terms and condition of containment zone: ‘जलसा’ बना नियंत्रित क्षेत्र, जानें क्या होते हैं containment zone और कैसे तय होता है इनके खुलने का समय – amitabh bachchan bungalow jalsa became a containment zone know the terms and condition related to containment zone in hindi

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अमिताभ बच्चन का बंगला ‘जलसा’ कंटेन्मंट जोन बना हुआ है। जबसे अमिताभ बच्चना और उनके परिवार के 3 अन्य सदस्यों का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया है, तभी से उनके इस बंगले को नियंत्रित क्षेत्र बना दिया गया है। हालांकि इसे कंटेन्मंट जोन बनाने से पहले इसको बीएमसी की तरफ से सैनिटाइज किया गया था। यहां जानें, किसी भी बंगले या स्थान के कंटेन्मंट जोन बनने की प्रक्रिया, कारण और खुलने के समय से जुड़ी जरूरी बातें…

क्यों बनाया जाता है कंटेन्मंट जोन?

-यदि किसी स्थान विशेष पर किसी संक्रमित बीमारी के केस देखने को मिलते हैं तो उस स्थान को कुछ समय के लिए निषेध क्षेत्र बना दिया जाता है। ताकि इस संक्रमण को और अधिक लोगों में फैलने से रोका जा सके।

-अगर किसी खास कारण से कभी इस जगह पर जाना भी पड़े तो संक्रमण से बचने की पूरी व्यवस्था और अथॉरिटी की इजाजत के बाद भी वहां जाया जा सकता है।

-इस समय कोरोना वायरस का संक्रमण फैला हुआ है और अमिताभ बच्चन का बंगला इसी संक्रमण के चलते कंटेन्मंट जोन बनाया गया है इसलिए हम इसी वायरस और इसके संक्रमण से जुड़ी बातों पर यहां गौर करेंगे।

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किसी कंटेन्मंट जोन के खुलने का समय कैसे तय किया जाता है?

कितने दिन बाद बंगले में लौट पाएगी बच्चन फैमिली?

-अब आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि आखिर सदी के महानायक का परिवार अब अपने बंगले में कब लौट पाएगा? तो इस सवाल का जवाब यह है कि कोरोना वायरस का विंडो पीरियड खत्म होने के बाद ही इस बंगले को फिर से पहले की तरह खोला जा सकता है।

-हालांकि खबरों के अनुसार, अमिताभ बच्चन की बहू एश्वर्या और पोती आराध्या को क्वारंटाइन पीरियड के लिए इस बंगले में ही रखा गया है। जबकि अपने बाकी स्टाफ के साथ जया बच्चन अपने दूसरे बंगले प्रतीक्षा में शिफ्ट हो गई हैं। याद दिला दें कि जया बच्चन के साथ ही उनके स्टाफ के करीब 26 लोगों का Covid-19 Test नेगेटिव आया था।

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क्या होता है वायरस का विंडो पीरियड?

-कोई वायरस जब अपने प्राइमरी स्टेज पर होता है तो जरूरी नहीं है कि व्यक्ति के अंदर उसके सिंप्टम नजर ही आएं। इस स्थिति में अक्सर टेस्ट के दौरान भी इन वायरस की उपस्थिति पकड़ में नहीं आती है। तो जिस टाइम ड्यूरेशन में वायरस को टेस्ट के जरिए भी पकड़ना मुश्किल होता है, उस समय अंतराल को वायरस का विंडो पीरियड कहते हैं।

-कोरोना के केस में यह विंडो पीरियड 14 दिन का रखा गया है। इस समय के बाद एक बार फिर इस क्षेत्र में रह रहे लोगों में बीमारी के लक्षणों के आधार पर उनकी जांच की जाती है। यदि सब कुछ सामान्य होता है तो लोकल अथॉरिटी की अनुमति के बाद इस क्षेत्र से नियंत्रण हटा लिया जाता है।

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कब खुलेगा अमिताभ बच्चन का बंगला

जांच में रखते हैं इन बातों का ध्यान

-किसी कंटेन्मंट जोन में रहनेवाले लोगों का जब फिर से टेस्ट किया जाता है तो उनमें मुख्य रूप से दो चीजों पर गौर किया जाता है। पहला यह कि क्या उनमें बीमारी के लक्षण विकसित हुए हैं? और दूसरा यह कि क्या उनके शरीर में उस बीमारी के वायरस से लड़ने की ऐंटिबॉडीज बन रही हैं?

-कई बार ऐसा होता है कि व्यक्ति के शरीर में बीमारी के लक्षण नजर नहीं आते हैं और उसके टेस्ट भी नेगेटिव ही आते हैं लेकिन उसके शरीर में ऐंटिबॉडीज बनने लगती हैं। किसी व्यक्ति के शरीर में किसी वायरस की ऐंटिबॉडीज तभी बनती हैं, जब उस व्यक्ति के शरीर में वह वायरस होता है।

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-टेस्ट में वायरस की उपस्थिति ना पकड़ में आने के केस बहुत ही कम होते हैं। लेकिन फिर भी इसकी आशंका जरूर रहती है। इसका ताजा उदाहण पिछले दिनों दिल्ली के एम्स अस्पताल में देखने को मिला। जहां एक मरीज का 4 बार कोरोना टेस्ट नेगेटिव आया लेकिन उसके शरीर में ऐंटिबॉडीज थीं और उसमें बीमारी के लक्षण भी थे।


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