- योग से खुद को फिट रखने की कोशिश
- फिर भी मौजूदा स्थिति का भारी दबाव
हर बीतते दिन के साथ मैक्सिमम सिटी यानि मुंबई में Covid-19 केसों की गिनती नई ऊंचाई छू रही है. मुंबई में अब कुल केसों की संख्या 62,875 है. इनमें से 27,700 एक्टिव केस हैं. शहर के अस्पताल क्षमता से अधिक भरे हुए हैं. सोशल मीडिया उन रोगियों की हैरान करने वाली कहानियों से भरा है, जिन्हें अस्पताल में बेड नहीं मिले. और उनके परिवार वालों को एक से दूसरे अस्पताल भागना पड़ा. ये वो स्थिति है जिसे किसी हेल्थकेयर वर्कर ने सपने में भी नहीं देखा था.
युवा डॉक्टर्स हफ्तों से वो जिंदगी जी रहे हैं जिसके लिए उन्हें ट्रेनिंग नहीं मिली. असल में, अधिकतर डॉक्टर कहते हैं कि इसके लिए उनके पास वक्त ही नहीं था. KEM अस्पताल की एक युवा महिला डॉक्टर ने कहा, “हम अचानक एक बार में ही इस सब में धकेल दिए गए, सोचने का समय ही नहीं था. हम काम करते हुए सीख रहे हैं. ये मुश्किल वक्त है.’’
ऐसे में Covid-19 वार्डों में काम कर रहे डॉक्टरों की मनोस्थिति पर क्या असर पड़ रहा है? इसके जवाब में एक और रेजिडेंट ड़ॉक्टर ने कहा, “PPE के अंदर थका देने वाले घंटे जिसमें आप न तो ब्रेक ले सकते हैं और न ही टॉयलेट जा सकते हैं. अन्य सब बातों से हटकर सिर्फ उन रोगियों पर फोकस रखना, जिन्हें मेडिकल केयर की जरूरत है. ये ऐसा नहीं है कि आपको अपना सब कुछ देना भी समस्या को सुलझा सकता है. आप एक वायरस से लड़ने वाले फ्रंटलाइन वॉरियर हैं, जिस वायरस की प्रकृति पूरी तरह से ज्ञात नहीं है. आपको ऐसा दर्दनाक अनुभव भी सहना पड़ता है जब आपकी आंखों के सामने कोई जीवन शरीर छोड़ता है. मैंने 30 और 40 दशक के आयुवर्ग वाले युवा लोगों को अपने बेड पर अचानक मूवमेंट बंद करते देखा. और आप वहां खड़े हैं, बिना ये जाने कि क्या करना है.”
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डॉक्टर ने कहा कि यही काफी नहीं है. ये असल खतरा है कि आप वायरस का अगला लक्ष्य हो सकते हैं. इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि Covid-19 पॉजिटिव केसों की जान बचाने के लिए खुद को समर्पित करने के बाद आप सेफ जोन में हैं. आप एक वक्त में एक दिन में सर्वाइव करते हैं, फिर आपके सामने दूसरा दिन होता है. जब यही लंबे वक्त तक चलता रहता है तो इससे आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.
आजतक/इंडिया टुडे ने ऐसी तनावपूर्ण परिस्थितियों में काम करने वाले शहर के कई डॉक्टरों से बात की. डिप्रेशन (अवसाद), डर, काम की जगह पर बेचैनी और नर्वस ब्रेकडाउन इन डॉक्टरों के लिए भी कोई अनजान बात नहीं है.
KEM अस्पताल के ही एक रेजीडेंट डॉक्टर ने नाम नहीं खोलने की शर्त पर कहा, “हां, निश्चित रूप से हम हर दिन तनावपूर्ण स्थितियों में काम करते हैं. किसने सोचा होगा कि ये इतने बड़े स्तर का संकट होगा? लेकिन हमने इस ग्रेट प्रोफेशन को खुद चुना और यह हमारी जेहनी तैयारियों का भी टेस्ट है. हमें हमारे वरिष्ठ डॉक्टर्स की ओर से देखा जा रहा है. इससे बढ़िया तय करने का और क्या रास्ता हो सकता है कि कौन तमाम विषम हालात को झेल सकता है और कौन नहीं?”
लेकिन ऐसे सभी लोग नहीं हैं जो इतने मजबूत मानसिक ढांचे में हैं. इसी अस्पताल के एक और युवा रेजिडेंट डॉक्टर ने कहा, “एक डॉक्टर को शुरू से ही त्याग करना पड़ता है. मेडिकल स्कूल में दाखिले के लिए आपको बहुत सारे बलिदान करने की आवश्यकता होती है. प्रशिक्षण अवधि में, आप एक रोटेशन से दूसरे में बदलते हैं. न केवल आपको काम करना है बल्कि आपको आगे की शिक्षा के लिए भी अध्ययन करना है. इस अवधि के दौरान, आप ऐसी दबाव में होते हैं कि आप नहीं जानते कि आप क्या कर रहे हैं. खुद की देखभाल वाली गतिविधियों या परिवार के सदस्यों को देखने का मुश्किल से ही वक्त मिलता है. हममें से कुछ अपने परिवार के सदस्यों से बहुत दूर रहते हैं तो कई बार अवसाद में चले जाते हैं. और जो मौजूदा स्थिति है वो बहुत निराशाजनक है. आखिर डॉक्टर भी है तो एक इंसान ही.”
