खबरीलाल जानथे अपन संगी जव्हरिया संग बतियावत-बतियावत अपन अवकात म आगे. ओहा अपन खोजी नजर म देखत-तउलत जोरदरहा किहिस-‘आम-आदमी के मन म लड्डू फुटथे. ख़ास- आदमी लड्डू खाथे.लड्डू के सपना बांटथे. अउ वुही आम-आदमी दुरिहा ले लड्डू देखथे. मुख्य वस्तु लड्डू हे, आम-आदमी नहीं. लड्डू के पूरा गणित, राजनीति अउ समाजशास्त्र अलग हे. मानवता के चांदी रूपी परत वुही लड्डू उपर चमकत हे. चकाचक चांदी कस. चकाचक सोना के पन्नी कस. इही चमक म राजनीति के सुंदर बजार हे.’
भीड़ म गंवइस आम-आदमी
गोबरदास दुखी मन ले किहिस-‘आम-आदमी ल राजनेता अउ किसम-किसम के भला-बुरा मनखे मन अपन-अपन जेब म धरें रहिथें. ऊनकर मन बहलावत रहिथें. आम-आदमी सबले जादा कीमती होथे. आम-आदमी मउका-बेमउका भीड़ म गवां जथे. कीरा-मकोरा कस होथे. जे जगा पाबे ते जगा रमजावत रहिथें.
एक धान के दू भूंसालालबुझक्कड़ किहिस-‘ख़ास-आदमी एक धान के दू भूसा करे बर जानथे.आम-आदमी के मास, न हाड़ा, करम ठठाय कस हाल हे. हर गोड़(पैर) बर पायदान हे. आम-आदमी के छाती म हर जुद्ध लड़े जथे. आम-आदमी गरीबी के आख़िरी छोर म खड़े मिलथे. ओला अपन गोड़ म खड़े होय के दूसर ले बड़े होय के मउका कहाँ मिलथे. सब मीठ-मीठ बोल-बोल के उन नीचो डरथे. आम-आदमी के बूता हे हाथ उठाना, जय बोलना. सच पूछे जाय त ओखर जनम होतेच जय-जय बोले अउ हाथ उठाय बर.’
दूसर के गोड़ म खड़े मनखे
खबरीलाल किहिस-‘आम-आदमी दूसर के मुंह ले बोलथे. दूसर के कान ले सुनथे अउ दूसर के आंखी ले देखथे. बुध(बुद्धि) उधार के होथे. कभू–कभू किराया के मनखे लगथे. आम-आदमी दूसर के गोड़ म खड़े होथे. दूसर के गोड़ म बइठथे. जइसे कलेवा म लाडू अउ रिश्ता म साढू होथे वइसने चुनाव बखत ये नेता अउ आम-आदमी नता-गोता होथे. आम-आदमी के हालत लमसेना (घर-जमाई) बरोबर हो जथे. कहे गे हे ‘मंगनी के बइला,अउ लमसेना/मरे चाहे बांचे,जोते के काम.’
कुरसी के मया अउ माया म
गोबरदास अपन गुरू गंभीर बानी ले किहिस-‘कुरसी महा ठगिनी होथे. नेता मन अपन कुरसी मोह म जनता ल चिखला बरोबर खदबदा डरथे. उन कुरसी के मया अउ मोह म एक दूसर ल सिंग मारत रहिथें. अइसे लागथे के गोल्लर मन के लड़इ म बारी ह चौपट होवत हे. मूल मुद्दा ले भटक के सब गम्मत जादा करथे. एमा आम-आदमी चटनी हो जथें.’
थूंके-थूंक म लडूआ बंधाय
शेखचिल्ली किहिस-‘आम-आदमी ह रद्दा-बाट म झटका खावत रहिथें. आश्वासन उन ल अतेक मिलथे के नेताजी मन थूंके-थूंक म उनकर मन बर लडूआ बांध के देखा देथें. आम-आदमी के हालत ‘टठिया न लोटिया, फोकट के गौंटिया’ कस हे. गाँव के होय चाहे सहर के नेता सुख-दुःख म उधार-बाढी दे के आम-आदमी ल मुठिया लेथें. उनकर नेतागिरी के दर्शनशास्त्र अलग होथे. एक रूपिया खर्चा करके उन पांच ले दस रूपिया कमाय के कला ल जानथें. मीठ मीठ म ठगाय के सुख मिलथे.’
