फर्जी जाति प्रमाण पत्र केस में पूर्व विधायक राजेंद्र सलूजा को बड़ी राहत, MP/MLA कोर्ट ने चारों आरोपियों को किया बरी।

गुना: फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में पूर्व विधायक राजेंद्र सिंह सलूजा को बड़ी राहत मिली है। ग्वालियर की MP/MLA कोर्ट ने इस मामले में राजेंद्र सिंह सलूजा समेत सभी चार आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि चुनाव लड़ने के लिए फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाया गया था या दस्तावेजों में कूटरचना की गई थी।दरअसल, यह पूरा मामला गुना विधानसभा सीट से जुड़ा है, जो अनुसूचित जाति यानी SC वर्ग के लिए आरक्षित है। साल 2008 के विधानसभा चुनाव में राजेंद्र सिंह सलूजा ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। बताया गया कि भाजपा प्रत्याशी का नामांकन खारिज होने के बाद भाजपा ने निर्दलीय प्रत्याशी जगदीश खटीक को समर्थन दिया था। ओर उन्होंने सांसी समुदाय का जाति प्रमाण पत्र लगाकर लाभ लिया और विधायक बने। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उनकी जाति को लेकर शिकायत दर्ज कराई गई थी कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि सलूजा सामान्य वर्ग से आते है ।शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सलूजा सामान्य वर्ग से आते हैं और उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए अनुसूचित जाति का फर्जी प्रमाण पत्र इस्तेमाल किया। आरोप यह भी था कि इसी प्रमाण पत्र के आधार पर उन्होंने आरक्षित सीट से चुनाव लड़ा और विधायक बने। जांच के बाद अगस्त 2011 में उनका जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया गया। इसके बाद राजेंद्र सिंह सलूजा ने हाई कोर्ट का रुख किया। हालांकि, उनकी याचिका 2012 में खारिज हो गई। इसके बाद 2013 में रिव्यू पिटीशन भी खारिज कर दी गई। उस समय तक उनका पांच साल का विधायक कार्यकाल भी पूरा हो चुका था।मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। साल 2016 में तत्कालीन पार्षद वंदना मांडे ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। याचिका में मांग की गई कि अगर सलूजा फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर विधायक बने थे, तो उन्हें पेंशन और अन्य सरकारी लाभ नहीं मिलने चाहिए।लेकिन हाई कोर्ट ने इस याचिका को जनहित याचिका मानने से इनकार कर दिया और साल 2017 में इसे खारिज कर दिया। अदालत ने वंदना मांडे पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था।इसके बाद मामले में आपराधिक कार्यवाही का रास्ता खुला। कोमल प्रसाद शाक्य ने कोर्ट में FIR दर्ज कराने के लिए प्राइवेट इस्तगासा लगाया। सुनवाई के बाद राजेंद्र सिंह सलूजा, उनके पिता अमरीक सिंह सलूजा, किरण जैन और हरवीर सिंह के खिलाफ IPC की धारा 420, 467, 468 और 120-B के तहत मामला दर्ज किया गया।इस मामले में निचली अदालत से अग्रिम जमानत भी मिल गई थी। इसके बाद कोमल प्रसाद शाक्य सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि मामले का फैसला एक वर्ष के भीतर किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ग्वालियर स्थित MP/MLA कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई।बुधवार को अदालत ने मामले में अपना फैसला सुनाया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों पर विचार किया गया, लेकिन अदालत के सामने यह पर्याप्त रूप से साबित नहीं हो पाया कि आरोपियों ने चुनाव लड़ने के उद्देश्य से फर्जी जाति प्रमाण पत्र तैयार करवाया था या कूटरचित दस्तावेजों का इस्तेमाल किया था।इसी आधार पर अदालत ने राजेंद्र सिंह सलूजा सहित चारों आरोपियों को बरी कर दिया।यह फैसला राजेंद्र सिंह सलूजा के लिए बड़ी कानूनी राहत माना जा रहा है। हालांकि, इस पूरे मामले का राजनीतिक और सामाजिक असर लंबे समय तक चर्चा में रहा है। एक तरफ आरोपों के आधार पर कई वर्षों तक कानूनी लड़ाई चली, वहीं दूसरी तरफ अब अदालत ने आपराधिक मामले में आरोप सिद्ध नहीं होने के आधार पर सभी आरोपियों को बरी कर दिया है।यानी करीब डेढ़ दशक से ज्यादा समय से चल रहे इस चर्चित मामले में फिलहाल अदालत के फैसले के साथ एक महत्वपूर्ण पड़ाव आ गया है। सबसे अहम बात यही है कि अदालत ने आरोप साबित न होने के कारण राजेंद्र सिंह सलूजा और अन्य आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है।

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