कोनो ला पूछबे का करत हस तब फट ले कहिथे-काला बताबे गा, ये दे खेत ले आवत हौं, इसकूल जाहूं,पढ़ाय बर, तब कोनो बताथे- कारखाना जाहौं. पांच कोस मं शहर तीर मं कारखाना हे फेर आज सब झन करा मोटर सायकल होगे गे तब दुरिहा हा दुरिहा असन नइ लागय. ओ समे तो आय कांही साधन नइ रिहिसे अउ न सुविधा.
जमाना कतेक बदलगे, कोनो अइसन सोचे नइ रिहिन हे के कभू अइसने दिन आ जही. गांव-गांव सड़क, इसकूल, असपताल, पंचायत भवन, आंगनबाड़ी का-का नइ खुलगे. पहिले काम खोजे ले परय, मालिक-ठाकुर इहां काम-बुता मांगय, कांहय- कुछु काम होतिस तब बताते ठाकुर. ओ समे ठाकुर मन इतरावय, कांहय- तोला का काम बतावौं रे- जा पसराही मेर दू ठन खेत हे, जतका खनती कर सकत हस, तब कर लेबे, दू-चार झन अउ संग धर लेबे. लम्बा खेती हे, तोर एके झन के दरी सिध नइ परही.
काठा रोजी मं कइसनो करके काम मिल जाय. मेहनत के काम हे, भरे गरमी के दिन, पछीना तर-तर ओगरत राहय, तन-बदन मं तब कहूं काम सिध परय, बनी (मजदूरी) मिलय. आज अइसन काम कोनो करे बर राजी नइ होवय. अलाल अउ गत उतार होगे हे. सोझ-सोझ काम देखथें जेमा मेहनत कम अउ पगार (रोजी) जादा मिलय. काम आज अतेक खपलागे हे, तरह-तरह के काम, ते खोजे ले गांव मं बनिहार-मजदूर नइ मिलय. जउन कभू मालिक के दुआरी-दुआरी काम पूछे ल, मांगे ल जांय, आज दिन उलटागे हे. गंगा उल्टा बहे ले धर ले हे. मालिक मन मजदूर खोजे बर ओकर मन के घर-घर जावत हे. पूछथे, हुदकराथे दुआरी ले- अरे फलाना, धनवा, फकीर, बिसालिक घर मं हावस का रे?
मालिक के आवाज ले सुनथे तहां ले धनवा अपना गोसइन ला कहिथे- अरे फलानी, ओ डोकरा सारे आये हे, जा टरका दे नइ हे, गांव गे हे कहि दे. जइसे गोसइयां कहिस तइसने ओहर दुआरी तीर आके कहिथे- नइहे बबा ओहर गांव गे हे. अब ओ मालिक दूसर मजदूर के घर कोती जाथे अउ उहों वइसने टरकाय कस बात सुनथे तब ओहर बड़बड़ावत कहिथे- ये सारे बनिहार, मजदूर मन ला देखत हस, कतेक भाव बढग़े हे, एकर मन के. सरकारी काम का खुलगे हे, बड़े-बड़े फारम (कृषि केन्द्र) अउ कारखाना का खुलगे हे, गांव मन मं मजदूर मन के टोटा पर गे. कोनो गांव के खेती-किसानी के काम करबे नइ करन कहिथे. सब फारम कोती नइते कारखाना कोती भाग जथे. अब का होही खेती-किसानी के. दस, बीस, पचास अक्कड़ जमीन धरे बइठे हें किसान, सब मूड़ धरके रोवत हे. कोनो अधिया में देवत हें तब कोनो रेगहा, उहू हा अरज-गरज मं. कबाड़ होवत हे खेती-किसानी के काम. अउ किसान के बेटा जउन मं खेती-किसानी करतिन तउन मन सब शहर धर लिन, पढ़त-लिखत हे, तहां ले नौकरी धर लेथे. यहां अइसन तो जमाना आगे हे.
कोनो सोचे नइ रिहिन हे के अइसनो दिन देखे ले परही, फेर ओ दिन तो आगे हे. जउन चरितर नइ होवत रिहिस हे तउन ओ सब होवत हे, देखे ले परत हे. पंचयती राज चलत हे. गांव मं काम कम, राजनीति जादा चले ले धर ले हे. धांधली अउ भ्रष्टाचार के जमाना हे. कोनो काम बिना घूस देय नइ होवत हे. सब एक-दूसर ला गच्चा देबर तइयार बइठे हे. विश्वास मरगे हे, परेम, सद्भाव जउन गांव के पूंजी राहय, दाई-बहिनी, ददा, कका कहिथे तउन बात होवय ओ सब ऊपरछावा होगे हे, दोगला होगे हे. गांव के असली चीज तो उड़ागे पंछी बरोबर. अब ओ देखे ले नइ मिलय. आघू चल के अउ का होही तेला भगवाने जानही?
बात शुरू होय रिहिसे खटिया गांथे मेर ले फेर कती के बात, लमियावत-लमियावत कहां गिंजर के कोन मेर आगे. मति जब छरियाथे न तब अइसने होथे. चेत-बिचेत हो जथे मन हा, काला का कहिबे. समे साथ नइ देवय ना, तब इही हाल होथे. बबा हा खटिया गांथत रिहिसे, तब ओकर तीर जाकर टिमारी मारत कहिथौं- का बबा, काकर बर खटिया गांथस हस जी, कोनो नवा सगा अवइया हे का?