अंगठा म समा जथे लोकतंत्र
लालबुझक्कड़ किहिस-‘हमर लोकतंत्र म अंगठा के बड़ कीमत हे. अंगठा के बिशेष सहयोग ले हमर लोकतंत्र ल पोसे गे हे. पूरा लोकतंत्र अंगठा के आकर म समय-समय लगथे.पंचइत ल ले के संसद तक अंगठा भरोसा चलत दिखत रिहिस. आम-आदमी कखरो मीठ बोल ले गुरतुरा जथे. खबरीलाल किहिस-‘देश दुनिया म संचार-क्रान्ति होय ले हर राजनेता के मुखड़ा के सुन्दरता दिखना शुरू होइस. राजनीति के आर-पार देखे-जाने बर मन उत्साहित होइस. कोन डकार मारत हे, कोन बिना डकार मारे मालामाल होवत हे ये बात आर-पार दिखना शुरू होगे. देश-दुनिया के लाल–पीला, रंगीन धंधा करइया मन दिखना शुरू होगे हें.’
इंटरनेटी दुनिया देखइस आर-पार
खबरीलाल किहिस-‘भ्रष्टाचार के महागाथा इंटरनेटी दुनिया म पारदर्शी होगे. कम्प्यूटर के आना अउ आँन लाईन सेवा ले आम-आदमी के आँखी घलो खुलना शुरू होगे हे. मोबाइल के आय ले दुनिया मुठा म समागे. आम-आदमी के कंठ फूटना शुरू होइस हे. झूठ-मूठ के कथा कहनी के सबे अध्याय सिरोय के बेरा आगे. भारतीय लोकतंत्र म राजनीति म परिवार–वाद के अंतिम बिदाई शुरू होगे हे. आम-आदमी अपन समस्या म गुंगवावत हे. अब झूठ के खेती भूंजा जही. राजनीति के जुन्ना लीला देख के अब राजभक्ति नइ जागे. अब चरिहा के पेट म चारा नइ पचे.’
अब सेल्फ मेड के तियारी
गोबरदास सब के सुन के बोलिस-‘अब त आगी खाव अउ अंगरा उलगो, तभे बदलाव दिखही. आम–आदमी ल बिना जड़-मूल के मनखे बना दे गे हे. लोकतंत्र म जेन मुहूँ म सोना-चांदी के चमचा ले के जनम लेय हें, उन देश ल धन्य-धन्य करत हें. खबरीलाल किहिस-‘अब उनकर राजसी दिन के सुरूज अस्त होना निश्चित हे.अब त सेल्फ मेड के समे आगे हे. आम-आदमी अपन आँखी के बंधाय करिया पट्टी ल निकाल फेंकत हे. अब मोर मुर्गी के एके टांग वाले फिलासफी अस्त होय के बेरा आगे. जेखर लउठी ओखर भंइस के दरसन खतम हे.’
गदहा के मुड़ म जामे सिंग
लालबुझक्कड़ किहिस-‘ख़ास आदमी अइसे-अइसे मन घलो राज करे हें जेन मुड़ ल छोड़ के माड़ी म पागा बांधे कस बुता करे हें. देश के गौरवशाली इतिहास ल कतको झन दिंयार (दीमक) बन के चर डरे हें, अउ खाली डब्बा बजाय हे.अभी त कुकुर के पूँछी ल सीधा करे म देश के ऊर्जा लगत हे. व्यवस्था अतेक बीमार हे के गदहा (मूर्ख) के मुड़ी म सिंग जगोय बर पूरा खोपड़ी राख होवत हे. अउ बुद्धिमान मन देश के राजनीतिक तमाशा देखत-देखत बुढा जात हें. उन ल कमजोर करे बर लोगन एड़ी म चुटइया लाय बर भिड़े हें. इही ल कथें-‘उलटा-पुल्टा होय संसार,नाउ के मुड़ ल मुड़े लोहार. आम-आदमी के कंधा चढ़ के राजनीति के अस्त्र-शस्त्र चलइया मन के निशाना अब चूकना शुरू हो गे हे.