Edited By Garima Singh | नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated:

मानसिक सेहत पर हमारे देश में बहुत कम बात की जाती है। किसी का मानसिक बीमारियों से ग्रसित होना सीधे तौर पर पागलपन मान लिया जाता है। क्योंकि लोगों को इतनी समझ ही नहीं है कि पागलपन और अन्य मानसिक बीमारियों में अंतर होता है। क्योंकि हर मानसिक बीमारी पागलपन नहीं होती है। यहां जानिए अपनी खुशी, संघर्ष और अकेलेपन को लेकर कैटरीना ने क्या कहा था…
आंतरिक दुख और बाहरी हंसी
-घटना साल 2012 की है, जब कटरीना अपनी फिल्म ‘जब तक है जान’ के प्रमोशन में लगी हुई थीं। इसी दौरान जब उनसे उनकी खुशी और अकेलेपन को लेकर सवाल किया गया तो कटरीना ने उत्तर दिया ‘मैं अपने आपकी कंपनी इंजॉय करना जानती हूं। मुझे नहीं लगता कि मैं अकेलेपन का शिकार हूं क्योंकि जो लोग अकेलेपन का शिकार होते हैं वे सोते बहुत हैं और जो लोग हर छोटी बात पर बहुत जोर से हंसते हैं वे लोग अंदर से दुखी और उदास होते हैं। और मुझ पर इनमें से कोई कंडीशन अप्लाई नहीं होती है।’
कितनी सच्ची है यह बात?
-अब 8 साल बाद कटरीना के जन्मदिन पर उनके इस स्टेटमेंट को यंगस्टर्स के साथ साझा करते हुए हम उन्हें बताना चाहते हैं कि उनकी बार्बी सिर्फ ब्यूटिफुल नहीं है। बल्कि ब्यूटी विद ब्रेन हैं। साथ ही यह भी क्लीयर कर देना चाहते हैं कि अगर आपके आस-पास अधिक सोने और झूठी हंसी हंसनेवाले लोग हों तो उन्हें पहचानकर आप उनकी सहायता कर सकते हैं। इसलिए इस बारे में हमने सायकाइट्रिस्ट्स से बात की और जाना कि अकेलेपन में अधिक सोने और अंदर से दुखी होने पर बाहरी हंसी हंसने की बात किस हद तक सही और स्वीकार्य है…
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
-अपने रीडर्स के लिए सवालों की इस गुत्थी को सुलझाने हम मैक्स हॉस्पिटल पटपड़गंज (दिल्ली) के सीनियर सायकाइट्रिस्ट डॉक्टर राजेश कुमार के पास पहुंचे। इस बारे में डॉक्टर राजेश का कहना है कि मनोविज्ञान के हिसाब से जब कोई व्यक्ति खुद को बहुत अधिक अकेला अनुभव करता है और उस पर यह अकेलापन ना केवल भावनात्मक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी हावी हो जाता है।
-इस स्थिति में व्यक्ति अपने आपको अकेलेपन के इस गहरे अहसास से बचाना चाहता है। इस स्थिति में उसे सबसे मददगार और आसान काम सोना लगता है। ताकि नींद के आगोश में जाकर वह सारी नकारात्मकता और अकेलेपन के डर से बच सके। हालांकि यह खुद को एक तरह का धोखा देना ही होता है। क्योंकि एक निश्चित समय से अधिक हमारा दिमाग सो नहीं पाता और उसमें लगातार विचार आते रहते हैं।
-दिमाग में लगातार आनेवाले ये विचार और इस दौरान इन विचारों में खोए रहना या इन विचारों को दबाने की कोशिश करना, दोनों ही मानसिक समस्या को अधिक गहरा बना देते हैं। इस तरह की स्तिथि वर्किंग लोगों के प्रफेशन और पर्सनल लाइफ पर भी नेगेटिव इफेक्ट डालती है। इससे समस्याओं की एक चेन बन जाती है और व्यक्ति इसमें उलझता चला जाता है।
क्या वाकई जोरों से हंसना उदासी की निशानी है?
-क्या बात-बात पर जोर से हंसना अंदर से दुखी होने की निशानी है? इस सवाल के जवाब में डॉक्टर राजेश कहते हैं कि जोर से हंसना और खुलकर हंसना इन दोनों में बहुत अंतर होता है। यह किसी व्यक्ति के बारे में डाइग्नोसिस के बाद ही कहा जा सकता है। इस बात पर एक जनरल कमेंट करना सही नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं होता है यह बात भी पूरी तरह सही नहीं है।
इनकी बात को सुनते हैं लोग
-हममें से बहुत कम लोग हैं जो हेल्दी रिलेशनशिप और मेंटल हेल्थ पर खुलकर बात करते हैं। लेकिन जब देश की जानी-पहचानी शख्सियत इस तरह के विषय पर बोलते हैं तो उन्हें सुनने और उनकी बात को समझनेवाले लोगों की संख्या कहीं अधिक होती है। यह उनकी लोकप्रियता का कमाल होता है। शायद यही वजह है कि पोलियो वैक्सीन से लेकर टीबी की बीमारी और फिर अब कोरोना की जांच और सतर्कता के विज्ञापन के लिए बॉलिवुड ऐक्टर अमिताभ बच्चन को चुना गया।
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