तीसरे अटेंप्ट में सुधरी रैंक और किसान परिवार की बेटी बार्क में बन गई साइंटिस्ट

तीसरे अटेंप्ट में रैंक सुधरी तो स्वाति साहू के साइंटिस्ट बनने का सपना पूरा हुआ . (प्रतीकात्मक तस्वीर)

तीसरे अटेंप्ट में रैंक सुधरी तो स्वाति साहू के साइंटिस्ट बनने का सपना पूरा हुआ . (प्रतीकात्मक तस्वीर)

अपने सलेक्शन के बारे में स्वाति बताती हैं कि बार्क में उनका इंटरव्यू तकरीबन सवा घंटे चला. उन्होंने कहा कि जब उनका इंटरव्यू लंबा होने लग गया था तभी उन्हें अहसास होने लगा था कि कुछ बेहतर होने वाला है.

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    January 15, 2021, 10:42 PM IST

रायपुर. तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर – शैलेंद्र ने ये पंक्तियां जिस भी मिजाज से लिखी हों, पर यकीनन ये पंक्तियां जिंदगी का फलसफा तैयार करने वाली हैं. स्वाति साहू (Swati Sahu) का हौसला भी शायद ऐसा ही था, तभी तो उन्होंने अपना स्वर्ग धरती पर उतार लिया. वह किसान परिवार (farmer family) की बेटी हैं. उनका ताल्लुक रायपुर के करोरो से लगे इल्दा से है. स्वाति का सपना था साइंटिस्ट (scientist) बनने का. उनके पिता धनेश कुमार साहू बालोद जेल में मुख्य प्रहरी हैं. पर उन्होंने घर में प्रहरी होने के साथ-साथ पंख की भी भूमिका निभाई. तभी तो उनकी बेटी स्वाति सीमित साधनों की जेल से निकल कर खुले आसमान में उड़ चलीं और साइंटिस्ट बनने के अपने सपने को जमीन पर उतार लिया. जी हां, उनकी मेहनत और घर के साथ का असर है कि उनका सलेक्शन भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में बतौर साइंटिस्ट हुआ है.

अपने सलेक्शन के बारे में स्वाति बताती हैं कि बार्क में उनका इंटरव्यू तकरीबन सवा घंटे चला. उन्होंने कहा कि जब उनका इंटरव्यू लंबा होने लग गया था तभी उन्हें अहसास होने लगा था कि कुछ बेहतर होने वाला है. वह कहती हैं कि आपके जवाब के हिसाब से जब पैनल सवाल पूछता जाता है तो जाहिर है इंटरव्यू लंबा होगा. यह एक तरह से सफलता का संकेत है. इसलिए मुझे अनुमान हो चला था. वे कहती हैं कि बार्क के साक्षात्कार में किसी भी जवाब के सही या गलत होने से ज्यादा मायने यह बात रखती है कि विषय में आपका एप्रोच कैसे है. पांच पसंदीदा विषय पर आपकी नॉलेज देखी जाती है, आपकी डेफ्थ देखी जाती है. वह याद करती हैं कि ग्रेजुएशन के बाद कोचिंग वगैरह मिलाकर उन्होंने तकरीबन साढ़े चार साल जबरदस्त तैयारी की थी. इसका लाभ उन्हें मिला.

आपको बता दें कि स्वाति की शुरुआती पढ़ाई सरस्वती शिशु मंदिर से हुई. बारहवीं तक वे नवोदय विद्यालय में रहीं और फिर 2016 में बिलासपुर शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिक एंड टेलीकम्युनिकेशन से स्नातक किया. इसी बीच उन्होंने न्यूक्लियर एनर्जी पर काम करने का विचार बनाया. गेट क्रैक करने के बाद रास्ते बनते जाते हैं. इसलिए उन्होंने गेट की तैयारियां शुरू कर दीं. वह याद करती हैं कि जब पहली बार उन्होंने गेट की परीक्षा दी तो 7800वीं रैंक आई. 2018 में रैंक सुधरकर 1800 हुई. लेकिन इस मामूली सुधार ने उनके भीतर उम्मीद की बड़ी लकीर खींच दी. इसके बाद 2019 में 1000 रैंक लाने में कामयाब रही. रैंक सुधारने के लिए तीन बार गेट देना पड़ा. वे बतलाती हैं कि उन्होंने डीआरडीओ के लिए भी कोशिश की थी. इंटरव्यू तक भी पहुंचीं, लेकिन मामूली नंबरों से चूक गईं. बार्क के लिए भी उन्होंने अप्लाई किया था. यहां उनका सलेक्शन हो गया.







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