- सदन में बजट भाषण के दौरान नहीं हुई शेर-ओ-शायरी
- कुछ ही हफ्तों में तैयार हुआ बजट, इससे पहले लगते थे 6 महीने
Dainik Bhaskar
Mar 03, 2020, 08:57 PM IST
रायपुर, जॉन राजेश पॉल. मंगलवार को सरकार ने अपना दूसरा बजट पेश किया।राज्य का बजट बनाने में महीनों लगते हैं। इसे बनाने में बड़ी टीम काम करती है। मगर इस बार बजट बनाने में राज्य सरकार की मदद व्लर्ड बैंक ने भी की। कुछ ही हफ्तों में इसे तैयार कर लिया गया। आमतौर पर 48 घंटे पहले मुख्यमंत्री का बजट भाषण तैयार हो जाता है। मगर बजट पेश करने के कुछ घंटों पहले ही इसे तैयार कर फायनल किया गया। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री की व्यस्तता के चलते ऐसा हुआ होगा। मौजूद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के दोनों ही बजट भाषणों में शेर-ओ-शायरी सुनने को नहीं मिली। इसकी चर्चा रही कि आयकर छापों की वजह से इन दिनों पॉलिटिकल माहौल सही न होने की वजह से यह शायरी करने का माकूल वक्त नहीं।
इससे पहले प्रदेश के सदन में पहले वित्त मंत्री रामचंद्र सिंहदेव, भाजपा शासन में वित्त मंत्री अमर अग्रवाल व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जब-जब बजट पेश किए शुरूआत या आखिर में कोई न कोई शेर जरूर होता था। डॉ रमन सिंह के पेश किए साल 2018 के बजट भाषण के आखिर में उन्होंने कहा था- साहिल के सुकूं से किसे है इंकार लेकिन तूफान से लड़ने में मजा कुछ और ही है। मुख्यमंत्री या वित्त विभाग के भारसाधक मंत्री के रूप में जब वे बजट भाषण पेश करते हैं तो इसे लिखने में काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। केबिनेट को बजट की मंजूरी के बाद बजट भाषण तैयार किया जाता है।इसमें सभी विभागों के बड़े कामों का समावेश होता है। आईएएस स्तर के अधिकारी की निगरानी में इसे तैयार किया जाता है।
ऐसे बनता है बजट
प्रदेश में सितंबर के महीने से बजट बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। वित्त विभाग पिछले चालू वित्तीय वर्ष के आधार पर नए बजट को लेकर तैयारी शुरू करता है। अक्टूबर में यह पता किया जाता है कि नए वर्ष में राजस्व प्राप्तियां क्या, कितनी होगी और कहां-कहां से मिलेगी। इसके बाद सचिव स्तर की विभागवार चर्चा शुरू होती है। इसमें विभागों से भेजे गए प्रस्तावों पर चर्चा होती है। सचिव स्तर की बातचीत के बाद वित्त विभाग के पास बजट का खाका लगभग तय हो जाता है। इसके बाद मंत्रियों से करीब दो हफ्ते तक विभागवार चर्चा शुरू होती है। इसमें मुख्यमंत्री भी शामिल होते हैं। इसमें मंत्री अपने विभागों की नई योजनाओं के प्रस्ताव पेश करते हैं। वे इनके लिए बजट में राशि का प्रावधान करने का आग्रह करते हैं।
बजट खर्चने की प्रक्रिया
सदन में मुख्य बजट पर विभागवार चर्चा होती है।इसका जवाब अंत में विभागीय मंत्री देते हैं। तब उनके भाषण को तैयार करने में कई तकनीकी चीजों का ध्यान रखा जाता है। सदन में चर्चा के दौरान सदस्यों द्वारा की गई मांग या विरोध को अधिकारी नोट करते हैं। इसका जवाब भी विभागीय मंत्री अपने उत्तर में देते हैं। इसके साथ ही वित्त विभाग को मेन बजट से पहले पारित अनुपूरक बजट को भी राज्यपाल के पास अनुमोदन के लिए भेजना होता है। इसके बाद ही इसे खर्च किया जाता है। मेन बजट को व्यय करने की अनुमति पहली अप्रैल से ही होती है।
इन विभागों को मिलता है 13 महीने का वेतन
प्रदेश में कई सरकारी महकमें ऐसे हैं जिनके कर्मचारियों व अधिकारियों को साल के बारह महीने तो तनख्वाह मिलती है, लेकिन उन्हें एक महीने का एक्स्ट्रा वेतन भी मिलता है। इनमें फील्ड में रहने वाले पुलिस अधिकारी-कर्मचारी शामिल हैं। इनके अलावा चुनाव के दौरान राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी दफ्तर में काम करने वालों भी एक महीने का वेतन ज्यादा मिलता है। विधानसभा सचिवालय के स्टाफ को भी महीनेभर की अतिरक्त पगार मिलती है। खास बात यह कि सबके लिए महीनों मेहनत करने के बाद बजट बनाने वाले वित्त विभाग के स्टाफ को हर साल इसका फायदा नहीं मिलता। पिछले साल वित्त विभाग के कर्मियों को पहली बार 13 महीने का वेतन मिला था, कर्मचारी इस बार भी सरकार से उम्मीद लगाए हुए हैं।
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