नक्सल प्रभावित बस्तर में तैयार हो रहा है ‘विक्टिम रजिस्टर’, पीड़ितों के दर्द का दस्तावेजीकरण

नक्सल प्रभावित बस्तर में शांति स्थापना के लिए 'न्यू पीस प्रोसेस' शुरू हुई है, जिसकी पहल शुभ्रांशु चौधरी ने की है.

नक्सल प्रभावित बस्तर में शांति स्थापना के लिए ‘न्यू पीस प्रोसेस’ शुरू हुई है, जिसकी पहल शुभ्रांशु चौधरी ने की है.

शुभ्रांशु चौधरी नक्सल प्रभावित क्षेत्र बस्तर में पीड़ितों की कहानियां जुटा रहे हैं. उन्होंने इस पहल को ‘न्यू पीस प्रोसेस’ (एनपीपी) नाम दिया है. अब तक लगभग 20 हजार लोगों का विवरण एकत्र किया है.

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    January 28, 2021, 10:46 AM IST

बस्तर. जोगा मंडावी जो अब तेलंगाना के कन्नपुरम में रहते हैं, ने भी 2006 में अपने गांव से भाग लिया था जब सलवा जुडूम अभियान अपने चरम पर था उनके दो बड़े भाई अभी भी छत्तीसगढ़ में रहते हैं. जोगा ने कहा कि उनके भाई और बहनोई को पुलिस ने एक फर्जी मुठभेड़ में मार दिया, उन पर नक्सली होने का झूठा आरोप लगाया गया. जोगा मंडावी जैसे लगभग 30 परिवार, छत्तीसगढ़ के 50 किलोमीटर दूर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सीमा पर स्थित कन्नपुरम में रहते हैं, ये सारे परिवार सलवा जुडूम अभियान (Salwa Judum Campaign) के चरम के दौरान 2005 और 2007 के बीच बस्तर से भाग कर यहां आए और बस गए हैं.

शुभ्रांशु चौधरी सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच दशकों से चली आ रही लड़ाई से ऐसे ही पीड़ितों की कहानियां जुटा रहे हैं. चौधरी और उनकी टीम पिछले कई हफ्तों से इस काम में जुटी हुई है. उन्होंने इस पहल को ‘न्यू पीस प्रोसेस’ (New Peace Process-NPP) नाम दिया है. उन्होंने अब तक लगभग 20 हजार लोगों का विवरण एकत्र किया है. उन्होंने बताया कि हिंसा से पीड़ित अनुमानित 1 लाख लोगों का एक हिस्सा मात्र हैं। ‘विक्टिम्स रजिस्टर’ जरिए शुभ्रांशु चौधरी उन लोगों की जानकारी जुटा रहे हैं और वह इस अभियान में सरकार को भी शामिल करना चाहते हैं, जिससे शांति स्थापित की जा सके.

चौधरी और उनकी टीम ने पिछले साल अक्टूबर में बस्तर के स्थानीय लोगों से एक सर्वेक्षण कराया था कि क्या उन्हें लगता है कि चल रहे संघर्ष का समाधान बातचीत या सैन्य तरीके से होगा। इस पर 92 फीसदी लोगों ने कहा था कि हिंसा का हल बातचीत के माध्यम से हो सकता है. उनका मानना है कि सलवा जुडूम अभियान द्वारा विस्थापित परिवारों, जिसमें राज्य ने नक्सलियों से लड़ने के लिए स्थानीय नागरिकों को हथियार दिए गए थे, लेकिन इससे कई लोग अपने परिवार के सदस्यों और भूमि को खो चुके हैं.

शुभ्रांशु को ’विक्टिम्स रजिस्टर’का आइडिया कोलंबिया में विद्रोहियों को सरकार के बीच हुए ऐसे ही शांति प्रयासों से आया, इसके बाद चौधरी ने बस्तर में इस काम को आगे बढ़ाया है. विस्थापितों और पीड़ितों का डेटा एकत्र कर रहे हैं। साथ ही नए ‘न्यू पीस प्रोसेस’ के तहत पीड़ितों को फिर से कॉल किया जा रहा है, इस बार उनके दर्द की कहानियों को साझा किया जाए. यह विचार सिर्फ मानवाधिकारों के उल्लंघन का दस्तावेज नहीं है, बल्कि इसके जरिए ये भी सुनिश्चित करना है कि पीड़ितों को औपचारिक रूप से मान्यता दी जाए, बल्कि उन लोगों को सहायता प्रदान करने में सरकार भी आगे आए.शुभ्रांशु इस प्रयास में कोलंबिया और दूसरे विदेशी समूहों की मदद भी ले रहे हैं. वह कहते हैं कि हमने सरकार को लिखा है, लेकिन अभी तक उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया है. दशकभर लंबी इस हिंसात्मक लड़ाई को बंद करने के लिए जरूरी है कि इसमें सरकार भी शामिल हो. कोलम्बिया सहित कई देशों के उदाहरण हमें विश्वास दिलाते हैं कि अगर सरकार आगे बढ़े तो शांति संभव है.







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