DNA ANALYSIS: China commits digital intrusion into citizens personal lives | DNA ANALYSIS: लोगों की पर्सनल लाइफ में चीन ने की ‘डिजिटल घुसपैठ’, हर कदम पर रखेगा नजर

नई दिल्ली: घुसपैठ शब्द सुनते ही लोगों का मन घबराने लगता है, क्योंकि कभी कोई दुश्मन किसी देश की सीमा में घुसपैठ कर लेता है, कभी कोई जबरदस्ती किसी के घर में घुस जाता है. कभी कोई आपके निजी जीवन में घुसपैठ करता है तो कभी रिश्तों में भी घुसपैठ हो जाती है. घुसपैठ के कई मॉडल होते हैं. लेकिन घुसपैठ कैसी भी हो ये अच्छी नहीं होती. इसलिए आज हम इसी घुसपैठ का एक जरूरी विश्लेषण करेंगे. पूरी दुनिया में घुसपैठ की सबसे ज्यादा दुकानें चीन चला रहा है, इसलिए आज हम सबसे चीन की दो प्रकार की घुसपैठ पर चर्चा करेंगे. 

एक तरफ चीन दुनिया के दूसरे देशों में घुसपैठ कर रहा है तो दूसरी तरफ उसने अपने नागरिकों के जीवन में भी घुसपैठ शुरु कर दी है. आज हम आपको बताएंगे कि चीन कैसे दुनिया से लेकर अपने नागरिकों तक को नियंत्रित करना चाहता है. और इसके लिए वो सेना से लेकर टेक्नालॉजी तक की मदद ले रहा है. 

चीन ने अपने HANGZHOU (हांगजो) शहर में नागरिकों के स्वास्थ्य पर निगरानी रखने के लिए एक प्रयोग शुरू किया है. इसके लिए कोविड-19 के संक्रमण की जानकारी देने वाले एक मोबाइल फोन एप्लीकेशन की मदद ली जा रही है. HANGZHOU में इस ऐप की मदद से शहर के एक करोड़ नागरिकों के स्वास्थ्य की जानकारी हासिल करने की योजना है. 

इस योजना के तहत सभी नागरिकों को अपने स्वास्थ्य की जानकारी इस हेल्थ ऐप पर अपलोड करने के लिए कहा जाएगा और फिर इन जानकारियों के आधार पर लोगों का हेल्थ स्कोर जारी होगा. ये स्कोर अधिकतम 100 अंकों का होगा और इसका आधार नागरिकों के अब तक के सभी मेडिकल रिकॉर्ड्स को बनाया जाएगा. 

इस ऐप में नागरिकों को सिर्फ कोविड-19  के संक्रमण की ही नहीं बल्कि अपने जीवन जीने की आदतों की जानकारी भी अपलोड करनी होगी. उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति शराब या सिगरेट पीता है तो उसे इसकी जानकारी भी देनी होगी. इतना ही नहीं आप दिन में कितने कदम चलते हैं ये भी आपको सरकार को बताना होगा. 

इन जानकारियों के आधार पर नागरिकों को एक QR कोड जारी होगा. जरूरी सेवाओं का इस्तेमाल करने के लिए, दफ्तर जाने के लिए और यात्राएं करने के लिए ये QR कोड स्कैन करना होगा. QR कोड स्कैन होते ही नागरिकों के स्वास्थ्य से संबंधित सभी जानकारियां उपलब्ध हो जाएंगी और फिर हेल्थ स्कोर के आधार पर ही ये तय होगा कि कोई व्यक्ति इन सेवाओं का इस्तेमाल कर सकता है या नहीं. 

चीन के सभी प्रांतों में इस समय ऐसी ही कुछ ऐप का इस्तेमाल हो रहा है. जिसके तहत लोगों को हरे, लाल या पीले रंग के कोड दिए जाते हैं. जिनके ऐप पर हरे रंग का कोड होता है वो कहीं भी आ और जा सकते हैं, जबकि पीले और लाल रंग के कोड वाले लोगों पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी जाती हैं. ऐसे लोगों को घर पर ही क्वारंटाइन में रहने के लिए कहा जाता है. 

