मुसुवा के मन के अंइठई ला तो देखव, कइसे गुंडा-मवाली मन सही छाती तान के रेंगथे, घर के चारों मुड़ा. कोठी के धान के धुर्रा बजा देथे. बड़े-बड़े कोठी ल करो-करो (चुन-चुन) के सइतानास कर दे हें. अन्न होथे तउनो मन बर ओकर मन के नीयत गड़े हे. अंगना मं रखे धान के बोरा ल तो बाप कस माल अइसे गुलछर्रा उड़ावत हे जइसे बरतिया मन पेट के फूटत ले खाथें.
ओ दिन घर के चारों मुड़ा, कोठी समेत कोनों जघा अइसे नइ छोढ़ेव जिहां ओमन ला केरा मं जहर मिला के खाय बर देंव. कांही आंच नइ परिस, सेवई घला ल खाके डकार दिन. एक ठन कोनों मुसुवा तो मरतीन. अमर खाके आय हे तइसे लागथे. कोनो-कोनो किहिन- लम्बोदर महाराज के वाहन हे, संकट मोचन महाराज के किरिपा हे ओकर मन उपर. वइसन जहर दे के मारे के उदीम झन करबे.
ओ सलाहकार मन ऊपर बिफरगेव अउ केहेंव- जेकर घर मं आगी लगे हे तेकर ताप अउ दुख ला उही मन जानही, तुंहर का हे भांजी मरइया मन के. ओमन ला बतायेंव- तुमन जानथौं ये सारे मुसुवा मन थाना मं रखे गांजा, भांग, अफीम ,चरस ,हेरोइन अउ दारू के बोतल मन ल घला नइ बचावत हे. नशेड़ी होगे हे एमन घला. ओ दिन थानादार साहेब बतावत रिहिसे- काला बताबे भइया, ये मुसुवा मन के मारे तंग आगे हन. लाखों रुपया के गांजा, भांग, अफीम, चरस, हेरोइन अउ दारू ल सफाचट कर दे हें. कप्तान साहब ओ दिन रिपोर्ट मांगत रिहिसे, जब्ती के ओ सब माल के का होइस, सबला जला के सतियानास करे हौ के नहीं. सबके रिपोर्ट बताहौ , हारे जुआरी असन ओकर मेर मुंह ला ओथार देन. साहेब बघवा असन गुर्रावत पूछथे- बतावत कइसे नइहौ, मुंह मं तुंहर मन तारा ठेसागे हे का? का बतातेन भइया, जानथन बथावौं तहां ले बमक जही. फेर सही बात ल तो बताय ले परिस.
अइसने कस हाल असपताल मं डॉक्टर, नर्स, वार्ड ब्वाय अउ मेडिकल के छात्र-छात्रा मन के हे. लाखों के कीमती-कीमती दवई ल बरबाद कर दे हें, मशीन मन ला तुन-तुन के छर्री-दर्री कर दे हें. पढ़इया लइका मन के कापी-किताब, कपड़ा-लत्ता, मच्छरदानी कांही नइ बाचत हे एकर मन के मारे. कतको उदिम करिन एमन ल मारे के फेर मरबे नइ करय. रात भर अइसन उधम मचाही के एकर मन के मारे बने ढंग के सुत घला नइ सकय. का करे जाय, ककरो समझ नइ परत हे. कीमती-कीमती फाइल, रिकार्ड ल एकर मन के डर के मारे कोन तीर रखे जाय, सब इही सोच म परे हें.
मोला सुरता आवत हे, परसिध व्यंगकार स्व. हरिशंकर परसाई घला कभू अइसने ए मुसुवा मन के मारे परेसान राहय. ओकर पुस्तक, कापी, किताब, फाइल, कपड़ा-लत्ता अउ बिस्तरा ल कुतर-कुतर के सतियानास कर देवय. मच्छर मन के डर के मारे जउन मच्छरदानी ल लगा के सोवय, तेकरो बारा हाल कर देवय. कतको मच्छरदानी बदलिस फेर ये शैतान, आतंकवादी मन के आघू म ओहर हार खागे, हथियार डार दिस. का करबे-कहिथे नहीं ‘नंगा मन से खुदा डरे सही बात हे.
कतेक ल बताबे ये मुसुवा पुरान के कथा ल, जतका पन्ना बढ़ाबे ओतके एक ले बढ़के एक सत्यकथा, मनोहर कहानी बरोबर एकर मन के चरित्तर हे. ओ दिन कोनो काम ले के रेलवे ठेसन जाना परगे. माल धक्का के साहेब संग उदुक ले भेंट होगे. ओहर रोना रोवत रिहिसे ये भोकंड मुसुवा के करतूत मन ला देख के. लाखों-करोड़ों के पार्सल ये बैरी मन के भेंट चढग़े. अब ओकर हरजाना रेलवे ल भरे ले परत हे. जेती देखबे तेती एमन नुकसान के छोड़े कांही काम नइ करत हे.
ओला केहेंव- साहेब, ये देस मं सब आतंकवादी जनम धर-धर के आवत हे. मुसुवा असन देस के धन-दौलत सबो ला करो-करो के हजम करत जाथें. का नेता, का मंतरी, का उद्योगपति, नौकरशाह, बैपारी, डॉक्टर, वकील का एमन कोनो कम भोकंड मुसुवा हे. मुसुवा सही देश ल, जनता धन खोखला करत जात हे. किसान के कोठी खाली तो होते हे, एती सरकार के खजाना खाली करे मं ये मुसुवा मन कोनो कसर बाकी नइ छोड़त हे. कोनो कानून, नियम, बेवस्था के एमन ला परवाह नइहे. न मुसुवा मन दवई मं मरत हे न एमन कानून बेवस्था ल डरत हे. का होही, कइसे होही, तउन ला ऊपर वाले जानय.
(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)
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FIRST PUBLISHED : October 24, 2022, 08:30 IST
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