नई दिल्ली: संपूर्ण लॉकडाउन (Lockdown) के बाद भी भारत अपनी दवा की खेप आइसलैंड तक पहुंचने में कामयाब रहा. 25,000 रोगियों के इलाज के लिए पर्याप्त मलेरिया की दवा क्लोरोक्वीन के 50,000 पैकेट भारत द्वारा भेजे गए. आइसलैंड की राजधानी रेकजाविक से हमारे प्रमुख राजनयिक संवाददाता सिद्धांत सिब्बल से बात करते हुए, आइसलैंड में भारत के राजदूत आर्मस्ट्रांग चांगसन ने कहा कि कैसे आइसलैंड की डिकोडे जेनेटिक्स और भारत की CSIR-IGIB महामारी पर हो रही रिसर्च में सहयोग करने के लिए तरीकों और साधनों की जांच कर रहे हैं.आर्मस्ट्रांग ने वहां फंसे हुए भारतीयों के बारे में भी बात की, जिनकी संख्या लगभग 10 है और भारतीय मिशन यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि वे किसी भी शेंगेन देश तक पहुंच जाएं जहां से वे भारत आ सकें.
COVID-19 महामारी पर भारत-आइसलैंड किस तरह से सहयोग कर रहे हैं?
टी. आर्मस्ट्रांग चांगसन: शुरुआत में, इस मिशन में विदेश मंत्रालय के सहयोग से 50,000 क्लोरोक्विन फॉस्फेट गोलियों की एक खेप को नकाला गया जो मार्च के अंत में लॉकडाउन के कारण अटक गई थी. इसमें पहले उत्तराखंड की फैक्ट्री से दवाओं को दिल्ली तक लाना, और फिर सीमा शुल्क आदि शमिल था. शिपमेंट आखिरकार 6 अप्रैल 2020 को आइसलैंड पहुंच गया. कुछ हफ्ते बाद, हमने आइसलैंड को लगभग 45 मिलियन पैरासिटामोल टैबलेट भी भेजे. हालांकि ये दोनों शिपमेंट व्यावसायिक थे लेकिन फिर भी इससे हमें बहुत सराहना मिली. उनके स्थायी सचिव श्री स्टर्ला सिगर्जोन्सन ने धन्यवाद संदेश भी लिखा.
इसके साथ ही, आइसलैंड की बायोटेक कंपनी डीकोडे जेनेटिक्स और हमारे CSIR और इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (IGIB) नई दिल्ली महामारी पर वैज्ञानिक रिसर्च पर सहयोग करने के लिए तरीकों और साधनों की जांच कर रहे हैं. पिछले महीने अप्रैल के मध्य में, आइसलैंड में COVID महामारी के प्रसार के बारे में, deCODE ने न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में एक पेपर प्रकाशित किया था. चूंकि कंपनी आनुवंशिक जोखिम वाले कारकों और बीमारियों पर अपने अध्ययन के लिए प्रसिद्ध है, इसलिए डीकोड ने पिछले 1000 साल के आइसलैंड के नागरिकों की पूरी वंशावली का एक व्यापक डेटाबेस तैयार किया, साथ ही आइसलैंड की आधी आबादी का आनुवंशिक विवरण और चिकित्सा रिकॉर्ड भी तैयार किया. मैंने ICSIR और ICMR के ध्यान में वो पेपर लाया जिसे उन्होंने बहुत प्रभावशाली पाया. इसके बाद CSIR-IGIB को भारतीय अनुसंधान संस्थान के रूप में पहचान दी गई ताकि डीकोड के साथ सहयोग किया जा सके.
इसलिए मैं बहुत खुश हूं कि दुनिया की इस सबसे उत्तरी राजधानी में भी अत्याधुनिक शोध हो रहा है, और ये दोनों देश इस महामारी से निपटने के लिए एक साथ काम कर रहे हैं. इस रिकॉर्ड और डेटा के माध्यम से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि COVID-19 रोग के इतने प्रकार कैसे हैं जैसे एसिम्टोमैटिक, हल्का, घातक और गंभीर.