भारत में आरोग्य सेतु ऐप का इस्तेमाल भी इसी तरीके से होता है. लेकिन फर्क ये है कि चीन अपने हेल्थ ऐप के जरिए अपने नागरिकों पर हर समय नजर रखना चाहता है. 

हालांकि हागजो के लोगों के लिए जो हेल्थ ऐप बनाया जा रहा है वो लोगों से तमाम तरह के निजी डाटा हासिल करेगा, और इस ऐप को इंस्टॉल करने वाले हर व्यक्ति पर हर समय नजर रखी जा सकेगी. 

चीन की मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट्स के मुताबिक वहां की सरकार कोविड-19 के संक्रमण को रोकने के लिए बनाए गए मोबाइल फोन ऐप की मदद से नागरिकों के बैंक अकाउंट की जानकारी भी हासिल कर सकती है और ये भी पता लगा सकती है कि किसी व्यक्ति ने कब और कहां यात्रा की है. 

चीन में करीब 100 करोड़ लोग इन QR कोड्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और फरवरी से लेकर अब तक इन QR कोड्स का इस्तेमाल करीब 900 करोड़ बार किया जा चुका है. 

मोबाइल फोन ऐप, QR कोड्स और हेल्थ ऐप के जरिए चीन अपने देश के नागरिकों को दो वर्गों में बांटना चाहता है. पहले वर्ग में वो लोग होंगे जिनके स्वास्थ्य पर कोई खतरा नहीं है और ऐसे लोगों को काम पर जाने, घूमने फिरने और सेवाओं का इस्तेमाल करने की इजाजत होगी. 

जबकि दूसरे वर्ग में ऐसे लोग शामिल होंगे जिनका हेल्थ स्कोर कम है और जिन पर संक्रमण का खतरा है. ऐसे लोग या तो घरों से बाहर निकल ही नहीं पाएंगे या फिर उन्हें बहुत सारी पाबंदियों के साथ घर से बाहर निकलने की इजाजत मिलेगी. 

लेकिन स्वास्थ्य के आधार पर लोगों को वर्गों में बांटने का प्रयोग आज ही नहीं हो रहा. बल्कि इसकी शुरुआत वर्षों पहले हो गई थी. आज से करीब 227 वर्ष पहले अमेरिका के कई राज्यों में Yelow Fever नाम का एक वायरस फैला था. ये वायरस मच्छरों के काटने से फैलता है. इस बीमारी की वजह से अमेरिका में हजारों लोग मारे गए थे. तब भी अमेरिका के कई राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं बर्बाद होने लगीं थी. इससे बचने के लिए अमेरिका के louisiana राज्य में एक नई व्यवस्था लागू की गई. 1853 में louisiana में लोगों को दो वर्गों में बांट दिया गया. एक वर्ग में वो लोग शामिल थे, जिन्हें ये बीमारी हो चुकी थी और जो इससे स्वस्थ हो चुके थे. जबकि दूसरे वर्ग में वो लोग थे जिन्हें इसका संक्रमण होने का खतरा था. 

जो लोग स्वस्थ हो चुके थे और जिनके पास इस वायरस के खिलाफ एक प्रकार की Immunity थी उन्हीं लोगों को कामकाज की इजाजत मिलती थी और विवाह भी इसी आधार पर तय होते थे. 

चीन में भी ठीक ऐसा ही हो रहा है. चीन में कम्यूनिस्ट पार्टी की वार्षिक बैठक में भी इस पर चर्चा हुई और सलाह दी गई कि उन्ही लोगों को बच्चा पैदा करने की इजाजत दी जाए जिनके पास हेल्थ सर्टिफिकेट है ताकि कोई बीमारी माता-पिता से बच्चों में ना फैले. 

चीन में कैसे स्वास्थ्य को ही पासपोर्ट बना दिया गया है, ये समझाने के लिए हमने एक छोटा सा विश्लेषण तैयार किया है. इसके बाद जानेंगे कि क्या आने वाले समय में भारत में भी नौकरी और विवाह का आधार Immunity Certificate ही होगा?

