक नॉर्थ कोरिया या रूस से मिली हो सकती है.
ईरान ने तैयार किया वॉर प्लान
ईरान ने इस मिसाइल को तैनात करने के साथ साथ एक वॉर प्लान भी तैयार किया है. इजरायल की मीडिया ने मोसाद के सूत्रों के हवाले से जानकारी दी है . ईरान ने अमेरिकी हमले की स्थिति में पलटवार करने की तैयारी कर ली है. ईरान को भी इस बात की उम्मीद कम है कि अमेरिका के साथ कोई बराबरी का समझौता हो सकता है. इसीलिए अपने जवाबी हमले में ईरान ने हूती, हिजबुल्लाह और इराक के मिलिशिया को भी शामिल किया है. आज आपको भी ईरान के जवाबी हमले के प्लान के बारे में जानना चाहिए. ईरान- अमेरिका का हमला होते ही सबसे पहले सर्वाइवल मोड में चला जाएगा. यानी खुद को सुरक्षित रखने की ड्रिल शुरू होगी .
अमेरिका ईरान की न्यूक्लियर साइट, मिलिट्री बेस या घनी आबादी वाले इलाके पर हमला करता है. तो ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड पहले से तैयार अंडरग्राउंड कमांड बंकर, वैकल्पिक कम्युनिकेशन नेटवर्क और मोबाइल मिसाइल यूनिट को एक्टिवेट कर देंगे. ताकि पहले हमले में सिस्टम ठप न हो.
इसके बाद ईरान दूसरे चरण में बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज़ मिसाइलों और सैकड़ों सुसाइड ड्रोन से हमला करेगा. जिसका निशाना खाड़ी देशों में मौजूद US बेस, एयरफील्ड और रडार स्टेशन होंगे. इतने बड़े हमले के जरिए ईरान अमेरिका के Patriot और THAAD डिफेंस सिस्टम को ओवरलोड कर देगा.
तीसरे चरण में ईरान प्रॉक्सी फ्रंट खोलेगा..मतलब युद्ध सिर्फ ईरान से नहीं लड़ा जाएगा . लेबनान से हिजबुल्लाह…यमन से हूती और इराक में ईरान समर्थित मिलिशिया अमेरिका और उसके सहयोगियों के ठिकानों पर हमला करेंगे .
चौथे चरण में इजरायल और अमेरिका से सहयोगी देशों की पावर ग्रिड, ऑयल टर्मिनल, ट्रांसपोर्ट, बैंकिंग नेटवर्क और मिलिट्री कम्युनिकेशन को साइबर हमलों का निशाना बनाया जाएगा. इन साइबर हमलों का लक्ष्य बिना गोली चलाए अफरातफरी मचाना है.
पांचवे चरण में ईरान होर्मुज स्ट्रेट को हथियार बनाएगा….दुनिया का 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है . ईरान का प्लान इस रास्ते पर माइंस…फास्ट अटैक बोट..ड्रोन से अटैक करके शिपिंग में रुकावट डालना है . ताकी दुनिया से तेल का दाम बढ़ने पर युद्ध को रुकवाने की डील की जा सके.
युद्ध के दौरान ईरान अमेरिका को थकाने की रणनीति पर करेगा काम
यानी वॉर शुरू होने की स्थिति में ईरान अमेरिका को थकाने की रणनीति पर काम करेगा. क्योंकि अमेरिका को हराना ईरान के लिए नामुमकिन है. इसीलिए ईरान अमेरिका को हर मोर्चे पर थकाकर पीछे हटने पर मजबूर करेगा. क्योंकि अमेरिका भी घरेलू दबाव की वजह से महीनों तक महंगा ऑपरेशन नहीं चलाना चाहेगा. राष्ट्रपति ट्रंप के उपर अमेरिका में चुनाव का दबाव भी है. आप सोचिए ओमान में शांति की वार्ता से पहले दोनों देशों ने युद्ध की कितनी तैयारियां कर रखी हैं. अमेरिका ने हमले की और ईरान ने महीनों तक युद्ध जारी रखने की योजना बनाई है. यानी दोनों देशों को खुद इस बात का भरोसा नहीं की ये शांति वार्ता कामयाब होगी.


