छत्तीसगढ़ी विशेष – कलेचुप अपन बुता ला रोज दिन सकेलत रा

समय ला अपन सेती का करना हे पहली ले निश्चित रईथे

समय ला अपन सेती का करना हे पहली ले निश्चित रईथे

लगे रेहे मा एक दिन सफलता मिलथे. लगन मा मन घलो मगन रइथे अपनेच सरीर हा अपनेच नोहे ते काके चिंता. चिंता करना हे ते आने वाला कल के कर जेनहा तोर रद्दा निहारत हे. आज के सेती आज होगे तभे तो काली आही.

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    December 24, 2020, 2:52 PM IST

सबो दिन के सेती ये जिनगी हमनला उधार मिले हे.विधाता अपन सजाए दुनिया मा कतकोन जीव-जंतु, चर-अचर प्राणी जाने अउ जनवाए बर बगराए हे.समय के बांटा घलो हाबे.दिन अउ रात मा आठ पहर बनाए हे ओकरे सेती हमर दिनचर्या निश्चित हाबे. दिनचर्या मा थोरको फरक खाइस तहां गड़बड़ी दिखे लागथे.मन के अपन अलगे ठिकाना रइथे वोला सुरताए के जरूरत के डर रइथे तभे तो ज्ञान इन्द्रीय ला अपन-अपन जगा मा फिट राखे हे.

ये भी पढ़ें : छत्तीसगढ़ी व्यंग्य – उड़त तोता पढ़े अखबार: अढ़ई-अढ़ई साल के सरकार

जवाबदारी तय होना चाही
सबले बने बात हावय के अपनला अपनेच सेती नई सोचना चाही.आंखी अपन सुख ला जानथे मिलखी मार-मार के सदा दिन खटावट आवत हे. भल ला भल जानथे अउ अनभल ला अनभल.ओखर आगू मा आए तहां तुरते निरनय होवे लागथे. चिरंउजी रा,अम्मर रा अइसे अशीष देवइया अपन मन के अनुभो सबो प्राणी मा अगुवाके के रईथे.चमचम ले अपन-अपन जगा मा माढ़े हावय अउ चेत, बिचेत झन होवय कहिके धरती माता के चिंता जग जाहिर हे. माता केहे ततके ना महतारी के मया झलके ला धर लेथे.अपन पुरती मया ला सकेलत रहना चाही.होत बिहिनिया जागत,भागत संसार मा ग्रह दिशा घलो बिना नांगा करे हमनला चेतावत रइथे. ऊंहा अराम करे के गुंजाइस नइ राहय, चलतेच राह अउ चलतेच राह बस. ग्रह दिशा के हिसाब ला जानेसुने के रद्दा हमन जान डारे हन. विज्ञान हमर ऋषि मुनि के ज्ञान ला आधार मान के चलथे अउ चलाथे. समय ला अपन सेती का करना हे पहली ले निश्चित रईथे.कोनो होवय समय ला झुको के नइ जिये पाइन तेला सबो जानत हाबे. मिले हे ते निभाव होना चाही.अब काखर हिस्सा मा का मिले हे तेला भागमानी जानके निभावत जिनगी ला पहाना हे बस.अलगिया के रेंगे मा नइ बनय

मनखे जनम धरे हावस अइसे कहिके कतको बेरा हमर परिवार के मन हुदरे असन करथें गोठियाथें. एकंगू कहूं सोंचे,अपनेच सेती जिये असन करे तहां समाजिक बंधन तोला बांधे ला धर लेथे. बंधना बहुत जरूरी.ढिल्ला बंधना के सेती कतको समाज मा उदाबादी होवत हमन देखत आवत हन. आगू पीछू आना जाना लगे रइथे. आना जाना ए संसार के रीत,नीत हरय.समिलिहा रेहे बर कतका जुग ले हमर पुरखा मन मसक्कत करिन होहीं सोंचे के बात ए. कइसे अतका दुरिहा हमन पहुंचे हावन जानना जरूरी हे. सुने अउ गुने ला लागिस तभे बक्का फुटिस होही. बक्का फुटे मा आवाज आइस होही तिरतार के मन झकनकागिन होहीं बस अतकेच मा आगू जाने बर रद्दा बनगे. केहे के मतलब सबो जनम मा होही तभे चलाव होवत आवत हे.

सरलगहा लगे राह पहिचान मिलही
कोनो, कोनो मेर जाएले जानबा होना स्वाभाविक हे टमर के देखे के जरूरत नइ परय.अपने अपन कतको झन के सेकेले बुता हा जनवा डारथे के भला मानुष तन कइसे अपन यात्रा ला सम्पन्न करिस होही.मन ला मार के एक्के जगा अपन ध्यान ला केन्द्रित करइया ए संसार ला इनाम देके गेइन हाबे. अरे! अइसे अचानक मुंह ले निकल जाथे, अनजान बरोबर जिनगी ला जीने वाला होही कहिके ककरो ध्यान ओखर डाहर नइ जावय फेर एक दिन अइसे आथे के सबो के धियान ओकर ठाहर जाए ला धर लेथे. जग जाहिर होए मा थोकिन मिहनत लागथे. लगे रेहे मा एक दिन सफलता मिलथे. लगन मा मन घलो मगन रइथे अपनेच सरीर हा अपनेच नोहे ते काके चिंता. चिंता करना हे ते आने वाला कल के कर जेनहा तोर रद्दा निहारत हे. आज के सेती आज होगे तभे तो काली आही. काल के गाल थपरा मारत तोला कलेचुप अपन बुता ला सकेलत रहना हे.




Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here