पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के निधन के बाद खाली हुई मरवाही सीट में उपचुनाव के लिए राजनीतिक पार्टियों ने काफी जोर आजमाइश की. जाति के फेर में फंसकर अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी और बहु ऋचा जोगी का नामांकन खारिज हो गया. उसके बाद सीधी टक्कर बीजेपी और कांग्रेस के बीच रही दोनों ही पार्टियों ने डॉक्टरों पर दांव खेला. बीजेपी के प्रत्याशी डॉ. गंभीर सिंह थे और बीएमओ की नौकरी छोड़कर डॉ. केके ध्रुव ने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में राजनीति में प्रवेश किया.
दिग्गजोंं ने किया था प्रचार
दोनों ही पार्टी, बीजेपी और कांग्रेस के दिग्गजों ने चुनाव में जमकर प्रचार किया. कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने खुद यहां जाकर 3 दिनों तक धुंआधार प्रचार किया. वहीं जिले के प्रभारी मंत्री मंत्री जयसिंह अग्रवाल भी यहां पिछले 4 महीनों से डटे रहे. इतना ही नहीं भूपेश कैबिनेट के बाकी मंत्रियों ने भी यहां बारी-बारी से जाकर कांग्रेस के पक्ष में प्रचार किया. इधर, बीजेपी से पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह समेत पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, केदार कश्यप जैसे नेताओं ने भी अपनी पूरी ताकर मरवाही में झोंकी. चुनाव से पहले जिस जोगी वोट बैंक की चर्चा जोरों पर थी उसे हर कोई अपने पक्ष में करने की पुरजोर कोशिश करते दिखायी दिए और अमित जोगी ने भी चुनाव से ठीक पहले बीजेपी को अपना समर्थन दे दिया, जबकि उन्ही की पार्टी के दो विधायकों ने इस समर्थन का विरोध भी किया. इन तमाम राजनीतिक दांव-पेच के बावजूद 38 हजार 197 मतों की लीड लेकर कांग्रेस के केके ध्रुव ने यहां से जीत हासिल की. डॉ. केके ध्रुव को पिछले चुनावों में अजीत जोगी से भी ज्यादा वोट मिले. केके ध्रुव को कुल 83 हजार561वोट मिले, जबकि बीजेपी के डॉ. गंभीर सिंह को 45 हजार 364 मतों से ही संतोष करना पड़ा.ये भी पढ़ें: Big News: दिल्ली HC का आदेश, 33 निजी अस्पतालों में 80 फीसदी ICU बेड COVID-19 मरीजों के लिए करें रिजर्व
मरवाही मे जीत की फैक्ट फाइल तब से अब तक
साल प्रत्याशी मिले वोट जीत का अंतर
2020 डॉ केके ध्रुव 83561 38197
2018 अजीत जोगी 74041 46462
2013 अमित जोगी 82909 46250
2008 अजीत जोगी 67523 42092
2003 अजीत जोगी 76269 54150
2001 अजीत जोगी 71211 50668
जोगी परिवार का था कब्जा
राज्य बनने के बाद से अजीत जोगी यहां के विधायक रहे. वहीं 2013 में अमित जोगी ने यहां से जीत हासिल की, लेकिन विकास के मामले में मरवाही अब भी काफी पिछड़ा हुआ है. यहां अशिक्षा, बेरोजगारी के साथ कुपोषण की दर भी काफी ज्यादा है. पूर्व मुख्यमंत्री भले ही यहां के विधायक रहे लेकिन मरवाही की जनता को ऐसा कोई भी विकास नहीं मिला जिसकी वो हकदार थी. मंत्री जयसिंह अग्रवाल का कहना है कि जोगी परिवार अब तक मरवाही की जनता से न्याय मांग रही थी और जनता ने उनको सही न्याय दे दिया और अब उनकी पार्टी का कोई अस्तित्व नहीं रहा. कांग्रेस की जीत को लेकर प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला का कहना है कि जनता कांग्रेस और बीजेपी ने गठबंधन कर कांग्रेस को रोकने की कोशिश की, लेकिन जनता ने इस सिरे से नकार दिया. सुशील आनंद शुक्ला का कहना है कि साल 2018 के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जनहित में जो फैसले लिया और उसे अमलीजामा पहनाने का काम किया साथ ही पेण्ड्रा-गौरेला-मरवाही को जिला बनाने का जो काम किया उसे जनता ने पसंद किया और नतीजे कांग्रेस के पक्ष में रहे जबकि जिस जोगी फैक्टर की बात अब तक होती रही है. जोगी कांग्रेस द्वारा बीजेपी को समर्थन देने के बावजूद प्रत्याशी के खाते में जोगी के जीत के अंतर तक का भी मत उन्हे नहीं मिल पाया.
अमित जोगी ने कही ये बात
मरवाही में बीजेपी की हार को अमित जोगी की हार के साथ जोड़कर देखा जा रहा है. ऐसे में न्यूज़ 18 से हुई बातचीत में अमित जोगी ने कहा कि अकेले कुश्ती लड़ने से किसी की जीत नहीं होती और कांग्रेस प्रत्याशी की तथाकथित जीत का एकमात्र कारण उनके परिवार को चुनाव नहीं लड़ने और प्रचार नहीं करने देना है, इसके बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी उनके परिवार के 20 सालों का रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाए. वहीं उनकी पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के भविष्य को लेकर कहा कि उनकी पार्टी छत्तीसगढ़ और यहां कि जनता के लिए है और पार्टी ऐसे ही चलेगी अमित जोगी का कहना है कि उनके पास अब चुनौतियां तो हैं, लेकिन चुनौतियों का सामना करना ही उनकी विरासत है और वे संघर्ष करते रहेंगे. जोगी का कहना है कि वे बिल्कुल भी भयभीत नहीं है और वे कभी हिम्मत नहीं हारेंगे.
20 सालों बाद किसी एक परिवार से अलग राजनीति में पहली बार कदम रखने वाला व्यक्ति यहां का विधायक बना है. मरवाही इलाके में कई ऐसी समस्याएं हैं जो राज्य बनने के पहले से है और शायद जनता ने इस उम्मीद से यहां कांग्रेस का विधायक चुना क्योंकि राज्य में सरकार कांग्रेस की है और एक अदद विकास का इंतज़ार कर रही मरवाही की जनता को कांग्रेसी विधायक चुनने का फायद मिल सके.

