परियोजना से दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा जिले में सिंचाई की सुविधा मिलेगी.
बस्तर (Bastar) के आदिवासी नेता अरविंद नेताम (Arvind Netam) ने अपनी ही सरकार को सलाह दी है कि ये सरकार का जल्दबाजी में उठाया हुआ कदम है. सरकार को पहले जमीनी स्तर पर सर्वे कराना चाहिए. उसके बाद ही कोई निणर्य लेना चाहिए.
क्यों केंद्र ने किनारे किया फाइल
दरअसल ये विवाद उसी समय से सामने आ रहा था कि जब ये परियोजना पूरी भी जाती है तो इससे बस्तर के किसानों को कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि जो प्रारभिंक सर्वे रिपोर्ट उस समय की सरकार द्वारा दी गई थी उसमें इस परियोजना में केवल बिजली उत्पादन की बात सामने आई थी. इससे सिंचाई संसाधन उपलब्ध होंगे इस बात का जिक्र नहीं था. विरोध वहीं से शुरू हुआ कि जब किसानों को सिंचाई का कोई लाभ नहीं मिलेगा और केवल बिजली परियोजना बनाने के लिए इसे लाया जाना है उसी समय से विरोध के स्वर उठने लगे थे.
अरविंद नेताम का मानना था कि बस्तर के गांव इस परियोजना से उजड़ जाए और इससे बस्तर का भला न हो ऐसी परियोजना की जरूरत ही क्या है. वह दिन था और आज का दिन था कि तब से परियोजना की फाइल में पड़ी धूल को साफ करने की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया. आदिवासी नेता और पूर्व मंत्री अरविंद नेताम ने सरकार पर सवाल मढ़ते हुए कहा है कि 40 साल पहले कांग्रेस की ही सरकार ने इस परियोजना को मंजूरी देने से मना कर दिया था. अब कांग्रेस की ही सरकार इसे मंजूरी दे रही है. नेताम ने कहा कि ऐसा लगता है कि सरकारी जमीनी स्तर के पहलुओं से अनजान है, क्योंकि जो बस्तर पहले था आज भी उसकी भौगोलिक बनावट वैसी ही है. नेताम ने सरकार से संवाल किया है कि पहले सरकार परियोजना को मंजूर करने के पीछे के आधार को स्पष्ट करें, क्योंकि पहले तो बस्तर में कुछ ऐसे कानून नहीं थे लेकिन अब आदिवासी बाहुल्य इलाका होने के चलते तो दर्जनों कानून है.ये भी पढ़ें: हिसार: कोरोना टेस्ट रिपोर्ट लेने अब अस्पताल जाने की जरूरत नहीं, फोन पर ऐसे मिलेगा पूरा अपडेट
जमीन नहीं छोड़ सकते
आदिवासियों की पैरवी करते हुए अरविंद नेताम ने कहा कि बस्तर का आदिवासी अपनी जमीन के लिए जान दे सकता है. वह अपनी जमीन छोड़कर नहीं जा सकता है. नेताम ने कहा कि ऐसा नहीं है कि बोधघाट से पहले और भी कई परियोजना पर विचारों की फाइल चली लेकिन कुछ समय के बाद उनका कोई भी नाम भी नहीं ले सका है. ये परियोजना दंतेवाडा जिले के गीदम विकासखंडके बारसूर से लगभग आठ किलोमीटर दूर और जगदलपुर जिला मुख्यालय से लगभग 10 किमी की दूरी पर है. इसकी लागत 22 हजार 653 करोड़ के आसपास है. इसमें तीन लाख 66 हजार हेक्टेयर सिचाई और 300 सौ मेगावाट विद्युत उत्पादन किया जाना प्रस्तावित है. इस परियोजना से दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा जिले में सिंचाई की सुविधा मिलेगी.


