पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान से जुड़े युद्ध के बढ़ते प्रभावों को लेकर भारत सरकार पूरी तरह सतर्क हो गई है। इसी क्रम में देश में दो महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय बैठकें आयोजित की गईं, जिनमें युद्ध के कारण भारत पर पड़ रहे असर और उससे निपटने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई।
बैठकों में खासतौर पर कच्चे तेल, गैस, उर्वरक (फर्टिलाइज़र) और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति पर पड़ रहे प्रभावों की समीक्षा की गई। साथ ही आयात-निर्यात पर पड़ रहे दबाव और सप्लाई चेन को सुचारु बनाए रखने के लिए रणनीतियों पर भी विचार किया गया।दरअसल, ईरान से जुड़े इस संघर्ष में अब हालात और गंभीर हो चुके हैं। दोनों पक्षों के बीच लगातार हमले और पलटवार जारी हैं, और अब सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी निशाना बनाया जा रहा है। इससे वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ गई है।
सबसे ज्यादा असर होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर पड़ा है, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। इस क्षेत्र के युद्धग्रस्त होने से वैश्विक बाजार में तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हो रही है, जिसका असर भारत सहित कई देशों पर देखने को मिल रहा है।इसी बीच होर्मुज़ संकट को लेकर 60 से ज्यादा देशों की एक अंतर्राष्ट्रीय बैठक भी आयोजित की गई, जिसमें भारत ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया।
भारत ने इस मंच पर ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि देश में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है और आम जनता को किसी तरह की तत्काल दिक्कत न हो, इसके लिए लगातार निगरानी और आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।हालांकि, वैश्विक हालात को देखते हुए आने वाले समय में स्थिति किस दिशा में जाएगी, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।


