छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: एक कटोरी साग के छत्तीसगढ़ मा बिसरावत संस्कृति | kawardha – News in Hindi

छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: एक कटोरी साग के छत्तीसगढ़ मा बिसरावत संस्कृति

परोसी संग मया पीरित बाँटेबर ओखर नानमुन बूता मा पंदोली देना, सोर संदेश लेजना लानना, ओखर सगा पहुना नत्ता ला अपन बरोबर मानना, यहू छत्तीसगढ़ के चिन्हा आवय.

परोसी संग मया पीरित बाँटेबर ओखर नानमुन बूता मा पंदोली देना, सोर संदेश लेजना लानना, ओखर सगा पहुना नत्ता ला अपन बरोबर मानना, यहू छत्तीसगढ़ के चिन्हा आवय.

हे जाथे संगवारी ला रोज बदले जा सकत है फेर परोसी नइ बदले जा सकय. छत्तीसगढ़िया मन अपन पारा परोसी ले मया बाँधेबर अउ ए बँधाय मया झन टूटे ओखर खातिर किसम किसम के उदीम करथे. इही उदीम मा परोसी ला एक कटोरी साग देय के परंपरा घलो चले आत हे. परोसी संग मया पीरित बाँटेबर ओखर नानमुन बूता मा पंदोली देना, सोर संदेश लेजना लानना, ओखर सगा पहुना नत्ता ला अपन बरोबर मानना, यहू छत्तीसगढ़ के चिन्हा आवय.

छत्तीसगढ़िया मन कहिथे, अपन घर के भात अउ परोसी घर के साग मिठाथे. परोसी घर के साग माँगे अउ खाय मा माइलोगिन मन आगू रहिथे. यहू कहे जाथे कि माइलोगिन मन अपन राँधे साग के बखान अउ “साग हा बने लागिस” ला दूसर के मुँह ले सुनके अबड़ खुश होथे. एखर सेती घलो परोसी घर एक कटोरी साग भेजथे. माइलोगिन मा यहू देखे जाथे कि अपन के हाथ ले बने साग ले दूसर के हाथ ले बने साग हा कमती मिठाय हे कहिथे, फेर खायबर दूसर घर के साग ला नइ छोड़य. सास मन अपन बहू ला उलाहना देथँय, देख फलानी के बहू हा साग ला कइसे राँथथे ता अबड़ मिठाथे.

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छत्तीसगढ़नीन मन अपन पारा परोस के एक दू झन परोसिन घर रोज बइठे बर नइ जाही ता ऊँखर बेर  नइ बूड़े अउ चारी नइ करही ता खाय पेट के जेवन नइ पचय. बूता ले फूरसद होय पाछू अउ संझा कुन कखरो घर साग सुधारे के बेरा मा बइठे चल दिस ता परोसिन संग मा गोठियावत गोठियावत साग सुधारे, भाजी निमारे टोरे लग जाथे. ओखर घर लहुटे पाछू अउ साग छुरे के पाछू  वहू परोसिन हा तहान एक कटोरी साग उँखर घर भेज देथे. परोसी घर ले साग आय कटोरी ला जुच्छा लहुटाय के संस्कृति छत्तीसगढ़ मा नइ हे. ता अपन घर के कुछु खाय के जिनिस नइते अपन घर के साग ला उही कटोरी मा भर के उँखर घर लहुटाय जाथे.

छत्तीसगढ़ के गाँव या पहिली बाहिर बट्टा, दिशा मइदान, टट्टी पोखार जाय के ठउर गाँव ले बाहिर रहय. माइलोगिन मन अरोसी परोसीन संघ गोठियात ओती जावँय तभो इहीच गोठ कि आज काय साग राँधे रहे नइते काय सा राँधबे ? अउ कोनों ओखर पसंग के साग होगे ता कहिथे-एक कटोरी साग देबे. ये परंपरा हा अब घर मा शौचालय ले कमतियात हे. फेर आज मोबाइल होय ले माइलोगिन मन अपन संगवारी, नत्ता गोत्ता संग गोठियाही ता आखिरी मा पूछे बर नइ भुलावय कि काय साग राँधे हस ? अउ अपन साग ला बतावत ओखर बखान करही.

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एक कटोरी साग हा दू परिवार के मया ला बढ़ा देथे. महतारी के बिपत के बेरा ला बनेच टारथे. कोनों लइका ला आज के साग पसंग नइ आवय ता ओहा अपन महतारी ला बिपत मा डार देथे अउ आज नइ खावँव कहिके रीसा जथे, ता महतारी हा लउहा धकर एक कटोरी साग धरके परोसी घर जाथे अउ ऊँखर घर ले साग माँग के लाथे अउ लइका ला भूखे लाँघन झन सूते कहिके खवा देथे. माँस मछरी खवाइया मन के चुलुक हा घलो परोसी घर चुरत मछरी के एक कटोरी साग आय के आस लगे रहिथे. परोसी मन घलो एक कटोरी साग देके पबरित नत्ता ला बनाय राखथे.




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