भारतीय मिशन वहां फंसे भारतीयों तक कैसे पहुंच रहा है? क्या प्रत्यावर्तन की कोई योजना है? क्या कोई भारतीय COVID से संक्रमित है?
टी.आर्मस्ट्रांग चांगसन: आइसलैंड में करीब 10 भारतीय फंसे हुए हैं, जो भारत लौटना चाहते हैं. इनमें से कुछ पर्यटक हैं, कुछ के वर्क परमिट जल्द ही समाप्त हो रहे हैं. ये संख्या एक प्रत्यावर्तन या निकासी उड़ान के लिए बहुत कम है और इसलिए मिशन उन्हें दूसरे शेंगेन देश में ले जाने के बारे में सोच रहा है जहां से वो अपने शहरों के लिए फ्लाइट पकड़ सकें. यहां चुनौती यह है कि आने वाले दिनों में आइसलैंड से यूरोप के लिए केवल 3 फ्लाइट हैं (16 मई को स्टॉकहोम और 13 और 15 मई को लंदन). यानी, लंदन के लिए शेंगेन देश के लिए सिर्फ 1 फ्लाइट है क्योंकि जिसके लिए एक अलग वीजा की जरूरत है. सरकार से समर्थन की उम्मीद की जा रही है.
आइसलैंड में जमीनी हालातों में क्या बदलाव आए हैं, भारतीय राजनयिकों का क्या हाल है?
टी. आर्मस्ट्रांग चांगसन: सौभाग्य से, फंसे हुए भारतीयों या मिशन के अधिकारियों और कर्मचारियों में से कोई भी संक्रमित नहीं है. आइसलैंड से लौटने वाले भारतीयों की जांच की जाएगी. बता दूं कि,आइसलैंड में कोरोना वायरस के 1801 मामले हैं जिनमें 1773 ठीक हो गए हैं और अस्पताल में केवल 2 लोगों के साथ, कुल 18 लोग ही संक्रमित बचे हैं. 10 लोगों की मौत हुई है. मई में वायरस संक्रमण के केवल 3 मामले ही सामने आए हैं. 12 मई को सरकार ने घोषणा की है कि वह 15 जून 2020 तक अंतर्राष्ट्रीय आगमन पर प्रतिबंधों में ढील देंगे. और भारतीयों के आगमन पर टेस्ट का विकल्प दिया जाएगा जिससे बिना क्वारेंटाइन हुए आगे बढ़ा जा सकेगा, या फिर उन्हें 2 सप्ताह के लिए ही घर पर क्वारेंटाइन रहने की जरूरत होगी.
आइसलैंड के COVID कंटेनमेंट मॉडल से हमने क्या सीखा है?
टी. आर्मस्ट्रांग चांगसन: आइसलैंड का कंटेनमेंट मॉडल पहले से पता है जो बड़े पैमाने पर टेस्टिंग, ट्रेसिंग और आइसोलेशन पर आधारित है. लेकिन यहां हैरानी की बात यह है कि लगभग 63% परीक्षण आम जनता पर किए गए थे. मुझे लगता है कि यह काफी अनोखा है. यह आइसलैंड की हेल्थकेयर सिस्टम ऐसा है जिसमें निजी क्लीनिक सहित अस्पतालों में देश में रोगियों का पूरा रिकॉर्ड है. डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन कागज पर नहीं है. उसे फार्मासिस्ट भी देख सकता है. इससे लोग अस्पतालों में कम गए और भीड़ नहीं बढ़ी. बीमारों को टेलीफोन पर सलाह दी गई. आइसलैंड का राष्ट्रीय मरीज़ पोर्टल (heilsuvera.is) बहुत ही शानदार है, ये डॉक्टरों, नर्सों और मरीज़ों को अलर्ट भेजता है, यहां तक कि डॉक्टरों के पास वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की भी सुविधा है. आइसलैंड के इस सिस्टम को स्मार्ट फोन पर भी एक्सेस किया जा सकता है. हम भी भारत में इसी तरह के हेल्थ केयर सिस्टम को अपना सकते हैं
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