चीन में मोबाइल ऐप की मदद से कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने की कोशिश एक कदम आगे बढ़ गई है. और अब ऐसी ही ऐप के जरिए लोगों का हेल्थ स्कोर जारी करने की योजना बनाई जा रही है. 

आम आदमी को समझ ना आने वाले इन QR कोड्स में चीन के नागरिकों की तमाम जानकारियां छिपी हैं और चीन के HANGZHOU में शहर में तो इस हेल्थ स्कोर का इस्तेमाल हमेशा के लिए करने की योजना बना ली गई है. 

यानी HANGZHOU का प्रशासन अपने नागरिकों की निगरानी हमेशा के लिए करना चाहता है. कोविड-19 की रोकथाम के लिए इस तरह के मोबाइल फोन एप्लिकेशन्स के कई वर्जन पूरे चीन में इस्तेमाल किए जा रहे हैं. लेकिन HANGZHOU में चीन की बड़ी टेक कंपनी अली बाबा के साथ मिलकर इसे अनिवार्य बनाने की योजना है.

चीन मोबाइल फोन ऐप के जरिए कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग करने वाला पहला देश है, लेकिन अब वहां की सरकार इसे अपने हाथ में लेकर इसे नागरिकों की निगरानी का जरिया बना रही है.

अगर आप चीन में हैं तो यही QR कोड आपका सबसे बड़ा टिकट है. जिसके सहारे आप कहीं भी घूम फिर सकते हैं. HANGZHOU प्रशासन का कहना है कि ये हेल्थ ऐप शहर के लोगों के लिए एक फाइरवॉल की तरह काम करेगा और इसके जरिए लोगों के स्वास्थ्य और इम्यूनिटी को बेहतर बनाया जाएगा. 

इस ऐप को चीन की अली बाबा और टेन्सेंट जैसी बड़ी कंपनियों ने तैयार किया है और HANGZHOU प्रशासन ने इसे हाथों हाथ लिया है. 

इस App की मदद से किसी व्यक्ति का पूरा लेखा जोखा तैयार किया जा सकता है. जिसमें उसके स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारियों के अलावा उसकी वित्तिय स्थिति और यात्राओं का रिकॉर्ड भी होगा. रियल टाइम में रियल डाटा हासिल करना ही चीन की सरकार के डिजिटल सर्विलांस का ध्येय वाक्य बन गया है. 

इस मोबाइल फोन ऐप के जरिए शहर के लोगों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड को एक जगह अपलोड किया जाएगा, इसमें बीमारियों की जानकारी, हेल्थ चेक अप का रिकॉर्ड, खाने पीने की आदतें , शराब सिगरेट का सेवन और यहां तक कि व्यायाम करने से जुड़ी जानकारियां भी प्रशासन को मुहैया करानी होगी. इसी डाटा के आधार पर आपको एक हेल्थ स्कोर जारी किया जाएगा और ये हेल्थ स्कोर ही ये तय करेगा कि आप किस सेवा का लाभ उठा पाएंगे और किसका नहीं. 

यानी किसी रेस्टोरेंट, सिनेमा हॉल या शॉपिंग मॉल में आपकी एंट्री आपकी जेब में रखे पैसों के दम पर नहीं बल्कि आपके हेल्थ स्कोर के आधार पर होगी. 

चीन ने इस महामारी का इस्तेमाल दुनिया के सबसे बड़े सर्विलांस तंत्र को विकसित करने के बहाने के तौर पर किया है. 

चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी वार्षिक बैठक में राजनीतिक सलाहकार ज़ू होंगलिंग ने तो ये प्रस्ताव भी दिया है कि किसी कपल को तभी माता पिता बनने की इजाजत दी जाए जब उसके पास हेल्थ सर्टिफिकेट हो. 

यानी चीन ने अब लोगों के जन्म से मृत्यु तक होने वाली सारी घटनाएं इसी हेल्थ स्कोर के आधार पर तय होगी और दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश चीन दो वर्गों में बंट जाएगा और इन्हीं वर्गों के आधार पर चीन भविष्य की दशा और दिशा तय करेगा.