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एक और युवा डॉक्टर, जिसका टेस्ट पॉजिटिव आया और इस वक्त क्वारनटीन में है, का अवसाद और घबराहट को लेकर कहना है, “नींद की कमी जो इमरजेंसी ड्यूटी के साथ आती है और ट्रेनिंग के दौरान नाइट शिफ्ट के अपने आनंद और कष्ट हैं. लेकिन अक्सर, इस दिन तक भी, इन स्थितियों में हौसला बढ़ाने वाली बात सुनने की जगह डॉक्टरों को रोगियों के परिवार वालों से अपमान सहना पड़ता है. लेकिन हम मानसिक रूप से फिट रहने की कोशिश करते हैं. हममें से कुछ नियमित तौर पर जिम करते हैं. साथ ही प्राणायाम, योग आदि करते हैं. हममें से अधिकतर अपनी समस्याओं को दोस्तों और वरिष्ठ डॉक्टरों के साथ साझा करते हैं. लेकिन जब से महामारी का मौजूदा संकट शुरू हुआ है, हमारे पास किसी और बात के लिए वक्त नहीं है. और यही इस सब का सबसे दु:खद और गंभीर हिस्सा है.”
आजतक/इंडिया टुडे ने युवा डॉक्टरों से पूछा कि क्या ऐसी कोई व्यवस्था है, जिसमें अवसाद में चल रहे या काम के दबाव को महसूस कर रहे डॉक्टरों को गाइडेंस मिल सके? इसका जवाब ‘न’ में मिला. सायन अस्पताल के एक युवा डॉक्टर ने कहा, “हां, हम अपने गाइड, प्रोफेसर या संरक्षक से संपर्क कर सकते हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों से निपटने के लिए कोई कार्यक्रम हैं. लेकिन मेडिकल कॉलेजों में इस तरह के कार्यक्रम चलाना बेहतर रहेगा. यहां तक कि महाराष्ट्र स्तर पर कोई आधिकारिक सिस्टम नहीं है, जहां मुद्दों को हल किया जा सके.”
समय के साथ सीखते हैं सब से लड़ना
एक और डॉक्टर का कहना है, “अगर आप डिप्रेस्ड हैं तो आप अपने आप हैं. आप अवसाद के बारे में पूछते हैं? हमें बुनियादी चीजों के लिए सचमुच लड़ना होगा. ईमानदारी से कहें तो अब भी एक विरासतवादी सिस्टम काम कर रहा है. सीनियर जूनियर मुद्दे हमेशा रहते हैं. प्रोफेसरों की पक्षधरता कभी नहीं रुकती. लेकिन हम समय के साथ उस सब से लड़ना सीखते हैं. हम केवल कुछ चीजों को स्वीकार करके और अन्य से बचने की कोशिश करके मुद्दों से निपटते हैं. आप ये बातें किसी से नहीं कह सकते. डॉक्टर बनने की प्रक्रिया से गुजरने के बाद कोई भी अपना भविष्य खराब नहीं करना चाहता. इसलिए हम इसे सहन करते हैं. मौजूदा स्थिति कोई अपवाद नहीं है. इसलिए, अवसाद होना तय है.”
ज्यादा वक्त नहीं हुआ है कि डॉक्टरों ने खुले पत्र लिखे, वीडियो बनाए, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए. जिसमें उन्होंने बताया कि कैसी मुश्किल परिस्थितियों में काम करना पड़ रहा है.
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Covid-19 वार्ड में अपनी शिफ्ट खत्म करने के बाद एक रेजिडेंट डॉक्टर ने कहा, “Covid19 वार्ड में काम करने से अवसाद और चिंता होती है जो आपके स्वास्थ्य पर भारी पड़ती है. पीपीई के अंदर आप जो छह घंटे बिताते हैं, वह शायद आपके लिए अब तक के सबसे असहज घंटे होते हैं. केवल एक चीज जो आपको चलाती रहती है वह यह है कि आपके पास एक जिम्मेदारी है, और आपको एहसास है कि रोगी आप पर निर्भर है. लेकिन यह सब मानसिक और शारीरिक रूप से कीमत वसूलता है. आपकी शिफ्ट के अंतिम तीस मिनट आमतौर पर सबसे कठिन होते हैं, जिसमें आप अक्सर घड़ी को देखते हुए खुद को बताते हैं कि जल्द ही इम्तिहान खत्म हो जाएगा. आप मिनट गिनते हैं और रिलीवर का इंतजार करते हैं.”
एक महिला डॉक्टर ने हाल ही में Covid-19 से जुड़े सोशल स्टिग्मा पर पोस्ट लिखी जो वायरल हो गई. इस डॉक्टर ने बताया कि कैसे उसके लिए शादी के प्रपोजल आना बंद हो गए जब उसकी लैब टैक्नीशियन का टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद उसे क्वारनटीन में जाना पड़ा था.


