देश में कोरोना वायरस के पॉजिटिव मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है, वैसे ही कुकुरमुत्तों की तरह घटिया पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट्स (PPEs) बनाने वाले भी उगते जा रहे हैं. ये हेल्थ सेक्टर के लिए सुरक्षा उपकरणों के लिए सख्त गाइडलाइंस को ताक पर रखकर किया जा रहा है. इंडिया टुडे की जांच में ये सामने आया है.
फर्जी PPEs, घटिया यूनिट्स
जांच से पता चला कि किस तरह गंदे कारखाने रातों रात PPE फैक्ट्रियों में तब्दील हो गए. इन कारखानों की दीवारों पर पान की पीक के निशान साफ देखे जा सकते हैं. यहां बनियान पहने ही कर्मचारी कैरी-बैग बनाने वाले कपड़े से तथाकथित मेडिकल उपकरण बनाते देखे जा सकते हैं.
बता दें कि स्वास्थ्य अधिकारियों ने PPE का उत्पादन कुछ चुनिंदा कंपनियों तक ही सीमित कर रखा है. ये वो कंपनी हैं जिन्होंने सख्त लैबोरेट्री टेस्ट को पास कर रखा है. इन कंपनियों की आधिकारिक सप्लाई चेन पर बारीकी से नजर भी रखी जाती है.
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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन के मुताबिक सरकार ने देश भर में करीब तीन दर्जन मैन्युफैक्चरर्स की PPE उत्पादन के लिए पहचान कर रखी है. उन्होंने हाल में एक बयान में कहा कि “इन्हें खास तौर पर प्रशिक्षित किया गया और उनके कौशल को प्रतिष्ठित कोयम्बटूर लैब में परखा गया.”
इंडिया टुडे की अंडरकवर जांच से सामने आया कि किस तरह दिल्ली और आसपास खस्ताहाल सिलाई के कारखाने धड़ल्ले से PPEs का उत्पादन करने में लगे हैं.
बिना कमीज पहने एक शख्स मेरठ के एक कारखाने में हेल्थवर्कर्स के लिए कवरऑल (पूरे शरीर को ढकने वाला खुला कपड़ा) सिलने में लगा है. सारा मैटीरियल गंदे फर्श पर पड़ा है. इस यूनिट का नाम गौतम स्पोर्ट्स है. पहले यहां क्रिकेट बैट्स और बैडमिंटन रैकेट्स के कवर बनाए जाते थे. अब उसी मैटीरियल से PPEs बनाए जा रहे हैं.
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फर्जी PPEs की लोकल बिक्री
यूनिट मालिक मनोज गर्ग ने बताया कि मेरठ के स्थानीय अस्पतालों से बल्क ऑर्डर मिलते हैं. गर्ग ने कहा, “हम खेल के सामान जैसे बैट और रैकेट के कवर और बैडमिंटन के जाल बनाते थे.”
रिपोर्टर- “अब आप ये (PPEs) बना रहे हैं.”
“ हां भाई, अब हमें ऑर्डर मिले हैं. स्थानीय अस्पतालों से डिमांड है, कई एजेंट शामिल हैं. वो किट्स की मांग करते हैं, हम बना कर डिलिवर करते हैं.”
गर्ग ने कबूल किया कि पूरी सप्लाई चेन मैटीरियल, उत्पादन और शिपमेंट सभी कुछ अवैध है. सुरक्षा से जुड़े इंजीनियरिंग और प्रशासनिक नियंत्रण जैसे अनिवार्य प्रावधान तो दूर की बात है.
गर्ग ने बिचौलिए की पहचान देकर मिले अंडरकवर रिपोर्टर को ये भी बताया कि उसके जैसे सप्लायर्स का लोकल डिलिवरी के लिए इंसपेक्शन भी नहीं किया जाता.
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रिपोर्टर- “क्या तुम्हारे पास किसी तरह का लाइसेंस है या बाहर से अरेंज करना होगा?”
गर्ग- “ वो आपको खुद करना होगा. लोकल डिलीवरी के लिए इसकी जरूरत नहीं. हम सामान बनाएंगें और आपको दे देंगे.’’
दिल्ली में सीलमपुर की संकरी, गंदी गली में अंडरकवर रिपोर्टर PPEs के अस्थायी कारखाने में पहुंचा. इसके मालिक आलम ने बताया कि वो जिस फैब्रिक से मेडिकल गियर बना रहा है, उससे पहले वो कोट-ब्लेजर्स के कवर बनाया करता था.
आलम-” मैं यहां गाउन और ब्लेजर्स के कवर सिला करता था. उसी मैटीरियल से PPEs बनाए जा रहे हैं. अभी मैं हर किट के लिए 150 रुपए ले रहा हूं.”
दर्जियों को आउटसोर्सिंग
दिल्ली के COVID-19 हॉटस्पॉट क्षेत्र सदर बाजार में लक्ष्मी नॉन-वोवेन फैब्रिक्स के मनोज को अपने गोदाम में घटिया PPE किट का स्टाक भरता देखा गया. यहां भी ये किट बैग्स और ब्लेजर्स के कवर बनाने वाले मैटीरियल से बनाए गए थे.
मनोज- “ये (मैटीरियल) कई आइटम बनाने के काम आता है, जैसे ब्लेजर कवर्स और कैरी बैग्स. कई लोग PPEs सिलने के काम में लगे हुए हैं.” मनोज के मुताबिक आसपास हर दिन 2,000 ऐसे जाली किट्स बनाए जा रहे हैं.
दिल्ली के फिल्मिस्तान के पास एक और घटिया गियर बनाने वाले निर्माता समीर ने बताया कि वो आसपास के स्थानीय दर्जियों को आउटसोर्सिंग पर गियर बनाने के लिए देता है.
समीर-“हम इसे जॉब पर बनवाते हैं. हम उन्हें उत्पादन के लिए मैटीरियल देते हैं. मेरे सारे उत्पादन की खपत हो जाती है. कुछ भी बिना बिका नहीं रहता.”
PPEs के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक
अंतरराष्ट्रीय मानकों और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मानकों के मुताबिक क्लिनिकल सेटअप्स में इस्तेमाल किए जाने वाले PPE किट्स खून, शरीर के अन्य द्रव्यों और माइक्रोब्स को लेकर प्रतिरोधी होने चाहिए.
जनहित में की गई इस इंडिया टुडे जांच का उद्देश्य अस्पतालों को ऐसी सप्लाई के लिए बिचौलिए के चक्कर में आए बिना निर्धारित और विश्वसनीय चैनल्स के साथ ही डीलिंग करनी चाहिए.

