भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान सुरक्षित वतन लौट आए. देश उनकी वापसी को लेकर बेसब्र और बेताब था. इस बेताबी में तमाम सीमाएं टूटती नजर आईं. सबसे पहले टूटा सेना का सीक्रेसी वाला प्रोटोकॉल. क्या कहना है, कितना कहना है, और क्या नहीं कहना है इसकी सीमा रेखा भी टूटती दिखी. जनज्वार के आगे अधिकारी (चाहे सेना के रहे हों या प्रशासन के) अपनी प्रोफेशनल प्रतिबद्धताएं बचाने में कई बार बेबस नजर आए.
आखिकार जब शुक्रवार रात तकरीबन साढ़े नौ बजे, विंग कमांडर अभिनंदन को लेकर अटारी बॉर्डर से सेना की गाड़ियों का काफिला अमृतसर एयरपोर्ट पहुंचा तो एक नारा बिना बोले जेहनों में गूंज रहा था- ‘मोदी है, तो मुमकिन है.’
आगामी लोकसभा चुनाव में ‘मोदी है, तो मुमकिन है’ पुराने नारों की जगह लेगा
यह वो नारा है जो ‘अबकी बार-मोदी सरकार’ और ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ की जगह लेने वाला है, इससे किसी पॉलिटिकल पंडित को शायद ही ऐतराज हो. विपक्ष सकते में है, और कुछ जगहों पर तो सदमे में है. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग करने वाला अपना धरना स्थगित कर दिया. उनकी पार्टी के एक सदस्य उल्टा पूछते हैं कि- ‘देशभक्ति के इस शोर में उन्हें सुनेगा कौन.‘ एक और पार्टी के सहमे हुए रणनीतिकार बुदबुदाते हैं- ‘यह बीजेपी का पिच है, इस पर खेलने का मतलब पिटना तय है, बेहतर है खामोश रहें.‘
दरअसल देश का पॉलिटिकल नैरेटिव (राजनीतिक आख्यान) बदल चुका है. ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ का मुहावरा कहां जा छुपा है किसी को नहीं पता. हालांकि यह ‘पॉलिटिकल नैरेटिव’ लंबे समय से बदल रहा था, मगर धीरे-धीरे. फिलहाल वो राष्ट्रवाद की खराद पर पूरी तरह कसा जा चुका है. वो राष्ट्रवाद जो देश, नस्ल, भाषा, धर्म और संस्कृति के पांच तत्वों से मिल कर बना है. जिसके लिए एक जाहिर सा जुमला है, एक विधान, एक निशान और एक प्रधान.

विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान पाकिस्तान की कैद से रिहा होकर 1 मार्च की रात भारत पहुंचे (फोटो: पीटीआई)
जब लोकसभा चुनाव के ऐलान में बस चंद रोज बचे हैं, नया नारा बाजार में तैर रहा है, ‘मोदी है, तो मुमकिन है.’ एयर स्ट्राइक के बाद देश की एक बड़ी आबादी के लिए मोदी वो है, जो मुमकिन को नामुमकिन कर सकता है. जो अनहोनी को होनी कर सकता है.
तो सवाल है कि क्या सारा देश पूरे माहौल को एक ही नजरिए से देख रहा है?जवाब है कि- नहीं! लेकिन जिनकी आवाजें शौर्य को शोर में बदलने से रोक सकती थीं, वो मशहूर मुहावरे के मुताबिक नक्कारखाने की तूती हो गई हैं. सड़क पर, पार्कों में, सुबह की सैर, चाय की अड़ी और खेत-खलिहान में राष्ट्रवाद की हवा बह रही है. इस हवा के खिलाफ जाने का साहस बिरले ही जुटा पाएंगे. अगर आप हवा के विरुद्ध जाएंगे तो खुद को देशद्रोही, पाकिस्तान परस्त करार पाएंगे.
अभिनंदन की भारत वापसी को इमरान खान का ‘गुडविल जेस्चर’ करार दे रहे हैं
अपने लैपटॉप और मोबाइल के एकांत में सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ लोग जरूर मुखर हैं. वो युद्ध के विरुद्ध हैं. वो भारत हो या पाकिस्तान किसी तरफ के सैनिक की मौत को गलत मानते हैं. विंग कमांडर अभिनंदन की भारत वापसी को इमरान खान का ‘गुडविल जेस्चर’ करार दे रहे हैं. लेकिन इनकी तादाद कम है, और सोशल मीडिया के मैदान में आते ही वो जमकर ट्रोल हो रहे हैं.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी संसद में कहा, ‘भारत के साथ तनाव को हम आगे नहीं बढ़ाना चाहते, इसलिए शांति की कामना के तहत भारतीय पायलट को शुक्रवार को रिहा कर रहे हैं.’ उनके इस बयान को पाकिस्तान की हार की तरह देखा गया. भारत के आगे झुक गया पाकिस्तान, मोदी की कूटनीति के आगे चारो खाने चित इमरान जैसे जुमले चल पड़े.
उसी दिन इमरान के नहले पर प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली के विज्ञान भवन में दहला मारा. अपने चिरपरिचित अंदाज में भाषण की शुरुआत की- ‘एक पायलट प्रोजेक्ट हुआ है… लेकिन यह तो अभी प्रैक्टिस थी… अभी रियल होना है.’
एयर स्ट्राइक से लेकर अब तक अपने हर भाषण की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगभग इन्हीं संदर्भों के साथ कर रहे हैं. पूरे संघ परिवार ने साफ कर दिया है कि फिलहाल यही सबसे बड़ा मुद्दा है.

भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर एयर स्ट्राइक कर उन्हें तबाह और बर्बाद कर दिया था
रणभेरी, दुंदुभी और शंखनाद के इस महाशोर में ही चुनाव आयोग ने ऐलान कर दिया कि चुनाव अपने समय पर ही होंगे. देश के सियासी माहौल पर गहरी नजर रखने वाले एक जानकार कहते हैं- ‘यह लोकसभा चुनाव तो मोदी बनाम पाकिस्तान होता दिख रहा है, इसमें दूसरी पार्टियां कहां खड़ी होंगी.. यही समझ में नहीं आ रहा.’
अलग-अलग राजनीतिक चेतनाओं से लैस समुदाय पैदा हो चुके हैं
लेकिन मत भूलिए कि तब से अब तक भारत के सियासी समंदर में कई किस्म की नदियां आकर मिल चुकी हैं. अलग-अलग राजनीतिक चेतनाओं से लैस समुदाय पैदा हो चुके हैं. हम जब पॉलिकल नैरेटिव बदल जाने की बात करते हैं तो यह दरअसल मध्यवर्गीय राजनीतिक चेतना भी है, जिसका बड़ा हिस्सा सवर्ण वोटर (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) घेर लेते हैं. लेकिन अभी उनका नजरिया सामने आना बाकी है जो पिछड़े और दलित हैं. यह वो वोटर हैं जो पिछले दो ढाई दशक से साइलेंट वोटर की शक्ल में सामने आते हैं.
याद रहे कि इस ‘अति-मीडिया’ समय में नैरेटिव पल-पल बदलते हैं और बदल रहे हैं.

