छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- ‘झांपी’ छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक धरोहर

ओकर गुन, करम, सुभाव अउ उपयोग ला ओकर मन के छोड़े दूसर कोनो समझ नइ सकय? समे के संगे-संग जइसे अउ दूसर जिनिस, जीव-जन्तु, भाखा, बोली सब नंदावत जात हे तइसने इहू ल अजगर असन ओ समे हा निगलत जात हे. फेर धन हे छत्तीसगढि़हा मन अपन जुन्ना संस्कृति ला भुलावत नइहे, बेंदरी-बेंदरा मन जइसे अपने पिला ला छाती मं पोटार के जिहां जाथे तिहां ले जथे, रुख-राई मं घला छलांग लगा देथे फेर ओ पिलवा मन गीद-गीद ले पोटार के धरे रहिथे अपन दाई-ददा मन ला. वइसने कस छत्तीसगढि़हा मन के हे. अपन कला, संस्कृति, बोली-भाखा, परब-परम्परा ला नइ छोड़े हे, न छोड़ऩा चाहय. फेर अपसंस्कृति एकर मन बर बइरी बनगे हे, तोलगी छोरे बर अमादा होगे हे. जइसन नइ होना चाही तइसन देखे, सुने ले मिलथे. ओला देख के सबके जीव करलाय असन लागे ले धर लेहे. आन डाहर ले आय हे तउने मन इहां मालिक बन बइठिन अउ अपन कोती के बोली भाखा, कला, संस्कृति अउ परंपरा ला लादे के कोशिश करिन. विज्ञान घला ओमन ला पंदोली देइस, फेर का हे, सब कोती बदलाव होय ले धर लीस. ओकर से संस्कृति घला अपन आप ला बचाय नइ सकिस अउ ओकर लपेटा मं आगे.

‘झांपी’ छत्तीसगढ़ के पुरखउती जुन्ना सांस्कृतिक धरोहर हे. बर-बिहाव मं एकर जरूर उपयोग होथे, फेर आज इहू हा नंदागे तइसे कस लागथे. कोनो बर-बिहाव मं एहर दिखबे नइ करय. पहिली एकर बिना कोनो काम सिध नइ परत रिहिसे. आज तो एकर जघा ला संदूक, पेटी, मन ले लेहें. कडऱा जाति के मन ये झांपी ला बनावय. जब ले फैशन संस्कृति, नवा जमाना झपागे हे भूत-परेत बरोबर तब ले एकर मन के रोजगार छीनागे हे. भटकत रहिथे रोजगार बर एती-ओती.

‘झांपी’ सिरिफ बर-बिहाव के काम आवय, अइसन बात नइहे. छत्तीसगढ़ के गांव-गांव मं पहिली झांपी देखे ले मिलय. कोनो घर अइसे आरुग नइ रिहिसे जिहां एहर नइ मिलत रिहिस होही? कपड़ा-लत्ता ला सब झांपी मं रखय, तब ओ समे लोहा अउ लकड़ी के संदूक के चलन नइ रिहिसे. एकर आय ले झांपी मन के घर निकाला होगे या होय ले धर लेहे. गांव वाले मन के छोड़े देवी मंदिर मन मं घला आजो झांपी के चलन चलत हे.

कडऱा मन घला बड़े कलाकार रिहिन हे. किसिम-किसिम के मनभावन, सुंदर-सुंदर झांपी, पर्रा, बिजना बनावय. वइसे झांपी आमतौर मं तीन परकार के देखे गे हे. देवी झांपी, बेटी झांपी अउ घरेलू झांपी. सबो झांपी मन के अलग-अलग उपयोग हे, तउन हिसाब ले ओला बनाय जात रिहिसे.

देवी झांपी आमतौर मं बस्तर अंचल मं जादा देखे बर मिलथे. उहां देवी गुड़ी होथे तिहां एकर उपयोग होथे. बस्तर मं जउन देवी-देवता होथे तेकर रोज ‘साज-सिंगार’ करे के परम्परा नइहे. मंगलवार या शनिवार के दिन ओकर मन के ‘साज-सिंगार’ होथे. ओकर मन के कुछ खास आभूषण अउ कपड़ा होथे तेला सालाना जात्रा के दिन बाहिर निकाल के ‘देवी-देवता’ मन ला सजाय जाथे. ये कपड़ा अउ आभूषण ला सुरक्षित रखे खातिर खास पारंपरिक रूप से बांस के पेटी तइयार करे जात रिहिसे उही ला गांव वाले मन देवी झांपी कहिथे. ये झांपी मन मं तीन कोती ले सांकल लगे ताला होवत रिहिसे. ताला सुरक्षा के हिसाब से लगाय जात रिहिसे. देवी झांपी, माता मंदिर अउ देव गुड़ी मं रखे जात रिहिसे. आजो ओ परम्परा उहां जीवित हे.

देवी झांपी के छोड़ दूसर झांपी ला बेटी झांपी केहे जाथे. शादी के समे जब बेटी के बिदा होथे तब ओला भेंट मं मइके पक्ष कोती ले अनगिनत जिनिस दे जाथे, इही ला छत्तीसगढ़ मं ‘जोरन’ प्रथा कहिथे. आजो बिहाव के समे वर पक्ष कोती ले वधु (बेटी) बर आभूषण अउ कपड़ा लाने रहिथे. जब मंडप मं ओला मंगवाय जाथे (विवाह मंडप में मंगाने का रस्म) तेला छत्तीसगढ़ मं जेवर-बलाव केहे जाथे. बेटी ला गृहस्थी बसाय खातिर कतको घरेलू वस्तु भेंट करे जाथे. ये परंपरा आज घलो बने हावय. तभे तो बांस के बने बड़े-बड़े झांपी मं बेटी के कपड़ा, जेवर-गहना, कलेवा, मिठाई जोर के बिदा करे जाय. बीच रसदा मं कोनो शैतान अउ बदमास किसम के बराती मन झांपी मं रखे सामान के चोरी झन कर लय, ओकर सुरक्षा करे खातिर झांपी ला सांकल मं लपेट के ताला ठेंस दंय. फेर जउन ला शैतानी, बदमाशी अउ चोरी करे के आदत रहिथे ओमन कहां बाज आने वाला हें, बीच रसदा मं अपन हरकत आजो कर देथें.

देवी, बेटी झांपी के छोड़े एक ठन अउ घरेलू झांपी होथे जेमा घर के जरूरी खाये-पीये अउ कपड़ा रखे जात रिहिसे. अइसन झांपी मन के दिन अब नंदागे या फेर धीरे-धीरे नंदावत जात हे, काबर के अब ओकर जघा ला लकड़ी अउ लोहा के संदूक (पेटी) मन झटक लेहे. अब तो इहु मन तिरियाय ले धर ले हें एकर जगह सूटकेस चमक धमक के संग अपन जलवा देखे ले धर ले हे| फेर बस्तर अंचल कोती अउ छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाका मं आजो झांपी ह देखे ले मिलथे. अपसंस्कृति आदिवासी मन के कांही नइ बिगाड़ सके हे| झांपी इहां ज़िंदाबाद हे. वनांचल कोती जिहां पाबे तिहां बांस के बने बड़े-बड़े चरिहा अउ झउंहा बउरे (उपयोग) जाथे, एहर धान अउ दुसर अनाज रखे के काम आथे.

(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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