चीन अपने नागरिकों के लिए जो हेल्थ स्कोर जारी करेगा वो ठीक वैसे ही काम करेगा जैसे भारत में CIBIL स्कोर काम करता है. CIBIL स्कोर नागरिकों की फाइनेंशियल ट्राजेक्शन के आधार पर तय होता है. आप अगर कोई EMI नहीं भर पाते, लोन समय पर नहीं चुका पाते या फिर डिफॉल्ट कर जाते हैं तो ये सारी जानकारियां क्रेडिट इनफॉरमेशन ब्यूरो इंडिया लिमिटेड के पास पहुंच जाती है. आपके वित्तीय लेन देन की आदतों के आधार पर आपको एक स्कोर जारी किया जाता है और आपका ये स्कोर देखकर ही बैंक ये तय करते हैं कि आपको कोई क्रेडिट कार्ड या लोन दिया जाए या नहीं. 

इसी तरह चीन में भी हेल्थ स्कोर कुछ महत्वपूर्ण बातों के आधार पर तय होगा. उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति हर रोज एक गिलास व्हाइट वाइन भी पीता है तो उसके 1.5 प्वाइंट्स काट लिए जाएंगे. अगर कोई सिर्फ 7 घंटे या उससे कम सोता है तो उसके हेल्थ स्कोर से एक प्वाइंट और कम हो जाएगा. 

जबकि व्यायाम करने पर और समय पर स्वास्थ्य की जांच कराने से स्कोर बेहतर होता रहेगा. चीन इस हेल्थ स्कोर को ही नागरिकों का पासपोर्ट बनाने में लगा है. लेकिन सिर्फ चीन ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देश भी इसी दिशा में काम कर रहे हैं.  इनमें ब्रिटेन, अमेरिका, चिली, इटली और जर्मनी जैसे देश शामिल हैं. 

लेकिन अब आप ये जान लीजिए कि भविष्य में जारी होने वाले ये हेल्थ पासपोर्ट या हेल्थ सर्टिफिकेट आखिर काम कैसे करेंगे ? फिलहाल इसकी कोई मानक प्रक्रिया तय नहीं है. लेकिन जो हो सकता है वो हम आपको बताना चाहते हैं. 

सबसे पहले आपकी सरकार आपसे कह सकती है कि आप एक विशेष मोबाइल फोन App पर अपना पहचान पत्र अपलोड करें और फिर अपनी सेल्फी उस पर अपलोड करें. आपके पहचान पत्र से आपके चेहरे का मिलान होने के बाद आपको एंटी बॉडी टेस्ट कराने के लिए कहा जा सकता है. 

अगर टेस्ट में ये पता चल गया कि आपको कोरोना वायरस हो चुका है और आप इससे इम्यून हो चुके हैं तो आपको एक विशेष QR कोड जारी कर दिया जाएगा. इसके बाद जब आप अपने दफ्तर जाएंगे तो गेट पर आपका ये QR कोड स्कैन किया जाएगा. ये QR कोड स्कैन करने से ये पता चल जाएगा कि आप कोरोना वायरस से इम्यून हैं. इसी प्रक्रिया का पालन आपको बस , ट्रेन और मेट्रो में सफर करते हुए भी करना पड़ सकता है. शॉपिंग मॉल्स और रेस्टोरेंट में भी आपका इम्यूनिटी  सर्टिफिकेट देखकर ही आपको प्रवेश दिया जाएगा. 

लेकिन इससे आशंका ये पैदा होती है कि आने वाले समय में पूरी दुनिया दो वर्गों में बंट जाएगी? एक वर्ग में वो लोग होंगे जिनके पास अलग-अलग वायरस से लड़ने के लिए इम्यूनिटी है और दूसरे वर्ग में वो लोग होंगे जिनके पास ऐसी कोई इम्यूनिटी नहीं है?

यही दो वर्ग आने वाले समय में किसी देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा तय करेंगे. जिनके पास इम्यूनिटी सर्टिफिकेट नहीं होगा वो अपने शरीर का ध्यान रखने लगेंगे और अपनी इम्यूनिटी को मजबूत बनाएंगे ताकि वो भी रिस्क फ्री सर्टिफिकेट हासिल कर पाएं. राजनैतिक पार्टियों को अपने घोषणा पत्र में भी जाति, धर्म और आरक्षण जैसी बातों की जगह स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी. और समाज के ये दो वर्ग ही चुनाव में ये तय करेंगे कि किस पार्टी की सरकार आएगी और किसकी जाएगी? 

