बांग्लादेश में नई सरकार के गठन के साथ ही तुर्की की सक्रियता तेज होती दिखाई दे रही है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन के करीबी प्रतिनिधियों और उनके बेटे बिलाल एर्दोआन के ढाका दौरे को क्षेत्रीय राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस दौरे में तुर्की की सरकारी विकास एजेंसी टीआईकेए (TIKA) के अध्यक्ष अब्दुल्ला एरेन सहित अन्य प्रतिनिधि भी शामिल बताए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण एशिया में अपनी कूटनीतिक और सांस्कृतिक उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। बांग्लादेश में उसकी सक्रियता केवल सरकारी स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से भी प्रभाव बढ़ाने की रणनीति अपनाई जा रही है।
टीआईकेए की भूमिका पर नजर
टीआईकेए (Turkish Cooperation and Coordination Agency) तुर्की की सरकारी एजेंसी है, जो विकास परियोजनाओं, शिक्षा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मानवीय सहायता के जरिए विदेशों में काम करती है। बांग्लादेश में इसकी बढ़ती गतिविधियों को कुछ विश्लेषक ‘सॉफ्ट पावर’ रणनीति का हिस्सा मानते हैं।
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि कुछ तुर्की समर्थित संगठनों के माध्यम से पैन-इस्लामिक विचारधारा को बढ़ावा दिए जाने की आशंका भी जताई जा रही है। इस पहलू को लेकर भारत समेत क्षेत्र के अन्य देशों में चिंता व्यक्त की जा रही है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम?
भारत और बांग्लादेश के बीच रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध मजबूत रहे हैं। ऐसे में किसी तीसरे देश की बढ़ती राजनीतिक या वैचारिक सक्रियता को भारत के दृष्टिकोण से सावधानी से देखा जा रहा है। विशेष रूप से पाकिस्तान-तुर्की संबंधों की पृष्ठभूमि में इस घटनाक्रम को जोड़कर देखा जा रहा है।
विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि दक्षिण एशिया में प्रभाव की होड़ के बीच भारत को अपने कूटनीतिक प्रयास और मजबूत करने होंगे, ताकि क्षेत्रीय संतुलन बना रहे।
आगे की राहफिलहाल बांग्लादेश सरकार की ओर से तुर्की के साथ सहयोग को विकास और साझेदारी के नजरिए से पेश किया जा रहा है। लेकिन क्षेत्रीय समीकरणों को देखते हुए आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह सक्रियता किस दिशा में जाती है और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।