अरे नहीं बुजा, कोनो नवा सगा अवइया नइहे, ये खटिया खाली परे रिहिसे, तब सोचेंव, जइसने बिना कोरे-गांथे बेटी-दाई बहिनी मन बने नइ दीखय, पाटी पर जथे, मांग भर सिंदूर भर जथे तहां ले उही मन कतेक सुग्घर दीखथे पुतरी मन बरोबर, बने चक-चक ले दीखथे. वइसने कस खटिया ला गांथ दुहूं तब उहू हा बने दीखही. बइठे-उठे अउ बेरा-बखत मं सुते के काम घला नइ आही संगवारी.
बने काहत हस बबा, फेर अइसने काबर नइ काहत हस, कमइया जीव हौं, ठेलहा बइठे नइ संकव. ठेलहा रेहेंव तब सोचेंव चल समे के कुछु फायदा निकालथौं, सोच के खटिया गांथ लौं कहिके. बबा कहिथे, अब तैं कांही सोच ले भई, फेर गांथत तो हौं खटिया. मैं सोचत रेहेंव बबा, अइसे तो नहीं के एसो मंगलू भइया के बिहाव करबे तेकर जोखा पहिली करत होही कइके.
वाह रे चटरहा, बात ला कोन डाहर किंजार के कोन कोती लान देस. अरे मंगलू के बिहाव होही, तब खटिया हम काबर बनाबो जी, आजकल तो दहेज के चलन बाढ़ गे हे. पलंग, सुपेती, पंखा, फ्रिज, कूलर अउ सोफा सेट, फटफटी अउ कार तो घला लइका कहूं पढ़े-लिखे हे, नौकरी-चाकरी वाले हे तौंन ला सबो कुछ मिलथे. हमर जमाना मं तो सुक्खा सकरावत राहय. थोर-बहुत जोरन देके बेटी ला भेज दैं ठक-ठक ले.
समे बदलगे हे बबा, नवा जुग आगे हे. तब नवा जुग के नवा चलन ला देख, कइसन सुग्घर हे ना? बबा कहिथे- देखत हौं बेटा, तुंहर नवा जुग के नवा तमाशा ला. बहू घर मं पांव धरिस नहीं के एक-दू महीना मं ओकर खेल शुरू हो जथे. गोसइंया ला के हे ले धर लेथे- तोर दाई-ददा संग मोर निबाह नइ हो सकय? चल अलग रहिबो, खाबो, कमाबो. कहूं बाहिर जाके नौकरी-चाकरी करबौ.
घर में किटिर-काटर सुरू हो जथे. दाई-ददा समझ जथे- बीरबल कस खिचड़ी घर मं बने बर शुरू होगे हे. दाई धरर-धरर होथे, ददा दूसर कुरिया कलेचुप रोवत रहिथे. बेटा आथे, देखथे ओमन ला रोवत फेर बोले कुछु नइ सकय. महतारी छाती मं पथरा रखके बेटा ला कहिथे- तुमन सदा सुखी राहौ बेटा, दुधे खाव, दुधे पीओ अउ दुधे अचोवौ. दाई-ददा मन तोर बर गरु होगेन, तब जाव अतेक बड़े दुनिया हे, कहूं न कहूं काम मिल जाही. पांव हे तब पनही के का दुकाल, काम मिल जाबे करही.
ददा देखत हे, आंसूर तरर-तरर झरना कस झरत हे. बेटा ला महतारी समझावत हे, फेर एक भाखा ओहर बोल नइ सकत हे. बगल मं बहूं खड़े तमाशा देखत हे. ओहर काहत हे- बने तो काहत हे तोर दाई हा. काबर बोझा बनिन ओकर मन बर. नइ रहिबो तब युहू मन बने हरहिन्छा रइहीं, कोनो दुख नइ होही.
दाई के बोली ला सुनके मंगलू के आंसू ढरगे. एक मन होथे- ये गोसइन के आय ले घर के आज दू फाड़ होये ले जात हे. कभू सोचेंव नइ रेहेंव अइसनो दिन देखे ले मिलही. का सोचबे अउ का हो जथे. ओकर छाती फटे जात हे अउ गुस्सा अइसे लाल गरम तवा असन होवत जात हे, मन करथे, एक गक्का गोसइन ला दे दौं का, घर ले एला निकाल दौं का. फेर नवा-नवा मयारू गोसइन हे, कंचन काया हे. गुलाब फूल कस लाल-लाल होंठ हे, हिरनी कस आंखी हे, सेवफल कस सुंदर गाल हे. काया के माया मं फंसगे मंगलू. एकर आगू मं दाई-ददा के मया पांव तरी रमजा गे.
गांथत रिहिसे बबा हा खटिया, फेर शुरू होगे रामकथा. ये तो सब घर, गांव, परिवार, समाज अउ देश के कथा होगे हे बबा. ए सब नियम, परिवार, समाज टूटत जात हे. छोटे-बड़े सबके घर के इही हाल हे, तमाशा हे. काला कहिबे. जउन बेटा ला पाल-पोस के बड़े करबे, ओकर पांव मं खड़ा करबे, बर-बिहाव कर देस तहां ले महाभारत शुरू हो जथे. दाई-ददा ला ”गेट आउटÓÓ कर देथे अउ बेटा बहू गुलछर्रा उड़ावत हे. इही आज के नवा जुग के, नवा चलन हे संगवारी. मोर खटिया तोर कथा के नांव मं धपोर दीस.
(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)
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