छतरपुर स्थित महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय (एमसीबीयू) एक बार फिर अपनी कार्यप्रणाली को लेकर विवादों के घेरे में आ गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन पर आरोप है कि उसने दीक्षांत समारोह जैसे गरिमामय आयोजन में क्षेत्र के वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों की खुलकर अनदेखी की है। मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि यह कार्यक्रम मध्यप्रदेश के राज्यपाल के मुख्य आतिथ्य में आयोजित हुआ, इसके बावजूद प्रोटोकॉल और शिष्टाचार की अनदेखी की गई।विश्वविद्यालय द्वारा जारी निमंत्रण पत्रों में केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र कुमार, खजुराहो सांसद व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा, सांसद राहुल लोधी सहित क्षेत्रीय विधायक राजेश बबलू शुक्ला, अरविंद पटेरिया और कामाख्या प्रताप सिंह के नाम शामिल नहीं किए गए। इस चूक को राजनीतिक गलियारों में जानबूझकर की गई उपेक्षा के रूप में देखा जा रहा है, जिससे जनप्रतिनिधियों में खासा आक्रोश है।गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब एमसीबीयू प्रशासन ने इस तरह की गलती की हो।
पिछले वर्ष भी राज्यपाल के कार्यक्रम के दौरान इसी प्रकार की प्रोटोकॉल त्रुटि सामने आई थी, जिस पर स्वयं महामहिम राज्यपाल ने नाराजगी जताई थी। इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रबंधन ने कोई सबक नहीं लिया और इस बार फिर वही स्थिति दोहराई गई।हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्यपाल के आगमन पर हेलीपैड पर स्वागत के लिए कोई भी जनप्रतिनिधि उपस्थित नहीं रहा। इसे विश्वविद्यालय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ती दूरी और अविश्वास के रूप में देखा जा रहा है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किसके संरक्षण में विश्वविद्यालय प्रशासन बार-बार ऐसी “प्रोटोकॉल संबंधी त्रुटियां” कर रहा है। क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है या फिर जनप्रतिनिधियों को नजरअंदाज करने की सोची-समझी रणनीति? शिक्षा के इस प्रमुख संस्थान में समन्वय की कमी और प्रबंधकीय तानाशाही ने न केवल विश्वविद्यालय की छवि को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि पूरे जिले की प्रतिष्ठा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।अब देखना यह होगा कि विश्वविद्यालय प्रबंधन एक बार फिर औपचारिक माफी मांगकर मामला शांत करने का प्रयास करता है या शासन स्तर पर इस बार कोई ठोस और दंडात्मक कार्रवाई की जाती है।