ग्राम कन्हारपुरी में श्रीमद भागवत कथा के तीसरे दिन निरंजन देव महाराज ने सती चरित्र व शिव विवाह की कथा बताते हुए कहा जीवन में दो प्रकार के अभिमान है। एक व्यष्टि और दूसरा समष्टि। व्यष्टि अहंकार में जीव को मैं कर्ता पन का अभिमान होता है। समष्टि अहंकार में खाने-पीने, पद, प्रतिष्ठा का अभिमान साथ लेकर चलता है। अभिमान का ही अभिमान पाल कर जीवन भर निरभिमानी होने का गुमान करता है। संसार में जीव एक निमित्त मात्र है। उसे कर्म करने के लिए यह जीवन मिला है। उसका लाभ उठाएं।
भक्त और भगवान दोनों की महिमा ही भागवत की कथा है। भागवत ग्रंथ में धर्म कर्म आध्यात्म इतिहास ज्ञान विज्ञान सब कुछ समाहित है। परमात्मा सब कुछ तुम्हारी कृपा से प्राप्त है। जीव अगर दिए हुए सामग्री को तुम्हें ही सौपने का भाव में रखे तो मूर्खता है। निरंजन महाराज ने कहा कि कर्तव्य कर्म पर आरूढ़ रहो। उस कर्म फल की चिंता मत करो न ही अपने अभिमान का पोषण करो।ं
पंडित ने कहा- प्रभु कृपा से प्राप्त संसार ही सार है
उन्होंने कहा कि अस्तित्व जीव का नहीं ईश्वर का है, जीव अस्तित्व विहीन है। बिना प्रभु कृपा के जीव की सत्ता ही नहीं है। प्रभु कृपा से प्राप्त संसार ही सार है। इस कृपा प्राप्त संसार में जीव से मैं मेरा का संसार तैयार करना ही असार है। संसार में सब कुछ सार है।
अभिमान करने पर नहीं मिलते भगवान
निरंजन महाराज ने दक्ष प्रसंग व्यक्त करते हुए कहा कि अभिमान पतन का मूल कारण है और इसका सरल उदाहरण दक्ष प्रजापति की कथा है। पद और मद का गहरा रिश्ता है। पद प्राप्त करते ही जीव के अंदर मद का प्रवेश हो जाता है। अभिमान नहीं करना चााहिए।