कहते हैं कि जान है तो जहान है. ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि जान से कीमती कुछ नहीं होता. अब आप सोचिए कि अगर भविष्य में आपके पास अपनी जान बचाने का या अपना निजी डाटा बचाने का विकल्प हो तो आप क्या करेंगे? क्या प्राइवेसी प्राणों से ज्यादा जरूरी साबित होगी? या फिर अपनी निजता की कुर्बानी देकर आप अपनी जान बचा लेंगे?

ज्यादातर मौकों पर लोग अपनी जान की परवाह करेंगे. इसलिए आने वाले समय में आपका निजी डाटा ही आपके स्वास्थ्य की गारंटी बन जाएगा. इसलिए अब आपको ये जानना चाहिए कि इस महामारी के बाद आपका भविष्य कैसा हो सकता है? इस संदर्भ में मशहूर लेखक Yuval Noah Harari ने कुछ अहम बाते कहीं हैं . Yuval Noah Harari के मुताबिक इस महामारी के बाद आने वाला भविष्य कैसा होगा ये आपको समझना चाहिए. 

सबसे पहली बात ये कि आपका स्वास्थ्य और सर्विलांस एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाएंगे. सरकारें आपके स्वास्थ्य का ध्यान रखने का दावा तो जरूर करेंगी, लेकिन इसके बदले में आपको अपनी सारी जानकारियां सरकारों तक पहुंचानी होंगी. 

दूसरी बात ये है कि आपके शरीर के दम पर ही आपका वैचारिक रिपोर्ट कार्ड भी तैयार कर लिया जाएगा. उदाहरण के लिए अगर सरकार आपको ये कह दे कि आपको बीमारियों की निगरानी के लिए हाथ में एक ब्रेसलेट पहनना है, जो आपके शरीर में आ रहे बदलावों की सूचना स्वास्थ्य विभाग को दे देगा तो आप शायद खुशी खुशी इसे स्वीकार कर लेंगे. लेकिन जब आप किसी एक राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित आर्टिकल पढ़ेगें या कोई वीडियो देखेंगे तो उस समय आपके दिल की धड़कन में आने वाले बदलाव, ब्लड प्रेशर और शरीर का तापमान ये बताने में सक्षम होगा कि किस विचारधारा से आप उत्तेजित हो जाते हैं और कौन सी विचारधारा आपको पसंद आती है. 

इसे एक और उदाहरण से समझिए, अगर आपके शरीर में कोई चिप है या आपने कोई ब्रेसलेट पहना है और आप किसी नेता का भाषण सुनते हैं तो आप इससे सुनते हुए क्रोधित महसूस कर रहे हैं, या खुशी महसूस कर रहे हैं ये बात भी सरकारों को पता लग सकती है. 

और तीसरी बात ये है कि भविष्य में सरकारों को जनता के बीच भरोसा जगाना होगा. क्योंकि जब कुछ नियम आपकी सुरक्षा के लिए बनाए जाते हैं तो आप उन्हें खुशी खुशी स्वीकार कर लेते हैं. लेकिन जब टेक्नालॉजी की मदद से इन्हें आप पर थोपा जाएगा तो शायद आपको अच्छा महसूस नहीं होगा और तब विरोध की स्थिति पैदा होगी. 

और चौथी बात ये है कि डाटा ही नया धर्म बनने जा रहा है. डाटा आपके प्राण बचा भी सकता है और आपके जीवन को तबाह भी कर सकता है. 

सरकारें भले ही धर्म निरपेक्ष होने का दावा करें लेकिन डाटा उनके लिए भी सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ी पूंजी बन जाएगा, और सारा संघर्ष सारी लड़ाई इसी डाटा को हासिल करने की होगी. 

यानी आने वाले समय में आपको प्राइवेसी और प्राणों में किसी एक को चुनना ही होगा और ये पैसला इतना आसान नहीं होगा. 

