Chaitra Navratri 2022: छत्तीसगढ़ में नवरात्रि में जसगीत का महत्व

चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिवस से हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष का प्रारंभ माना जाता है’ चैत्र मास अत्यंत ही पवित्र माना जाता है’ विक्रम संवत् चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा से नौ दिन नवरात्रि में देवी दुर्गा और उनकी शक्तियों की पूजा आराधना की जाती है और नौ दिन अखंड दीप प्रज्वलित की जाती है’ सतयुग का आरंभ इसी चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से माना जाता है’.

चैत्र नवरात्रि के इस मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नौ दिन नवरात्रि देवी शक्ति दुर्गा और उनकी शक्तियों की पूजा आराधना की जाती है और नौ दिन अखंड दीप प्रज्वलित की जाती है’ चैत्र नवरात्रि के नवमी के दिन भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है’ देवी की आराधना और श्रीराम का जन्मोत्सव से जन-मन के ह्रदय में नई ऊर्जा का संचार होता है’ यह वासंतीय नवरात्रि बसंत ऋतु का समापन और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का उत्साह है जो प्रकृति परिवर्तन के साथ ही जन-मन को आनंदित कर देता है’.

क्वांर नवरात्रि जिसे शारदीय नवरात्रि कहा जाता है’इस मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नौ दिन नवरात्रि देवी की आराधना देवी दुर्गा की मूर्ति प्रतिष्ठापना कर की जाती है’ मिट्टी की देवी की प्रतिमा बनाकर पंडालों में स्थापित की जाती है’ नौ दिन अखंड दीप प्रज्वलित की जाती है’.

शक्ति की पूजा हिंदू धर्म की परंपरा रही है जो आज भी आस्था और विश्वास के साथ इन नवरात्रि में शक्ति की पूजा कर देवी माता से शक्ति प्राप्त की जाती है’ नवरात्रों में तीन देवियों धन की देवी लक्ष्मी, बुद्धि के देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा के नौ रूपों का नौ दिन, नौ शक्तियों की पूजा अर्चना की जाती हैं’.

यह शारदीय और वासंतीय नवरात्रियों को छत्तीसगढ़ के संदर्भ में जोड़कर देखें, तो यहां वासंतीय और शारदीय ( चैत्र और क्वांर) दोनों नवरात्रों में देवी माता की पूजा-अर्चना और सेवा सत्कार की जाती है और विशेष रूप से जसगीतों के माध्यम से नौ दिन  माता की सेवा आराधना मंदिरों तथा घरों में की जाती है’ अखंड ज्योति जलाने के साथ ही मंदिरों, पंडालों और घरों में जवांरा बोया जाता है’ यह जवांरा गेहूं और जौ से बोया जाता है साथ ही कलश स्थापना की जाती है’ नवरात्रि के प्रथम दिवस से ही जवांरा बोया जाता है और नवमी को उसको विसर्जित बड़े उत्साह और आनंद से जसगीत, सेवागीत गाकर तथा ताना-बाना लिए ढोल- नगाड़ा बजाकर किया जाता है’ यहां नवरात्रि में हर दिन जसगीत गायी जाती है और देवी के सभी रूपों की आराधना की जाती है’.

जवांरा के जस गीत में देवी धनैया और देवी कोदैया की आराधना की जाती है; देवी धनैया और देवी कोदैया क्षेत्रीय स्तर की लोक माताएं है’ इन देवियों को  को फसलों की देवी भी कहा जाता है क्योंकि छत्तीसगढ़ धान और कोदो फसल के लिए प्रसिद्ध है’ यहां जन-मानस इन फसलों को देवी का स्वरूप मानते हैं’ दोनों देवियां अमूर्त है, जिसे जसगीतों के माध्यम से उजागर किया गया है’जसगीत में ये दोनों माताएं ,दुर्गा माता की गणिकाएं तथा सेविकाए रूप में पूजी जाती है’ लोकगीतों में देवी दुर्गा मूल मातृका के रूप में और बूढ़ी माता या बूढ़ी दाई के रूप में पूजी जाती है’
जवांरा के समय विशेष रूप से इस जसगीत को गायी जाती है-
लिमवा के डारा म गड़ेला हिंड़ोलवा…..
कवन ह झूले कवन ह झूलाये,
कवन ह देखत आय’
बूढ़ी माई झूले, कोदैया माय झुलावे, धनैया माय देखत आय…’
नवरात्रि के प्रथम दिवस कलश स्थापना के समय इस जसगीत को गायी जाती है-
‘सिंह सवारी चढ़ी आवे, भवानी मां, सिंह सवारी चढ़ी आवे हो माय….
जो मय जानतेव मोरो मइया आये हे, मोरो मइया आये हे ,मोरो दुरगा आये हे,
सुरहिन गइया के गोबर मंगाइ के,
खूंट धरि अंगना लिपातेव हो माय,
सुघ्घर चउक पुरातेव भवानी के,
सोन के करसा मढ़ातेव हो माय…
लाल ध्वजा फहरावे, भवानी के लाल ध्वजा फहरावे माय…’
छत्तीसगढ़ में नवरात्रों में पंचमी और अष्टमी का बड़ा महत्व है’ पंचमी के दिन माता का विशेष श्रृंगार किया जाता है और गांव में स्थित शीतला मंदिर में विशेष माता का श्रृंगार कर इस दिन से ही महिलाओं को मंदिर में प्रवेश दिया जाता है’ पंचमी पर विशेष जसगीतों में इस जसगीत गाई जाती है-
‘माता फूल गजरा गूंथव हो मालिन के देहरी ,
हो फूल गजरा’
काहेन फूल के गजरा काहेन फूल के हार ‘
काहेन फूल के माथ मकुटिया सोलहोंं सिंगार….
चंपा फूल के गजरा चमेली फूल के हार,
जसवंत फूल के माथ मकुटिया , सोलहों सिंगार….
माता फूल गजरा….”

इस तरह से श्रृंगार जसगीतों से देवी माता की सेवा की जाती है’ अष्टमी के दिन विशेष हवन पूजन किया जाता है’ जसगीत, जगराता के विभिन्न कार्यक्रम आयोजित की जाती है’ माता दुर्गा और देवी की समस्त शक्तियों का सेवा सत्कार से जीवन में उल्लास का संचार होता है और घर परिवार में सुख-शांति का आगमन होता है और धन-धान्य से भरपूर हो जाता है’ तभी तो नवरात्रि पर्व में छत्तीसगढ़ प्रदेश के मंदिरों, पंडालों,और घरों में देवी जसगीतों की गूंज नौ दिन नवरात्रों में गूंजने लगती है’.

(जयभारती चंद्राकर रायपुर की सहायक अध्यापक हैं. आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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