छत्तीसगढ़ी विशेष – संस्कृति, संस्कार अउ अस्मिता के सुरता

बात अइसन हे जब आघू कोती ले आँखी हा चेथी कोती आथे याने बला मुड़ उपर खपलाथे तब बग-बग ले आँखी खुलथे. वइसने कस हाल अब देश अउ समाज के होय ले धरत हे तब करनधार मन के आँखी खुलत हे. सोचत हे ए देश के संस्कार, संस्कृति अउ अस्मिता के तो बारह बजगे हे अउ अब कइसनो करके होय एला नइ बचाबो तब सब के नाश तय हे. जब तरिया के पानी खतखुरहा (गन्दा) हो जाए तब का करना चाही? न वो पानी निकासी के काम आवय न नहाय धोय के न माल मवेशी ला नहवाय धोवे के न कपड़ा लत्ता धोय के. मछरी मेचका समेत कतको जीव जंतु ओमं रहिथे तउन मन उबुक चुबुक होय ले धर लेथे आँखी कान ला छटकारे ले अउ लोरमाय ले धर लेथे. तब अइसन बखत मं का करे जाय? सवाल भारी हे अउ एकर जवाब आसानी ले कोनो नइ दे सकही तइसे लागथे. पूरा तरिया के पानी खदबदागे हे फेर एकर कोनो रसदा निकाले ले परही. रसदा एक्के ठन दिखथे या ओ तरिया ला फोर के जम्मो पानी ला बाहिर निकाल के फेक दे जाय या फेर विही पानी मं नहर ले साफ़ पानी लाके भर दे मं जम्मो पानी साफ हो जही अउ गन्दा पानी बइठ जाही.

तभो ले संकट बिकट हे मुँह बजाय ले एकर कोनो हल नइ निकलय. जब अइसन सन्निपात के मउका आवय तब का करना चाहि? गुनी, ध्यानी अउ सुजानिक मन ला रसदा चतवारे ले परथे. डोंगा (नौका) जब मझधार मं फस जाथे तब डोंघार (नाविक) कइसनो कर के डोंगा ला किनारे मं लगाय के कोशिस करथे, ओकर करा युक्ति रहिथे तभे बेड़ा पार होथे. हाथ मं हाथ धरे बइठ जाहि तब तो फेर डोंगा समेत ओकर नाम बूता जही.

बात तरिया के ख़तखुरहा पानी तीर ले शुरू होय हे. पानी कोनो काम के नइ रहिगे हे, बस तरिया भर हे, जलरंग दिखत हे पानी. महाकत (दुर्गन्ध युक्त) पानी तीर कोनो ओदहे ले नइ धरय. अइसने कस हाल आज हमर देश अउ समाज के हाल होगे हे. कहाँ गय ओ सुख शांति परेम आनंद अउ भाईचारा के ओ सोन चिरइया, मैना मयूर मन. जेला देखबे तेला सब निंदाचारी, एक दुसर के गला कतरे बर तइयार बइठे हे, कखरो सुन्दर बने भाव-सुभाव अउ चरित्र देखे सुने ले नइ मिलय. सब लफंगा, बेइमान होगे हे, ककरो जबान के कोनो भरोसा नइहे. उहू कोनो समय रिहिस हे जिहाँ कभू एक जबान मं लाखो, करोड़ो रुपिया के सौदा होवय. जबान के बिश्वास मं बड़े बड़े बैपार चलय तिहां आज धोखाघड़ी के कउआ अउ सियार मन अड्डा बना ले हे. जबान पलतट देरी नइ लगय. कोनो जगह नीमगा (साफ) नइ बचे हे जिहाँ लबारी के बिमारी नइ घुसे होही घर, परिवार, समाज, राजनीति, धरम, शिक्षा अउ बैपार जगत ला ए बिमारी दंदोर (झकझोर) डरे हे.

ए बिमारी अतेक बढगे हे के कोनो ला अब ककरो ऊपर भरोसा नइ रहिगे हे. कोन कतका बेर गच्चा दे दिही, ककरो छाती मं छुरा भूग दिही तेकर कोनो ठिकाना नइहे. घर, परिवार, समाज, सरकार बैपार, मंदीर, मसजिद, गिरजा, गुरुद्वारा सब धकपकाय हे, सब के मन मं डर समागे हे के कब का हो जही ओला कोनो कहे अउ बता नइ सकय. बेचैन, अशांत, सरकार के कोन कब कतका बेर तखता पलट दिही, बैपार, बैंक के दिवालियाँ निकल जही, कोन महंत साधू संत धरम ला छोड़ के अधरम के मार्ग में चल परही नइ जाने जा सकय.ए बिमारी अजार ले अउ जादा बढ़गे हे अइसन मं तीन जुग मं एकर मन के परान नइ बाचय तइसे लागथे. जब हाथी ला ग्राह ह खीचत तरिया के बीच मं लेगे ले धरथे तब ओहर छटपटाय ले धर थे. अपन परान के तब फेर ओहर ऊपर वाले करा ले भीख मांगथे तइसे कस हाल आज देश अउ समाज के होय ले धरले हे. होबे करही जब अपन संस्कार, संस्कृति अउ अस्मिता ला जउन भुला जही तेकर सर्वनाश तो एक दिन होबे करथे. तरिया के खतखुरहा पानी मं फसे जीव जंतु जइसे कलबलावत रहिथे वइसने कस हाल संस्कृति अउ संस्कार ला मटियामेट करे के परिनाम आज देश अउ समाज ला देखे ले परत हे. कहाँ जाथे लोगन मन, कोन रसदा मं रेंगत हे सबके आंखी मं दिखत हे. दारु पियाय ले, बड़े बड़े माल संस्कृति ला लागू करे मं कोनो संस्कार नइ बनय, ए तो सर्वनाश कोती जाय के रसदा हे. अब जब चारो कोती अंधियार दिखत हे तब सब ला अपन अस्मिता, संस्कृति अउ संस्कार गढ़हे के सुरता आवत हे. अब करे का होवत हे जब चिरई मन पूरा खेत ला चुग डरे हे. ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)




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