अंग्रेजी में दो मशहूर कहावतें हैं. पहली है Health Is Wealth और दूसरी है Survival Of the fittest. यानी स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी पूंजी है और जो फिट है वही जीवन में आगे बढ़ सकता है. 

हिंदू शास्त्रों में भी लिखा है कि अगर किसी को निरोगी जीवन मिलता है तो ये उस व्यक्ति का परम भाग्य होता है. लेकिन आज के दौर में शरीर में बीमारियों की घुसपैठ ने इस भाग्य को छीन लिया है. कोरोना जैसे वायरस शरीर में घुसपैठ करते हैं तो गलत विचार मन में घुसपैठ करके आपके पूरे व्यक्तित्व को दूषित कर देते हैं. आपका स्वस्थ शरीर आपके शरीर में बीमारियों की घुसपैठ को रोक सकता है तो आपका संयमित मन दूषित विचारों की घुसपैठ को रोक सकता है. कहते हैं स्वस्थ शरीर में भी स्वस्थ मन का वास होता है इसलिए आपको आज से ही इन दोनों दिशाओं में काम शुरू कर देना चाहिए. 

शारीरिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक आधार पर लोगों के बीच असमानता सदियों से चलती आ रही है. आप अपनी क्षमताओं को बढ़ाकर इस असमानता को समाप्त कर सकते हैं. लेकिन स्वास्थ्य सबको समानता के अवसर नहीं देता. 

प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था के तहत लोगों को अलग अलग काम सौंपे गए थे. इसी वर्ण व्यवस्था को बाद में जाति व्यवस्था का रूप दे दिया गया. ये व्यवस्था आज की तारीख में सिर्फ राजनीति का आधार है. लेकिन जैविक आधार पर लोगों का वर्गीकरण भविष्य की बुनियाद तय करेगा. 

मशहूर लेखक Yuval Noah Harari अपनी किताब 21 Lessons For The 21st Century में लिखते हैं कि आने वाले वर्षों में लोगों के बीच ये बायोलॉजिकल खाई और बड़ी हो जाएगी. 

एक खाई पैदा होगी कम्प्यूटर्स और इंसानों के बीच में. क्योंकि मोटे तौर पर इंसानों के पास सिर्फ बौद्धिक और शारीरिक क्षमता होती है, लेकिन कंप्यूटर और आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस मिलकर इस मामले में इंसानों को पीछे छोड़ देंगे. 

मशीनें पहले ही इंसानों की तुलना में ज्यादा काम कर रही हैं, और आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस मानसिक श्रम करने वाले इंसानों को भी बेरोजगार कर सकती है. 

इसके बाद एक खाई दो और तरह के लोगों के बीच तैयार होगी. पहले वो लोग, जिनके शरीर में मशीनों और कम्प्यूटर्स के पुर्जे होंगे और दूसरे वो जिनके पास ऐसा कुछ नहीं होगा. यानी एक वर्ग सुपर ह्यूमन्स का हो जाएगा और एक वर्ग उन लोगों का होगा, जो किसी काम के नहीं रह जाएंगे. 

ये बातें आपको सुनने में किसी साइंस फिक्शन फिल्म का हिस्सा लग रही होंगी. लेकिन सच ये है कि बायोटेक्नालॉजी और बायोइंजीनियरिंग ने इसे संभव बना दिया है. 

चीन के वायरस ने दुनिया के करोड़ों लोगों के शरीर में घुसपैठ की है तो चीन की कंपनियों द्वारा बनाए गए मोबाइल फोन App ने करोड़ों लोगों के जीवन में घुसपैठ कर ली है और ये App लोगों का निजी डाटा और हर गोपनीय जानकारी चुरा रहे हैं. 

वर्ष 2017 में गृहमंत्रालय ने चीन में बने कुछ ऐसे Apps की सूची जारी की थी, जिनका इस्तेमाल करना निजी डाटा के लिहाज से खतरनाक माना गया था. इनमें Webo, Wechat, Share It, Uc News और Uc Browser जैसे Apps शामिल हैं. 




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