नक्सल हमले में शहीद सुभाष. फाइल फोटो.
छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के बीजापुर (Bijapur) में 3 अप्रैल को तर्रेम हमले में जिन 22 जवानों की शहादत हुई, इनमें बासागुड़ा के सुभाष नायक भी शामिल है.
शंकर ने बताया कि सुभाष की इस बहादुरी के बाद उसे पदोन्नत किया गया था. इसी जांबाजी के लिए सुभाष जाना जाता था. शंकर के मुताबिक मुठभेड़ के वक्त जब नक्सली गोलियां बरसा रहे थे, आजु बाजू बम फट रहे थे, तब वह खेत मे पत्थर की ओट लेकर पोजिशन लिए हुए था. दूसरी छोर पर सुभाष नक्सलियों की गोलीबारी का जबाब दे रहा था. गोलियों की तड़तड़ाहट और धमाकों से उठते धुंए की धुंध के बीच उसने दम तोड़ दिया. शंकर को अब मलाल है कि वो उसे बचा नही पाया, लेकिन फक्र भी है कि वो अपनी तासीर देश के नाम कर गया.
परिवार के सामने संकट
इधर बासागुड़ा में तालपेरु नदी के किनारे एक छोटे से मकान में सुभाष का परिवार बिलखता नजर आया. सुभाष की शहादत के बाद उसे पीछे बूढ़ी मां, पत्नी और उसके अपने तीन बच्चे रह गए है, जिनका आने वाला कल कैसा होगा, यह सवाल उसकी माँ को बार बार कौंध रहा है. माँ कहती है कि गश्त पर जाने से पहले वह अक्सर कहता था कि तुम बच्चों के साथ सड़क किनारे खड़े रहना, मैं हाथ हिलाते जल्द लौट आने का इशारा करूंगा, उस दिन भी उसने वैसा ही किया मगर अबकी बार वह लौटा नहीं. ओडिशा से कभी रोजी रोटी की जुगत में सुभाष के पिता यहां आकर बस गए थे, दिहाड़ी मज़दूरी से परिवार का पेट पालते पिता गुजर गए, आगे जीवन का की गाड़ी माँ खींच लाई, अब जब सुभाष की वीरगति को प्राप्त हुआ तो एक बार फिर बूढ़ी माँ के कंधों पर बेटे की शहादत पर फक्र करने के साथ सुभष के अधूरे सपनो पूरे करने की पहाड़ जैसी चुनौती सीना ताने खड़ी है.

