रायपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक बच्चे की कस्टडी के मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस गौतम भादुड़ी और जस्टिस संजय एस अग्रवाल ने कड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए बच्चे की कस्टडी मां को सौंप दी. इससे पहले इस मामले में फैमिली कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपी थी. इस फैसले को महिला ने हाईकोर्ट में चेलेंज किया था. इस मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि समाज के कुछ ऐसे लोगों द्वारा, जिनकी शतुरमुर्ग जैसी सोच हो सकती है, उन्हें किसी महिला के चरित्र के बारे में फैसला लेने का अधिकार नहीं हो सकता.
अगर कोई महिला पति की सोच के मुताबिक खुद को नहीं ढालती, तो इसका मतलब ये नहीं है कि अलग होने की स्थिति में बच्चे पर पिता का अधिकार हो जाता है. इस मामले में पति की ओर से आरोप लगाया गया था कि उसकी पत्नी किसी दूसरे व्यक्ति के साथ घूमती है और उनका पहनावा भी ठीक नहीं है. जिससे लगता है कि वो अपनी शुद्धता खो चुकी है. ये भी आरोप था कि वो शराब पीती है और सिगरेट का भी सेवन करती है. अगर बच्चे को महिला की कस्टडी में दिया गया तो बच्चे पर भी बुरा असर पड़ेगा. वहीं, महिला की ओर से दलील दी गई कि वो जींस- टीशर्ट जैसे कपड़े पहनती है. 15 हजार रुपए की एक कांट्रेक्टर के यहां नौकरी करती है. काम के सिलसिले में उसे कांट्रेक्टर के साथ उनकी कार या मोटरसाइकिल पर जाना पड़ता है.
यह था मामला
दरअसल मामला छत्तीसगढ़ के महासमुंद का बताया जा रहा है. कोर्ट में मामला ले जाने वाले दंपत्ति की साल 2007 में शादी हुई थी. इसके बाद साल 2013 में दोनों के बीच आपसी सहमति से तलाक हो गया था. 2014 में रायपुर में रहने वाले बच्चे के पिता ने महासमुंद डिस्ट्रिक्ट फैमिली कोर्ट में आवेदन दायर कर बच्चे की कस्टडी की मांग की थी. इस मामले में पति ने पत्नी पर शराब पीने, अन्य पुरुषों के साथ घूमने समेत कई आरोप लगाए थे. इस मामले की सुनवाई के बाद स्थानीय फैमली कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी का अधिकार उसके पिता को दे दिया था. जिसके खिलाफ मां ने हाईकोर्ट में अपील की थी. महिला की ओर से दलील दी गई कि फैमली कोर्ट ने महज किसी तीसरे व्यक्ति के बयान के आधार पर अपना फैसला सुना दिया.
पति ने लगाए गंभीर आरोप
हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान पिता की ओर से कहा गया कि फैमली कोर्ट का फैसला पूरी तरह से मैरिट के आधार पर सुनाया गया है और इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस तरह के बयान हैं कि महिला के किसी दूसरे व्यक्ति के साथ संबंध हैं और वो शराब और दूसरे नशों की शिकार है. उन्होंने दलील दी कि बच्चे के दिमाग में मोरल और सांस्कृतिक विचार दिए जाने चाहिए. अगर उसे मां की कस्टडी में दिया गया, तो बच्चा इससे महरूम रह जाएगा.
बाहर जाने से नहीं होता चरित्र खराब
मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस गौतम भादुड़ी और जस्टिस संजय एस अग्रवाल ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कोई महिला नौकरी करती है और अपने जीवन यापन के लिए फील्ड में जाती है इससे यह साबित नहीं होता कि वह चरित्रहीन है. कोर्ट ने साफ कहा कि जब किसी महिला के चरित्र का हनन किया जाए तो ऐसे में एक लाल लकीर खींचना बेहद जरूरी है. पति के गवाहों के बयान से ये दिखाई देता है कि क्योंकि महिला जींस और टीशर्ट पहनती है, इस कारण उसके कपड़ों से भी उन्हें आपत्ति है. कोर्ट ने कहा कि उन्हें इस बात का डर है कि अगर इस तरह की गलत बातों को तवज्जों दी गई तो महिला के अधिकारों और आजादी की रक्षा करने की लड़ाई मुश्किल हो जाएगी. अगर कोई पत्नी पति के हिसाब से खुद को नहीं ढालती तो ये इस बात का निर्णायक आधार नहीं हो जाता कि उनके बच्चे की कस्टडी उसके पिता को दे दी जाए.
हाईकोर्ट ने मां को दी बच्चे की कस्टडी
मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने साफ कहा कि तमाम तथ्यों को देखते हुए उन्हें ये लगता है कि बच्चे की कस्टडी उसकी मां को ही दी जाए. हालांकि पिता को भी अपने बच्चे से मिलने और बात करने का अधाकर रहेगा. कोर्ट ने कहा कि पिता हर शनिवार और रविवार को एक घंटा और बाकि दिन पांच से दस मिनट वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बच्चे से बात कर सकेंगे. जब भी बच्चे की दो हफ्ते से ज्यादा की छुट्टी रहेगी, वो सात दिनों के लिए अपने पिता के साथ रह सकेगा. इसके लिए पिता को महिला से अनुमति लेनी होगी और अगर महिला को लगता है तो वो भी उनके साथ जा सकेंगे. साथ ही त्योहार आदि के मौके पर भी पिता बच्चे के साथ उसकी मां के घर पर समय बिता सकेंगे.
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Tags: Chhattisgarh High court, Chhattisgarh news
FIRST PUBLISHED : May 03, 2022, 19:04 IST
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