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Wednesday, January 7, 2026
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चुनाव सुधारों की गुंजाइश : क्या पुरानी सरकार की चल रही योजनाएं नई सरकार को बंद कर देना चाहिए?

अनिल दुबे

इस बिषय पर मत-भिन्नता हो सकती है, लेकिन पुरानी सरकार की योजनाओं (आर्थिक निवेश सम्बंधित प्रतिबद्धताओं को छोड़कर/except commitments made for investments) को बंद करने में कोई हर्ज नहीं बशर्ते “चुनावी घोषणा पत्र” में इस सबका उल्लेख है तो…! चुनाव घोषणा पत्र बहुत ही महत्वपूर्ण दस्तावेज है। हर पार्टी को “कानूनन” बाध्य होना चाहिए कि वो स्पष्टता से घोषणाओं का अपने मेनिफेस्टो/वचन पत्र में उल्लेख करे। हर राजनीतिक दल बताये कि अगर सरकार बना पाने में सक्षम होंगे, तो ये योजनाएं बंद करके, इनके स्थान पर ये नई योजनाएं शुरू की जाएंगी। अगर कोई राजनीतिक दल घोषणा करे कि 100 यूनिट तक बिजली फ्री मिलेगी तो यह भी बताने की बाध्यता होना चाहिए कि वह मतदाताओं को बताए कि क्या ये किसी विशेष “आय/आर्थिक/सामाजिक/धार्मिक” वर्ग के लिए है या सबको इसका फायदा मिलेगा? अगर कृषि लोन माफ करने की घोषणा हो तो स्पष्ट होनी चाहिए कि कितना और किस आय-वर्ग के किसानों को फायदा होगा? अगर जीरो ब्याज पर कृषि ऋण दिया जायेगा तो इसके पात्र कौन होंगे? अक्सर “अस्पष्ट” घोषणाओं के “पात्रता नियम/मापदंड” (eligibiliy rules/criteria) बाद में बनते हैं। अगर घोषणाओं में स्पष्टता नहीं है तो समझिये फिर “धोखाधड़ी” है। कई घोषणाएं सरकार अगले चुनाव में जाते वक़्त पूरी करती है, यानि पांचवे साल में, इसलिए सभी राजनितिक दलों के लिए कानूनी बाध्यता होनी चाहिए कि बताए कौन सी घोषणा कितने समय में पूरी करेंगे? सत्तारूढ़ दल के लिए ये भी “कानूनी बाध्यता” होनी चाहिए कि वह मतदाताओं को यह बताए कि पिछले चुनाव के घोषणा पत्र में से किन-किन घोषणाओं को उसी स्वरुप में लागू किया जा चुका है। चुनाव आयोग ने इस दिशा में काम जरूर किया है, लेकिन घोषणाओं की स्पष्टता/समय-सीमा अभी राजनीतिक दलों की “कानूनी बाध्यता” नहीं बन पाई है। अगर ये सब कानूनी बाध्यता हो जाएगी तो निश्चित रूप से स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेहतर होगा। अगर मतदाता के पास सभी जानकारी स्पष्ट होंगी, तो वो एक सूचनापूर्ण निर्णय (informed decision) ले पाएगा। लोकतंत्र में ये माना जाना चाहिए कि जब हम अपना मत देते है तो उन्हीं घोषणाओं के आधार पर निर्णय करते है कि – कोई राजनीतिक दल या फिर कोई नहीं (NOTA)। अगर यहां यह भी लिखा जाये कि धर्म/जाति के आधार पर मतों का विभाजन रोका जाए, तो ये शायद किसी के बस में नहीं, क्योंकि इसके लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। भावनायें तो कानून से निर्देशित नहीं की जा सकती, बस चुनाव प्रचार में सख्ती से दलों/प्रत्याशी को ऐसा करने से रोका जा सकता है। और… अंततः कानून/नियम लागू करवा पाने की क्षमता पर ही वास्तविक सुधार तय होंगे.!! वरना आदर्श आचार संहिता (model code of conduct) में से “आदर्श” विलोपित करना ही उचित होगा.!!

Mukesh Dubey Writer


(फेसबुक वाल से साभार)

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